कैसे चीन के ‘क्लीन इंटरनेट’ अभियान का नया शिकार बनी नेपाल-तिब्बत आपदा
दक्षिण भारत में निर्वासित जीवन जी रहे 46 वर्षीय तिब्बती छेरिंग फुनत्सोक के रिश्तेदार सीमा के दोनों ओर लापता हैं. नेपाल की ओर से तो सरकारी सूचियों में उनके परिजनों के नाम दर्ज हैं, लेकिन तिब्बत की तरफ से कोई जानकारी न मिलने पर वे अब सिर्फ उनके लिए प्रार्थना ही कर पा रहे हैं. यह सन्नाटा किसी तकनीकी खामी का नहीं, बल्कि चीनी सरकार की डिजिटल सेंसरशिप का नतीजा है.
‘द गार्डियन’ में डेनी विंसेंट की रिपोर्ट के अनुसार, हालिया नेपाल-तिब्बत बाढ़ आपदा चीनी अधिकारियों द्वारा चलाए जा रहे "क्लीन इंटरनेट 2026" अभियान का ताज़ा शिकार बनी है. सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय का यह अभियान फर्जी सूचनाओं को रोकने के नाम पर किसी भी गैर-सरकारी विवरण, अनौपचारिक आंकड़ों और बाढ़ से जुड़ी जमीनी सच्चाई को ‘आपराधिक श्रेणी’ में डाल देता है.
सूचना का दमन और सरकारी नैरेटिव का खेल
इस अभियान के तहत चीनी सोशल मीडिया ऐप्स (जैसे वीचैट) पर बाढ़ से जुड़ी पोस्ट्स को 'राजनीतिक रूप से संवेदनशील' या 'नीति उल्लंघन' बताकर रियल-टाइम में हटाया जा रहा है. 30 अगस्त को तिब्बत पुलिस ने आपदा से जुड़ी "अफवाहें" फैलाने के आरोप में 10 मामले दर्ज किए, जिनमें 1,000 से अधिक लोगों के बहने का दावा किया गया था. सरकार ने मौतों का आधिकारिक आंकड़ा केवल 43 बताया है, जबकि मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि मौतों की वास्तविक संख्या छिपाई जा रही है. आपदा से 3,000 किमी दूर जियांग्शी के एक यूजर द्वारा लापता लोगों की संख्या 826 बताने पर उसे 'प्रशासनिक सजा' दी गई.
कंट्रोल का दोहरा मॉडल
चीनी मीडिया विशेषज्ञ डेविड बांडुस्की के अनुसार, यह केवल अचानक की गई कार्रवाई (क्रैकडाउन) नहीं, बल्कि जनमत को लगातार नियंत्रित करने की सोची-समझी नीति है. पूर्व पत्रकारों का कहना है कि संकट के समय सरकारी मीडिया सिर्फ यह दिखाने में पूरी ताकत लगाता है कि 'राज्य कड़ी मेहनत कर रहा है', जबकि बुनियादी सवाल—जैसे कौन लापता है या कहाँ राहत पहुंची—अनुत्तरित रह जाते हैं.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी वैश्विक स्तर पर सूचनाओं को एक विरोधी ढांचे के रूप में देखती है. सेंसरशिप के इस खौफ का आलम यह है कि नई दिल्ली स्थित तिब्बती पत्रकार कालसांग जिग्मे के अनुसार, आमतौर पर आपदा के समय मदद और प्रार्थना के लिए आगे आने वाले लोग इस बार पूरी तरह खामोश रहने पर मजबूर हैं.

