श्रवण गर्ग | देश की हुकूमत को मोदी जी नहीं चला रहे हैं. या तो अमित शाह चला रहे हैं या कोई तीसरी शक्ति 

‘हरकारा डीप डाइव’ लाइव में निधीश त्यागी के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका, छात्र आंदोलन के बाद पैदा हुए राजनीतिक संकट और संसद में सरकार की जवाबदेही पर चर्चा की. बातचीत का केंद्रीय सवाल था कि विपक्ष के लगातार हमलों और संसद में जारी गतिरोध के बीच अमित शाह की भूमिका अब सरकार के लिए कितनी बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुकी है.

श्रवण गर्ग ने याद दिलाया कि करीब एक महीने पहले हरकारा की चर्चा में उन्होंने सवाल उठाया था कि राहुल गांधी का राजनीतिक हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बजाय अमित शाह पर क्यों केंद्रित नहीं है. अब परिस्थितियां बदली हैं और राहुल गांधी सीधे गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. गर्ग के मुताबिक, संसद में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों की ओर से जवाब नहीं आना केवल राजनीतिक रणनीति का मामला नहीं, बल्कि जवाबदेही का गंभीर सवाल है.

जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरा है. राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. गर्ग का सवाल है कि अगर ऐसी जांच होती भी है, तो क्या वह सत्ता के शीर्ष तक पहुंच पाएगी और जिम्मेदारी तय कर सकेगी.

इस आंदोलन को गर्ग ने 1970 के दशक के गुजरात नवनिर्माण आंदोलन और बिहार आंदोलन के संदर्भ में देखा. उनका तर्क है कि कई बड़े आंदोलनों की शुरुआत हॉस्टल फीस, बुनियादी सुविधाओं और छात्रों की छोटी दिखने वाली मांगों से हुई, लेकिन बाद में उनका राजनीतिक प्रभाव राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा. इसी संदर्भ में उन्होंने उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दूसरे इलाकों में छात्रों के स्थानीय मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरने को व्यापक असंतोष के संकेत के रूप में देखा.

चर्चा का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मोदी-शाह सत्ता समीकरण रहा. गर्ग के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 240 सीटों पर सिमटने के बाद सत्ता संचालन की प्रकृति बदली और अमित शाह की भूमिका अधिक केंद्रीय हुई. उन्होंने ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और इसे 2024 के बाद बदली राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़ा.

गर्ग ने कहा, "राहुल ने अटैक सिर्फ एक व्यक्ति पर किया और गायब दो हो गए." उनका इशारा इस ओर था कि अमित शाह पर हमले के बीच प्रधानमंत्री की सार्वजनिक राजनीतिक सक्रियता भी सवालों के घेरे में है.

चर्चा के अंत में सबसे बड़ा सवाल युवा मतदाताओं और लोकतंत्र के भविष्य को लेकर सामने आया. गर्ग का मानना है कि अगर युवाओं का असंतोष संगठित राजनीतिक शक्ति में बदलता है, तो आने वाले चुनावी समीकरण बदल सकते हैं. उनके मुताबिक, मौजूदा घटनाक्रम को किसी पक्ष की जीत के रूप में नहीं, बल्कि चिंता के साथ देखना चाहिए, क्योंकि इसका परिणाम तय कर सकता है कि भारत की लोकतांत्रिक राजनीति आगे किस दिशा में जाती है. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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