डॉ. रवि चतुर्वेदी | जब चुनावों पर भरोसा घटता है, लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है

‘काउंटरकरंट्स’ में डॉ. रवि चतुर्वेदी लिखते हैं कि चुनावी लोकतंत्र का आधार सिर्फ मतदान नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया पर नागरिकों का भरोसा है, जिसके जरिए मतदाता सूची में नाम जुड़ने से लेकर वोट की गिनती तक चुनाव संपन्न होता है. दिल्ली और मुंबई में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों ने चुनावी प्रशासन से जुड़े सवालों को सार्वजनिक विश्वास का मुद्दा बना दिया है.

लोकतंत्र मतदान केंद्र से पहले शुरू होता है. नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि चुनाव के दिन उसका नाम मतदाता सूची में मौजूद होगा और उसे वोट देने का वास्तविक अवसर मिलेगा. संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को मतदाता सूचियों और चुनावों पर नियंत्रण देता है. सुप्रीम कोर्ट भी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूचियों की शुद्धता और विश्वसनीयता को महत्वपूर्ण मान चुका है. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नाम सूची में है या नहीं, बल्कि यह भी है कि किसी नाम की जांच या हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और निष्पक्ष है.

द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, फॉर्म 6 और मतदाता डेटा प्रबंधन से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ फैसले दोनों आयुक्तों की जानकारी के बिना लिए जाने और मतदाता डेटा पर केंद्रीकृत नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठे.

एसआईआर के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा को लेकर भी आपत्तियां सामने आईं. संधू ने कथित तौर पर इस बदलाव को “अनधिकृत” और “अवैध” बताया था. हालांकि, ऐसी आपत्तियां अपने आप में चुनाव प्रक्रिया के प्रभावित होने का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन वे यह सवाल जरूर उठाती हैं कि संवैधानिक संस्था के भीतर मतदाता अधिकारों से जुड़े मतभेद किस तरह दर्ज और सुलझाए जाते हैं.

एसआईआर का पैमाना भी महत्वपूर्ण है. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से बाहर रह गए थे. ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होना स्थायी रूप से नाम हट जाना या मतदान का अधिकार खत्म होना नहीं है. दावे, आपत्तियां और सुधार के रास्ते मौजूद हैं. लेकिन इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं से अपनी पात्रता दोबारा साबित करने की अपेक्षा प्रक्रिया को सुलभ और त्रुटि सुधारने में सक्षम बनाने की जरूरत बढ़ा देती है.

दिल्ली में 33.1 लाख मतदाताओं को नोटिस के लिए चिह्नित किए जाने की खबर के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि क्या अतिरिक्त जांच की जरूरत है. अदालत ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को प्रथम दृष्टया “यांत्रिक” बताया था. किसी डेटाबेस में लगाया गया एक संकेत प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जिस मतदाता की पात्रता पर सवाल उठता है, उसके लिए यह बेहद महत्वपूर्ण होता है.

तकनीक ने चुनावी प्रशासन को एक नई परत दी है. जनवरी 2026 में शुरू हुआ ईसीआईनेट 40 से अधिक चुनाव संबंधी एप्लीकेशन को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाता है. चुनाव आयोग का कहना है कि इससे सूचनाओं के एकीकरण और पारदर्शिता में सुधार होगा. वहीं, द इंडियन एक्सप्रेस ने गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़े एक मामले का उल्लेख किया, जहां स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें पात्र पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर के जरिए फैसले दर्ज करने में कठिनाई सामने आई. चुनाव आयोग ने इस मामले की व्यापक व्याख्या पर असहमति जताई और बाद में कहा कि इनमें से 81 लोगों ने फॉर्म 6 जमा किया था.

लेखक के अनुसार, जब सॉफ्टवेयर किसी वैधानिक अधिकारी की मतदाता रिकॉर्ड पर कार्रवाई को प्रभावित करता है, तो वह केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं रह जाता. उसे भी कानूनसम्मत, ऑडिट योग्य और जवाबदेह होना चाहिए.

चुनाव आयोग से जुड़ी संस्थागत स्वतंत्रता का सवाल भी महत्वपूर्ण है. सितंबर 2026 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ का फैसला विभाजित रहा. 2023 के कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री शामिल हैं.

इन घटनाओं में से किसी एक को चुनावों के साथ छेड़छाड़ का प्रमाण नहीं माना जा सकता. लेकिन मतदाता सूची, संस्थागत मतभेद, डेटा प्रबंधन, नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल मिलकर चुनावी भरोसे की अहमियत को सामने रखते हैं.

चुनाव आयोग अकेले चुनावी विश्वसनीयता सुनिश्चित नहीं कर सकता. राजनीतिक दलों, सरकारों, अदालतों, मीडिया, नागरिक समाज और मतदाताओं की भी भूमिका है. लेकिन चुनाव आयोग की विशेष जिम्मेदारी है क्योंकि वही उस प्रक्रिया का संचालन करता है, जिसके जरिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को वैधता मिलती है.

इसलिए चुनावी पारदर्शिता केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं है. मतदाता को यह समझ में आना चाहिए कि उसका नाम सूची में क्यों है या क्यों जांच के दायरे में आया, किस आधार पर फैसला लिया गया और उसे सुधार या अपील का कौन-सा रास्ता उपलब्ध है.

चुनाव की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वोट गिने गए या नहीं. असली सवाल यह भी है कि मतदान के बाद हारने या जीतने वाला नागरिक यह मानता है कि हर पात्र मतदाता को अपनी आवाज दर्ज कराने का समान अवसर मिला था. यही भरोसा चुनावी प्रक्रिया की वैधता की बुनियाद है.

डॉ. रवि चतुर्वेदी मीडिया पेशेवर और शिक्षाविद हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

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