भारत चीन से कम आयात करना चाहता है, पर उसकी जरूरतें बढ़ती जा रही हैं

भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंध एक जटिल विरोधाभास में उलझे हुए हैं. भारत वर्षों से अपने विशाल पड़ोसी पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को चीनी मशीनों, इलेक्ट्रॉनिक घटकों और कच्चे माल की सख्त जरूरत है. देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर (इलेक्ट्रिक वाहनों के दुर्लभ-पृथ्वी चुंबक) से लेकर फार्मास्यूटिकल उद्योग (दवा सामग्री/एपीआई) तक, चीनी आपूर्ति के बिना कारखानों का पहिया थमने लगता है.

आंकड़ों में गहराता व्यापार असंतुलन

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में एलिस ट्रैवेली की रिपोर्ट है कि पिछले पांच वर्षों में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार लगभग दोगुना होकर 151 अरब डॉलर प्रति वर्ष पहुंच गया है. हालांकि, यह व्यापार अभूतपूर्व रूप से असंतुलित हो चुका है—भारत अब चीन से सात गुना अधिक सामान खरीदता है जितना वह वहां बेचता है. 2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद राजनीतिक और कूटनीतिक संबंध बेहद ठंडे दौर में चले गए थे, लेकिन व्यापार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा.

रिपोर्ट के अनुसार, यह असंतुलन भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक जोखिम पैदा कर रहा है. वैश्विक स्तर पर ऊर्जा दरों में वृद्धि और चीनी आयात के बढ़ते बोझ से भारत का व्यापार घाटा चौड़ा हो रहा है और रुपये पर दबाव बढ़ रहा है. उधर, चीन का वैश्विक व्यापार अधिशेष 1.2 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जिससे जी-20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चिंताएं बढ़ी हैं.

'फैक्ट्री टू द वर्ल्ड' बनने की चुनौती और वियतनाम का उभार

2020 के बाद भारत ने टिकटॉक जैसे चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया और चीनी निवेश पर सख्ती की. उम्मीद थी कि चीन से बाहर निकलने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां (चीन+1 रणनीति) भारत का रुख करेंगी. लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा वियतनाम और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को मिला.

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, वियतनाम की आपूर्ति श्रृंखला चीन के साथ बेहतर ढंग से एकीकृत है और वह चीनी निवेश को आक्रामक रूप से आकर्षित करता है. भारत द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया के रास्ते आने वाले सामानों पर लगाम लगाने के प्रयास भी खास कारगर नहीं हुए, क्योंकि वहां भी अक्सर चीनी सामान की ही री-पैकेजिंग होती है.

व्यापारिक तनाव के प्रमुख कारण

निवेश बनाम संरक्षण: भारत चीनी पूंजी और तकनीक चाहता है, लेकिन अपने घरेलू औद्योगिक आधार और घरेलू कंपनियों की सुरक्षा की कीमत पर नहीं. ऐप्पल आईफोन का विनिर्माण (जिसका 25% हिस्सा भारत स्थानांतरित हुआ है) इस संतुलन का एक उदाहरण है.

रणनीतिक सामान की हथियारबंदी: चीन दुर्लभ-पृथ्वी चुंबक और आवश्यक दवा सामग्रियों के उत्पादन पर अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल सौदेबाजी (लीवरेज) के लिए करता है.

वीजा और मानव संसाधन: 2020 के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक वीजा और पेशेवरों की आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लगे. अब भारत अपने विनिर्माण क्षेत्र के लिए चीनी इंजीनियरों और व्यापारिक यात्राओं की सहजता चाहता है.

आगे का रास्ता: व्यावहारिक कूटनीति की जरूरत

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत के लिए चीनी सामान को पूरी तरह से बाहर करना व्यावहारिक नहीं है. भारत को ग्रीन टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और बैटरी विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में चीनी कंपनियों को निवेश के लिए आमंत्रित करना चाहिए, जहां चीन को 30% तक लागत लाभ हासिल है.

भारत के पास 1.4 अरब आबादी का विशाल घरेलू बाजार और ताइवान की फॉक्सकॉन जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी करने की क्षमता है. हालांकि, जब तक भारत अपने निर्यात में आक्रामक वृद्धि नहीं करता, तब तक व्यापार घाटा और मुद्रा पर दबाव बना रहेगा.

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