हरकारा डीप डाइव | सुमित झा| क्या गरीबी का संबंध जाति से है? तेलंगाना सर्वे ने दिया जवाब!

2026 में जाति और गरीबी भले ही अलग-अलग कहानियां लगें, चाहे आरक्षण पर बहस हो या बराबरी के दावे, लेकिन तेलंगाना का ताज़ा जाति सर्वे एक अलग ही सच्चाई सामने रखता है. यह बताता है कि जाति और गरीबी का रिश्ता आज भी क़दम से क़दम मिलाकर चलता है, और उनका यह संगम कहीं दूर जाकर भी एक-दूसरे से अलग नहीं होता. इसी मुद्दे पर हरकारा डीप डाइव में पत्रकार सुमित झा से विस्तृत बातचीत हुई, जहां उन्होंने अपने रिपोर्टिंग अनुभव और सर्वे के निष्कर्षों के आधार पर कई अहम बातें रखीं. 

बातचीत की शुरुआत में सुमित झा ने उस आम धारणा को चुनौती दी जिसमें कहा जाता है कि अगर समाज से जाति खत्म करनी है तो जाति जनगणना की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा कि यह सर्वे इस सोच को खारिज करता है, क्योंकि आंकड़े साफ दिखाते हैं कि जाति आज भी हर जगह मौजूद है, चाहे गांव में पानी पीने की व्यवस्था हो या शहर में रहने की स्थिति. उनके मुताबिक, तेलंगाना का 2024 का सर्वे स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े डोर-टू-डोर सर्वे में से एक है, जिसमें करीब 3.5 करोड़ लोगों और 242 जातियों को शामिल किया गया. जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी की अध्यक्षता में बने विशेषज्ञ समूह ने 42 मानकों पर पिछड़ेपन को मापा और पाया कि अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय सामान्य वर्ग की तुलना में तीन गुना अधिक पिछड़े हैं. 

सुमित झा ने बातचीत में खास तौर पर स्वास्थ्य और क़र्ज़ के मुद्दे को रेखांकित किया. उन्होंने बताया कि सर्वे में सामने आया है कि अनुसूचित जाति के परिवार सामान्य वर्ग की तुलना में लगभग चार गुना ज़्यादा मेडिकल लोन लेते हैं. इसका कारण यह है कि इन समुदायों के लोग अधिकतर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां नौकरी की सुरक्षा या स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं नहीं होतीं. बीमारी की स्थिति में इन्हें पहले झोला-छाप डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है, और जब हालत बिगड़ती है तो महंगे निजी अस्पतालों में क़र्ज़ लेकर इलाज कराना पड़ता है. यह क़र्ज़ भी अक्सर बैंक से नहीं बल्कि निजी मनीलेंडर्स से लिया जाता है, जिसे चुकाने के लिए कई बार मज़दूरी तक करनी पड़ती है. 

बातचीत में उन्होंने यह भी बताया कि सरकारी योजनाओं का लाभ समान रूप से नहीं बंट रहा है. ज़मीन या संपत्ति आधारित योजनाओं का फायदा उन वर्गों को ज़्यादा मिल रहा है जिनके पास पहले से संसाधन हैं.  उदाहरण के तौर पर, रायतू बंधु जैसी योजनाओं का पैसा बड़े ज़मीन मालिकों तक ज़्यादा पहुंचता है, जबकि सूखी ज़मीन वाले या छोटे किसान इससे वंचित रह जाते हैं. उन्होंने ज़मीन के असमान वितरण पर भी प्रकाश डाला, रेड्डी समुदाय, जिसकी आबादी कम है, उसके पास उपजाऊ ज़मीन का बड़ा हिस्सा है, जबकि आदिवासी समुदाय के पास ज़मीन होने के बावजूद वह खेती के लायक नहीं है. 

शिक्षा और रोज़गार के संदर्भ में सुमित झा ने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चे अक्सर 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं, जिससे उनके लिए बेहतर नौकरियों के अवसर कम हो जाते हैं. इसके उलट, जो वर्ग बेहतर शिक्षा प्राप्त करता है, वह आईटी या संगठित क्षेत्र में जाकर स्वास्थ्य बीमा और स्थिर आय जैसी सुविधाएं हासिल कर लेता है. उन्होंने इसे एक “चक्र” बताया जिसमें एक वर्ग लगातार आगे बढ़ता जाता है और दूसरा पीछे छूटता जाता है. 

बातचीत के दौरान माइग्रेशन के पैटर्न पर भी चर्चा हुई. सुमित झा ने बताया कि अपर कास्ट और अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले वर्ग अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में पढ़ाई और आईटी नौकरियों के लिए जाते हैं, जबकि एससी/एसटी और कमज़ोर वर्गों के लोग खाड़ी देशों में मज़दूरी के लिए जाते हैं. इसी तरह मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उनकी बड़ी आबादी शहरों में रहती है, लेकिन वहां भी वे अक्सर किराए के घरों में और सीमित संसाधनों के साथ जीवन बिताते हैं. 

एक दिलचस्प और चौंकाने वाला तथ्य उन्होंने बाल विवाह को लेकर साझा किया. आम धारणा के विपरीत, सर्वे में पाया गया कि बाल विवाह के मामले ऊंची जातियों में अधिक हैं, जहां लगभग 22.5% मामलों में 18 साल से पहले विवाह हो जाता है. यह दिखाता है कि सामाजिक समस्याएं केवल गरीब या पिछड़े वर्गों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग रूपों में हर स्तर पर मौजूद हैं. 

सुमित झा ने कहा कि सरकारी दावों और ज़मीनी सच्चाई में अंतर है. जहां सरकार 100% नल जल की बात करती है, वहीं सर्वे में पाया गया कि कई इलाकों में अब भी बड़ी संख्या में घरों तक पानी और शौचालय जैसी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं, खासकर आदिवासी समुदायों तक. 

अंत में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केवल जाति सर्वे कर लेना पर्याप्त नहीं है.  जब तक उस डेटा को समझकर नीतियों में नहीं बदला जाएगा, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं है. सरकार को टारगेटेड पॉलिसी बनानी होगी, जो खासतौर पर उन समुदायों तक पहुंचे जो सबसे ज़्यादा वंचित है. 

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