रील की राजनीति में क्यों पिछड़ रही है भाजपा?
‘स्क्रोल’ में प्रकाशित कौस्तुभ नाइक की रिपोर्ट के मुताबिक, जिस सोशल मीडिया रणनीति ने पिछले डेढ़ दशक में भाजपा को डिजिटल राजनीति में बढ़त दिलाई, वही रणनीति अब इंस्टाग्राम और जेनरेशन जेड के दौर में कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है. इसकी वजह केवल प्लेटफॉर्म का बदलना नहीं, बल्कि इंटरनेट पर संवाद की भाषा, संस्कृति और एल्गोरिदम में आया बड़ा बदलाव है.
नाइक इसकी शुरुआत 23 जुलाई की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंस्टाग्राम पर पोस्ट किए गए एक सेल्फी वीडियो से करते हैं. यह वीडियो परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों और पेपर लीक को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे युवाओं तक पहुंचने की कोशिश था. विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व नवगठित 'कॉकरोच जनता पार्टी' आंदोलन कर रहा था और इंस्टाग्राम उसके लिए संगठन और संवाद का प्रमुख माध्यम बन चुका था.
मोदी का वीडियो 24 घंटे में 30 करोड़ से ज्यादा बार देखा गया, लेकिन नाइक के मुताबिक इसकी वायरलिटी भाजपा के लिए अपेक्षित राजनीतिक सफलता नहीं थी. युवा इसे निजी चैट और ग्रुप में शेयर कर प्रधानमंत्री की प्रस्तुति का मजाक बना रहे थे, उस पर व्यंग्यात्मक ऑडियो लगा रहे थे और प्रतिक्रिया वाले मीम तैयार कर रहे थे. भाजपा ने व्यूज को डिजिटल सफलता माना, जबकि लेखक के अनुसार इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम उस वीडियो को इसलिए आगे बढ़ा रहा था क्योंकि युवा उसे राजनीतिक संदेश के बजाय मीम में बदल चुके थे.
व्हाट्सऐप की रणनीति इंस्टाग्राम पर क्यों नहीं चलती?
नाइक लिखते हैं कि 2012 से 2016 के बीच भाजपा ने ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मजबूत डिजिटल तंत्र खड़ा किया. इन प्लेटफॉर्मों पर पार्टी की रणनीति ऊपर से नीचे की ओर संदेश पहुंचाने की थी. केंद्रीय स्तर पर नैरेटिव तैयार होता और सोशल मीडिया नेटवर्क के जरिए उसे बड़े पैमाने पर प्रसारित किया जाता.
ट्विटर पर हैशटैग अभियान, फेसबुक पर बड़े पेज और व्हाट्सऐप पर ब्रॉडकास्ट नेटवर्क इस मॉडल के लिए प्रभावी थे. लेखक का आरोप है कि आलोचकों के खिलाफ संगठित ऑनलाइन हमले, ट्रोलिंग और उत्पीड़न ने भी विरोधी आवाजों को कमजोर किया. लेकिन आज की युवा पीढ़ी ट्विटर और फेसबुक से काफी हद तक दूर होकर इंस्टाग्राम जैसे विजुअल प्लेटफॉर्म पर पहुंच चुकी है.
फॉलोअर्स नहीं, दर्शक का व्यवहार तय करता है पहुंच
इंस्टाग्राम का मॉडल पुराने सोशल नेटवर्क से अलग है. यहां लाखों फॉलोअर्स होना किसी रील के वायरल होने की गारंटी नहीं है. छोटा अकाउंट भी लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, अगर उसका वीडियो दर्शकों को रोकता है, पूरा देखा जाता है, दोबारा चलाया जाता है या निजी संदेशों में शेयर होता है.
नाइक के मुताबिक यही कारण है कि लंबे राजनीतिक भाषण, औपचारिक वीडियो और प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसी सामग्री इंस्टाग्राम पर मुश्किल में पड़ती है. यदि दर्शक शुरुआती कुछ सेकंड में वीडियो छोड़ देता है, तो उसकी पहुंच कमजोर हो सकती है. इसके विपरीत तेज एडिटिंग, आकर्षक शुरुआत, लोकप्रिय ऑडियो और बार-बार देखने लायक सामग्री एल्गोरिदम के अनुकूल होती है.
जेनरेशन जेड की भाषा है मीम, व्यंग्य और विडंबना
तकनीकी अंतर से ज्यादा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अंतर है. पारंपरिक राजनीतिक प्रचार अधिकारपूर्ण भाषा, स्पष्ट ध्रुवीकरण और नारों की पुनरावृत्ति पर निर्भर करता है. इसके उलट नाइक जेनरेशन जेड की डिजिटल संस्कृति को व्यंग्य, आत्म-परिहास, बेतुके हास्य, पॉप-कल्चर संदर्भों और तेज विजुअल एडिटिंग से जोड़ते हैं.
यही शैली विरोध प्रदर्शनों में भी दिखाई दी. युवा प्रदर्शनकारियों ने व्यंग्यात्मक पोस्टर, अजीबोगरीब प्रॉप्स और हल्के-फुल्के ऑडियो के जरिए गंभीर राजनीतिक संदेश दिए. नाइक के मुताबिक ऐसी सामग्री पर पारंपरिक राजनीतिक जवाबी प्रचार करना कठिन हो जाता है.
केंद्रीकृत प्रचार बनाम हजारों स्वतंत्र क्रिएटर
लेखक का तर्क है कि टेक्स्ट आधारित प्रचार को बड़े पैमाने पर फैलाना सस्ता और आसान है. एक ही संदेश हजारों अकाउंट से पोस्ट किया जा सकता है. लेकिन प्रभावी रील के लिए वीडियो एडिटिंग, सही गति, शुरुआती हुक, ऑडियो, विजुअल फ्रेमिंग और प्लेटफॉर्म की संस्कृति की समझ जरूरी है.
इसके अलावा जरूरत से ज्यादा पॉलिश और योजनाबद्ध राजनीतिक वीडियो इंस्टाग्राम पर बनावटी लग सकते हैं. दूसरी ओर किसी आंदोलन में शामिल हजारों युवा अपने-अपने फोन से अलग-अलग और मौलिक वीडियो बनाते हैं. यह विकेंद्रीकृत मॉडल इंस्टाग्राम की उस व्यवस्था के ज्यादा अनुकूल है, जो एक जैसी सामग्री के बजाय नई और अलग सामग्री को महत्व देती है.
नाइक के अनुसार डिजिटल राजनीति का नियम बदल चुका है. शुरुआती सोशल मीडिया के दौर में संगठन, संदेश पर नियंत्रण और बड़े नेटवर्क सफलता की कुंजी थे. शॉर्ट-वीडियो के दौर में सांस्कृतिक समझ, विजुअल भाषा और वास्तविक जुड़ाव ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं.
हालांकि नाइक इंस्टाग्राम को अपने आप में लोकतांत्रिक या क्रांतिकारी मंच नहीं मानते. उनका कहना है कि मेटा राजनीतिक सामग्री को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है और भविष्य में सत्ता तथा प्लेटफॉर्म के हित एक-दूसरे के करीब आ सकते हैं. लेकिन फिलहाल शॉर्ट-वीडियो की दुनिया को समझने में पारंपरिक राजनीतिक तंत्र की कमजोरी ने युवाओं को डिजिटल राजनीति में एक ऐसी जगह दी है, जहां वे स्थापित प्रचार व्यवस्था से अलग अपना राजनीतिक संवाद खड़ा कर रहे हैं.

