जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई से खुद को किया अलग, शराब कंपनी से कथित रिश्वत का आरोप
‘द वायर’ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने मंगलवार (28 अप्रैल 2026) को कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की उस याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें उन्होंने सीबीआई द्वारा दर्ज कथित भ्रष्टाचार मामले को रद्द करने की मांग की थी.
यह मामला कथित ‘डियाजियो स्कॉटलैंड रिश्वत प्रकरण’ से जुड़ा है. सीबीआई का आरोप है कि वर्ष 2005 में, जब पी. चिदंबरम केंद्रीय वित्त मंत्री थे, तब कार्ति चिदंबरम ने शराब कंपनी डियाजियो स्कॉटलैंड को उसकी व्हिस्की की ड्यूटी-फ्री बिक्री पर लगे प्रतिबंध से राहत दिलाने में भूमिका निभाई थी.
कार्ति चिदंबरम ने अपनी याचिका में इस एफआईआर को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ बताया और इसे रद्द करने की मांग की. हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि यह मामला अब जुलाई में किसी दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा.
उन्होंने यह भी कहा कि इसी एफआईआर से जुड़ा एडवांटेज स्ट्रैटेजिक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड का मामला भी किसी अन्य पीठ द्वारा सुना जाएगा.
कार्ति चिदंबरम पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) और 420 (धोखाधड़ी) के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज है.
यह पहली बार नहीं है जब न्यायमूर्ति शर्मा ने कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया है. इससे पहले जनवरी 2026 में भी उन्होंने कथित ‘चीनी वीजा घोटाला’ मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था.
गौरतलब है कि यह फैसला ऐसे समय आया है जब पिछले सप्ताह ही न्यायमूर्ति शर्मा ने अरविंद केजरीवाल और अन्य नेताओं की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से उन्हें अलग करने की मांग की गई थी.
आम आदमी पार्टी के नेताओं ने उन पर वैचारिक पक्षपात और हितों के टकराव का आरोप लगाया था. हालांकि, न्यायमूर्ति शर्मा ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था. सीबीआई ने भी अदालत में यह कहते हुए पक्षपात के आरोपों का विरोध किया था कि न्यायमूर्ति शर्मा ने सह-आरोपी अरुण रामचंद्रन पिल्लई को तीन अलग-अलग मौकों पर अंतरिम जमानत दी थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनके फैसले केवल न्यायिक आधार पर होते हैं.

