दिनकर कपूर | सामाजिक सरोकार वाले नागरिक और नई पीढ़ी समस्या नहीं, समाधान हैं

15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सामाजिक मुद्दों के लिए सक्रिय नागरिकों और जवाबदेह सरकार की मांग कर रहे युवाओं के लिए "दिमागी नक्सल" जैसे शब्द का इस्तेमाल किया. इससे पहले प्रधानमंत्री, भाजपा नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सत्ता में बैठे अन्य लोगों की ओर से प्रदर्शनकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए ‘कॉकरोच’, ‘आंदोलनजीवी’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘खान मार्केट गैंग’ और ‘झोलाछाप’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाते रहे हैं. लेखक दिनकर कपूर का तर्क है कि इन शब्दों के जरिए सामाजिक सरोकार रखने वाले नागरिकों और युवाओं की आवाज को बदनाम, अलग-थलग और दबाने की कोशिश की जा रही है. जबकि इतिहास बताता है कि असहमति और जन आंदोलनों ने भारत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

भारत की वैदिक, लोकायत और श्रमण परंपराओं में असहमति की आवाजों ने समाज को आकार दिया. ब्रिटिश शासन से आजादी, कल्याणकारी राज्य की स्थापना, मजदूरों के लिए आठ घंटे के कार्यदिवस और सामाजिक सुरक्षा जैसे अधिकार, जमींदारी व्यवस्था का अंत तथा मनरेगा, सूचना का अधिकार, वन अधिकार और खाद्य सुरक्षा कानून जैसे कदम लंबे जन आंदोलनों के दबाव से संभव हुए. इसलिए नई पीढ़ी और सामाजिक रूप से जागरूक नागरिकों को समस्या के बजाय समाधान के रूप में देखा जाना चाहिए.

लेखक के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार के शासन और संस्थाओं के कमजोर होने से जनता में गहरी नाराजगी है. उन्होंने 9 अगस्त से मिर्जापुर से शुरू हुए ‘रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान’ के दौरान पूर्वांचल के दस जिलों, जिनमें भदोही, जौनपुर, आजमगढ़ और मऊ शामिल हैं, का दौरा किया. उनका दावा है कि जमीन पर स्थिति सरकार के विकास के दावों से कहीं खराब दिखाई दी.

ग्रामीण इलाकों में रातभर बिजली नहीं रहने की शिकायत सामने आई. सरकारी स्वास्थ्य केंद्र बदहाल हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्वीकृत पदों के मुकाबले विशेषज्ञ डॉक्टर और जरूरी जांच सुविधाएं नहीं हैं, जिससे वे केवल मरीजों को बड़े अस्पतालों में भेजने वाले केंद्र बन गए हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी के कारण पैरामेडिकल स्टाफ के सहारे काम चल रहा है. प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और बुनियादी सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं.

सड़कें भी खराब स्थिति में हैं. लेखक के अनुसार, जामालापुर और मड़ियाहूं में फायर सब-स्टेशन तक जाने वाली सड़क तक जर्जर है. पूर्वांचल की पारंपरिक अर्थव्यवस्था भी संकट में है. पीतल के सामान, कालीन, साड़ी, हथकरघा और पावरलूम वस्त्र तथा इत्र जैसे प्रसिद्ध छोटे और कुटीर उद्योग कमजोर पड़ रहे हैं. महंगाई और बेरोजगारी से लोग परेशान हैं. बुलडोजर जैसी सरकारी कार्रवाइयों को लेकर भी लोगों में नाराजगी है.

जिला और तहसील अदालतों में लेखक ने जिस बौद्धिक वर्ग से बातचीत की, उसके बीच छात्रों के प्रदर्शनों पर पेलेट गन और कील जड़ी लाठियों के इस्तेमाल को लेकर गुस्सा दिखाई दिया. उनके अनुसार, सरकार कल्याणकारी राज्य की संवैधानिक भूमिका से पीछे हट रही है और उसकी नीतियां घरेलू तथा विदेशी कॉरपोरेट हितों के पक्ष में जा रही हैं.

संविधान की प्रस्तावना व्यक्ति की गरिमा और न्याय की बात करती है. मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निर्देशक तत्व भी नागरिकों के सम्मानजनक जीवन की जिम्मेदारी सरकार पर डालते हैं. इसके लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन और भूमिहीनों के लिए आवास जैसी बुनियादी जरूरतों की गारंटी जरूरी है. लेखक का आरोप है कि विकास की मौजूदा नीतियों से छात्र, युवा, मजदूर, किसान, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अति पिछड़े वर्ग, मुस्लिम समुदाय और महिलाएं पर्याप्त लाभ से बाहर हो रहे हैं.

रोजगार के मोर्चे पर स्थिति विशेष रूप से गंभीर बताई गई है. सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थानों में करीब एक करोड़ पद खाली होने का दावा किया गया है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया बड़े पैमाने पर रुकी हुई है. जहां भर्तियां निकलती भी हैं, वहां पेपर लीक और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती हैं. इससे छात्रों में निराशा और मानसिक दबाव बढ़ रहा है तथा आत्महत्या की घटनाओं को लेकर चिंता बढ़ी है.

लेखक का दावा है कि अमेरिका के सामने सरकार की नीतिगत झुकाव ने उद्योगों के बंद होने और रोजगार में कटौती को तेज किया है. पूंजी के देश से बाहर जाने की बात भी कही गई है. विज्ञान और तकनीक पर बजट का केवल 0.25 प्रतिशत खर्च होने और इसरो जैसे प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों से लोगों के इस्तीफे की खबरों को भी चिंता का संकेत बताया गया है.

आर्थिक स्थिति पर भी लेखक गंभीर सवाल उठाते हैं. देश का कर्ज जीडीपी के बराबर पहुंचने और बजट के बड़े हिस्से के ब्याज भुगतान में जाने की बात कही गई है. लोगों की क्रय शक्ति घट रही है और बाजारों में कारोबारी आर्थिक सुस्ती से परेशान हैं. लेखक इसे गंभीर आर्थिक संकट बताते हुए आरोप लगाते हैं कि सरकार समस्याओं का समाधान करने के बजाय आरएसएस और भाजपा के जरिए समाज को विभाजन, हिंसा और नफरत की राजनीति में धकेल रही है.

इसी परिस्थिति में लेखक नई पीढ़ी और सामाजिक रूप से जागरूक नागरिकों के सुझावों को समाधान के रूप में रखते हैं. वे संविधान के अनुच्छेद 39 में दिए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत को लागू करने की मांग करते हैं, जिसका उद्देश्य संपत्ति और संसाधनों के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकना है. उनका कहना है कि सरकार को जवाबदेह बनना चाहिए और प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन देने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए.

लेखक के अनुसार, देश में संसाधनों की कमी नहीं है. कॉरपोरेट क्षेत्र और अति धनाढ्य वर्ग की संपत्ति पर केवल दो प्रतिशत कर लगाया जाए, जापान और यूरोपीय देशों की तरह विरासत कर लागू किया जाए, कॉरपोरेट टैक्स को फिर से 35 प्रतिशत किया जाए और काले धन की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण हो, तो सार्वजनिक कल्याण के लिए अधिक संसाधन जुटाए जा सकते हैं.

ऐसे कदमों से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, वृद्धावस्था पेंशन, पर्याप्त भोजन और आवास जैसे संवैधानिक अधिकारों को मजबूत किया जा सकता है. इसलिए लेखक का निष्कर्ष है कि सरकार को नई पीढ़ी और सामाजिक सरोकार वाले नागरिकों की आवाज को बदनाम करने के बजाय गंभीरता से सुनना चाहिए. उनके आंदोलन देश के लिए खतरा नहीं, बल्कि उन समस्याओं की ओर संकेत हैं जिनका समाधान भारतीय संविधान खुद राज्य के सामने रखता है.

दिनकर कपूर, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश के राज्य महासचिव हैं. यह Countercurrents.org में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है. 

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