राकेश कायस्थ | छात्रों पर पड़ी लाठियों ने देश की राजनीतिक स्मृतियों को वापस लौटा दिया है

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने लेखक और वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के साथ छात्र आंदोलन, लोकतंत्र, राजनीतिक स्मृति और सरकार की प्रतिक्रिया पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्रीय सवाल यह है कि क्या छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई ने देश के युवाओं को राजनीतिक रूप से अधिक सजग बना दिया है.

राकेश कायस्थ का कहना है कि भारतीय समाज की राजनीतिक स्मृतियों को लंबे समय तक व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया. उन्होंने छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को एक रूपक के तौर पर देखते हुए कहा कि जिस तरह फिल्मों में सिर पर चोट लगने से याददाश्त लौट आती है, उसी तरह छात्रों पर पड़ी लाठियों ने लोगों को यह याद दिला दिया कि लोकतंत्र में सरकारों की जवाबदेही कैसे तय होती रही है.

चर्चा के दौरान उन्होंने 2004 से 2009 के दौर का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय आर्थिक विकास, राजनीतिक विमर्श और संस्थागत प्रक्रियाओं पर बहस होती थी, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने धीरे-धीरे राजनीतिक खबरों की जगह मनोरंजन आधारित कवरेज को प्राथमिकता दे दी. उनके अनुसार, इससे नई पीढ़ी के सामने राजनीति का एक अधूरा और विकृत चित्र प्रस्तुत हुआ.

राकेश कायस्थ ने कहा कि आज का छात्र यह तो कहता है कि वह किसी राजनीतिक दल का समर्थक नहीं है, लेकिन वह सरकार की नीतियों पर सवाल भी उठा रहा है. उनके मुताबिक, छात्र आंदोलन ने युवाओं को यह जानने के लिए प्रेरित किया है कि अतीत में आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक संकटों से सरकारें किस तरह निपटती रही हैं. यही कारण है कि सोशल मीडिया पर पुरानी संसदीय बहसों और राजनीतिक घटनाओं के वीडियो तेजी से साझा किए जा रहे हैं.

बातचीत में यह भी कहा गया कि वर्तमान सरकार जन आंदोलनों से निपटने के अपने पारंपरिक तरीकों की सीमाओं से जूझती दिखाई दे रही है. राकेश कायस्थ के अनुसार, सरकार के सामने दो विकल्प हैं. या तो वह छात्रों की मांगों को स्वीकार करे अथवा और अधिक कठोर रुख अपनाए. लेकिन दोनों ही स्थितियों में राजनीतिक नुकसान की संभावना बनी हुई है क्योंकि यह मुद्दा अब केवल एक परीक्षा या एक विभाग तक सीमित नहीं रह गया है.

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर उन्होंने कहा कि यह मामला केवल शिक्षा मंत्री तक सीमित नहीं है. उनके अनुसार, यदि सरकार किसी स्तर पर राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही स्वीकार करती है तो उसे व्यापक प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों पर भी जवाब देना होगा. यही कारण है कि सरकार किसी भी स्तर पर जवाबदेही तय करने से बचती दिखाई देती है.

राकेश कायस्थ ने यह भी कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सामाजिक संकटों का समाधान निकालने का माध्यम भी है. यदि छात्र, किसान या नागरिक अपने अधिकारों और सवालों के साथ सड़क पर उतरते हैं, तो उनका राजनीतिक होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है.

उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि विरोध प्रदर्शनों को अक्सर राष्ट्रविरोध, विपक्षी राजनीति या साजिश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. उनके मुताबिक, इससे वास्तविक मुद्दों पर संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप का माहौल बन जाता है.

पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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