डॉ. सुरेश खैरनार | ‘मेंटल नक्सल’ कहने से पहले युवाओं के गुस्से को समझना जरूरी है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित एक खुले पत्र में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. सुरेश खैरनार ने हाल में युवाओं के आंदोलनों और उन्हें ‘मेंटल नक्सल’ कहे जाने पर सवाल उठाए हैं. 17 अगस्त 2026 को प्रकाशित इस लेख में खैरनार ने रोजगार, सरकारी भर्तियों, शिक्षा, रेलवे, आदिवासी अधिकार, किसान आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को लेकर केंद्र तथा विभिन्न राज्यों की सरकारों की नीतियों पर सवाल उठाए हैं. उनका तर्क है कि असहमति जताने वाले लोगों और आंदोलनों को नक्सल या ‘अर्बन नक्सल’ जैसे लेबल देने के बजाय उनके मुद्दों को समझने की जरूरत है.

खैरनार ने जुलाई में हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शनों का संदर्भ देते हुए प्रधानमंत्री के पहले के बयानों और बाद में ‘मेंटल नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल के बीच के अंतर पर सवाल उठाया है. उनके मुताबिक, जुलाई में प्रधानमंत्री ने युवाओं को ‘मेरे प्यारे दोस्तों’ कहकर उनकी समस्याओं पर ध्यान देने और समाधान तलाशने की बात कही थी, लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद उन्हीं युवाओं को ‘मेंटल नक्सल’ कहने का सवाल सामने आया.

रोजगार और सरकारी भर्तियों का सवाल

खैरनार ने प्रधानमंत्री के 2014 के चुनावी वादे का हवाला देते हुए रोजगार के मुद्दे को युवाओं के असंतोष से जोड़ा है. उनका दावा है कि सरकार के कार्यकाल में केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में पद खाली हैं और भर्तियां भी रुकी हुई हैं.

उन्होंने सेना में अग्निवीर योजना का भी उल्लेख किया है. उनके अनुसार, चार साल की सेवा के बाद युवाओं के सामने रोजगार का सवाल बना रहेगा. इसी संदर्भ में उन्होंने सरकारी स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था में रिक्त पदों का मुद्दा उठाया है. उनका सवाल है कि प्राथमिक स्कूलों से विश्वविद्यालयों तक नियमित शिक्षकों के बजाय अस्थायी नियुक्तियों पर निर्भरता क्यों बढ़ी और शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में बजट से जुड़े सवाल क्यों सामने आते रहे.

प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं को भी उन्होंने युवाओं के असंतोष का एक कारण बताया है.

रेलवे और निजीकरण का सवाल

खैरनार ने रेलवे में बड़ी संख्या में पद खाली रहने का मुद्दा भी उठाया है. उनका सवाल है कि जब रेलवे देश के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है, तो लंबे समय से खाली पदों को भरने के बजाय उन्हें क्यों नहीं भरा जा रहा.

उन्होंने इसे सार्वजनिक संस्थानों में निजीकरण की व्यापक बहस से जोड़ते हुए सवाल किया है कि क्या सरकारी संस्थानों को धीरे-धीरे निजी हाथों में सौंपने की दिशा में काम हो रहा है. हालांकि, ये उनके लेख में उठाए गए सवाल और आरोप हैं.

‘अर्बन नक्सल’ शब्द और जन आंदोलनों का इतिहास

खैरनार का तर्क है कि देश में जन आंदोलनों को नक्सल बताने की राजनीति नई नहीं है. उन्होंने पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलनों का उदाहरण दिया है, जहां 2007 में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों ने आंदोलन किया था.

खैरनार के अनुसार, उन्होंने उस समय इलाके में जाकर किसानों से बातचीत की थी. उनका कहना है कि कई किसान खुद को कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थक बताते थे, लेकिन जमीन छिनने की आशंका के कारण औद्योगिक परियोजनाओं का विरोध कर रहे थे.

तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने आंदोलन का दमन किया और आंदोलनकारियों को नक्सली बताया. खैरनार इसे वाम मोर्चा सरकार के पतन के महत्वपूर्ण कारणों में से एक मानते हैं. वे याद दिलाते हैं कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा 1977 से 2011 तक लगातार सत्ता में रहा, लेकिन नंदीग्राम-सिंगूर के बाद उसकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई और 2011 के विधानसभा चुनाव में वह सत्ता से बाहर हो गया.

आदिवासी, किसान और जमीन का मुद्दा

खैरनार ने देश में जमीन अधिग्रहण और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर होने वाले आंदोलनों को भी ‘नक्सल’ कहे जाने के संदर्भ में रखा है. उनका कहना है कि पानी, जंगल और जमीन पर निर्भर समुदाय जब अपने संसाधनों के इस्तेमाल का विरोध करते हैं तो उन पर नक्सल होने का आरोप लगाया जाता है.

उन्होंने ओडिशा के नियमगिरि क्षेत्र में खनन के खिलाफ आदिवासी आंदोलन और इससे जुड़े कार्यकर्ता लिंगराज आजाद का उदाहरण दिया है. लेख में दावा किया गया है कि उन्हें लंबे समय से जेल में रखा गया है. इसी तरह उन्होंने महाराष्ट्र में भी ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम लिए जिन्हें अतीत में पुलिस की ओर से नक्सल गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की गई थी.

महाराष्ट्र का 56 लोगों वाला मामला

खैरनार ने महाराष्ट्र के एक पुराने मामले का विस्तार से उल्लेख किया है. उनके मुताबिक, महाराष्ट्र पुलिस की एंटी-नक्सल सेल ने 56 लोगों के नाम नक्सलियों के रूप में मीडिया के सामने रखे थे. इनमें सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, डॉ. बाबा आढाव, डॉ. भारत पाटणकर, कवि यशवंत मनोहर, नागेश चौधरी और खुद खैरनार का नाम शामिल था.

इनमें से किसी ने नक्सली हिंसा का समर्थन नहीं किया था और सभी लंबे समय से शांतिपूर्ण जन आंदोलनों से जुड़े रहे थे. उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर इस कार्रवाई पर सवाल उठाया. बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने विधानसभा में इसे पुलिस की गलती बताते हुए माफी मांगी. तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने भी कहा था कि अगर ये लोग नक्सली हैं तो वे भी नक्सली हैं.

खैरनार ने इस घटना को मौजूदा समय में ‘मेंटल नक्सल’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल के संदर्भ में महत्वपूर्ण उदाहरण बताया है.

जेपी आंदोलन और आपातकाल का संदर्भ

लेख में 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन और 1975 में लगाए गए आपातकाल का भी उल्लेख है. खैरनार ने लिखा है कि उस समय इंदिरा गांधी सरकार और उनके समर्थकों ने जयप्रकाश नारायण को सीआईए एजेंट और देशद्रोही तक कहा था. इसके बाद 25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया गया.

खैरनार ने प्रधानमंत्री मोदी को इतिहास से सबक लेने की सलाह देते हुए कहा है कि सरकारों द्वारा जन आंदोलनों को बदनाम करने की रणनीति अंततः राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है.

उन्होंने किसान आंदोलन का भी उदाहरण दिया है. उनके मुताबिक, लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को कभी खालिस्तानी तो कभी पाकिस्तान समर्थित आंदोलन बताया गया, लेकिन अंततः सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े.

युवाओं का आंदोलन और सोशल मीडिया

खैरनार का दावा है कि मौजूदा युवा आंदोलन किसी एक नेता के नेतृत्व में नहीं बल्कि अलग-अलग हिस्सों में स्वतःस्फूर्त तरीके से फैल रहा है. उन्होंने देश के कई शहरों का उल्लेख करते हुए कहा है कि युवाओं और युवा महिलाओं में असंतोष व्यापक है.

उनका कहना है कि मुख्यधारा मीडिया पर सरकार के पक्ष में प्रचार का आरोप लगने के बावजूद सोशल मीडिया पर युवाओं को अपनी बात रखने का मंच मिला है. वे रोजगार, परीक्षा प्रश्नपत्र लीक, शिक्षा और भविष्य से जुड़े सवालों को इस असंतोष के पीछे महत्वपूर्ण कारण मानते हैं.

लेख के अंत में खैरनार ने ‘मेंटल नक्सल’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर प्रधानमंत्री को चेतावनी दी है. उनका कहना है कि असहमति रखने वाले युवाओं को इस तरह संबोधित करने के बजाय सरकार को उनके सवालों और समस्याओं का जवाब देना चाहिए. वे इसे इतिहास में सरकारों द्वारा आंदोलनों को दबाने और उनके नेताओं को बदनाम करने की कोशिशों से जोड़ते हैं.

यह पूरा लेख डॉ. सुरेश खैरनार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा गया खुला पत्र है. इसमें रोजगार, सरकारी भर्तियों, निजीकरण, जमीन अधिग्रहण, आदिवासी और किसान आंदोलनों तथा युवाओं के विरोध को लेकर लेखक के विचार और आरोप शामिल हैं.

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