‘एनएचआरसी’ मुसलमानों पर हो रहे हमलों की अनदेखी कर रहा है और उन मामलों में दखल दे रहा है जो उससे संबंधित नहीं हैं: इलाहाबाद हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) पर आरोप लगाया कि वह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा के गंभीर मामलों की अनदेखी कर रहा है, जबकि उन मामलों में लगा हुआ है “जो प्रथम दृष्टया उसके कार्यक्षेत्र से संबंधित नहीं हैं.”
अदालत ‘टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया’ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इस याचिका में फरवरी 2025 के एनएचआरसी के उस निर्देश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के खिलाफ आरोपों की जांच आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) से कराने को कहा गया था. आयोग के समक्ष की गई शिकायत में सरकारी अनुदान के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के माध्यम से अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति सहित वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था.
इशिता मिश्रा की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि एनएचआरसी के पास एक वर्ष की अवधि के बाद कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच शुरू करने का अधिकार नहीं है. हाईकोर्ट ने इससे पहले सितंबर 2025 में आयोग के आदेश पर रोक लगा दी थी.
अधिकार क्षेत्र पर सवाल
न्यायमूर्ति विवेक सरन के साथ खंडपीठ का हिस्सा रहे न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने आयोग के आदेश पर “आश्चर्य” व्यक्त किया और मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत इसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए.
अदालत ने रेखांकित किया कि वित्तीय अनियमितताओं के मामलों को आमतौर पर मानवाधिकार निकाय के बजाय हाई कोर्ट के समक्ष लाया जाना चाहिए.
अदालत ने कहा, “यह आश्चर्यजनक है कि देश के मानवाधिकार आयोग उन मामलों में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें अन्यथा आवश्यकता पड़ने पर उचित आदेश के लिए जनहित याचिका के माध्यम से अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट के समक्ष उठाया जाना चाहिए था.”
‘विजिलेंटे’ (स्वघोषित रक्षक) हिंसा की अनदेखी
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा, “मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर होने वाले हमलों और कुछ मामलों में उनकी मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या), जहाँ दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं किए जाते या ठीक से जांच नहीं की जाती, उन घटनाओं का स्वतः संज्ञान लेने के बजाय मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हाथ डालता दिख रहा है जो प्रथम दृष्टया उससे संबंधित नहीं हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “इस अदालत को ऐसी किसी स्थिति की जानकारी नहीं है जहाँ एनएचआरसी ने स्वतः संज्ञान लिया हो जब ‘विजिलेंटे’ (कानून हाथ में लेने वाले तत्व) कानून अपने हाथ में लेते हैं और इस देश के आम नागरिकों को परेशान करते हैं, या अलग-अलग समुदायों के व्यक्तियों के बीच संबंधों की प्रकृति के आधार पर लोगों को प्रताड़ित करते हैं, या जहाँ किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी डर का काम बन गया है.”
न्यायाधीश ने यह भी नोट किया कि अदालत के सामने ऐसा कोई उदाहरण नहीं रखा गया जिससे पता चले कि एनएचआरसी ने ‘विजिलेंटे’ हिंसा, अंतरधार्मिक जोड़ों के उत्पीड़न, या नागरिकों की बुनियादी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले हमलों के मामलों में स्वतः संज्ञान लिया हो. उन्होंने कहा, “लेकिन इसके बजाय उसके पास उन मामलों पर विचार करने का समय है जो हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.”
हालांकि, न्यायमूर्ति सरन इन टिप्पणियों से असहमत दिखे और उन्होंने प्रक्रियात्मक चिंताओं पर जोर दिया. उन्होंने रेखांकित किया कि सुनवाई के दौरान एनएचआरसी का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था और याचिकाकर्ता ने स्थगन की मांग की थी. उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, संबंधित सभी पक्षों को सुने बिना प्रतिकूल टिप्पणी करने से बचना उचित होता.
खंडपीठ ने एनएचआरसी को नोटिस जारी किया है और उसके आदेश पर अंतरिम रोक बढ़ा दी है. इस मामले की अगली सुनवाई अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ 11 मई को होनी तय है.

