अपूर्वानंद | आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि उसका मूल मुद्दा पीछे छूट गया और पूरा विमर्श सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य तक सिमट गया.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और प्रोफेसर अपूर्वानंद ने जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाने की कार्रवाई, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन, शिक्षा व्यवस्था के संकट और सरकार की जवाबदेही पर विस्तार से चर्चा की.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि अदालत में याचिका दायर होने के बाद ही यह आशंका जताई जा रही थी कि सरकार स्वास्थ्य का हवाला देकर पुलिस कार्रवाई करेगी. उनके मुताबिक पिछले कुछ दिनों में आंदोलन का केंद्र शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा सुधार से हटकर सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत बन गया था. सोशल मीडिया पर भी चर्चा का बड़ा हिस्सा उनकी हालत पर केंद्रित हो गया, जिससे सरकार को हस्तक्षेप का अवसर मिल गया. उन्होंने कहा कि अदालत के आदेश और स्वास्थ्य निगरानी को आधार बनाकर जिस तरह पुलिस ने कार्रवाई की, वह पहले से तय रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है.
चर्चा में यह भी कहा गया कि आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में अभिभावक और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र जुड़े. परीक्षा प्रणाली में लगातार सामने आ रही गड़बड़ियों, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता अब केवल छात्रों का मुद्दा नहीं रह गई है. यह सरकार की विश्वसनीयता और प्रशासनिक क्षमता पर भी सवाल खड़ा करता है. इसके बावजूद सरकार की ओर से न तो स्पष्ट जवाब मिला और न ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि पिछले एक दशक में सरकार ने खुद को जवाबदेही से लगभग मुक्त कर लिया है. नोटबंदी, कोविड लॉकडाउन, किसानों की मौत, रेल हादसों और दूसरी घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर संकट में जिम्मेदारी तय करने के बजाय सरकार उससे बचने की कोशिश करती रही है. उनके अनुसार लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही और पारदर्शिता उसकी सबसे महत्वपूर्ण शर्त है.
हालांकि उन्होंने आंदोलन की रणनीति पर भी गंभीर सवाल उठाए. उनका कहना था कि आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया. शुरुआत शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा सुधार से हुई, फिर मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक पहुंची और अंततः पूरा विमर्श सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य तक सीमित हो गया. इससे शिक्षा व्यवस्था के व्यापक संकट, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य जैसे बड़े प्रश्न पीछे छूट गए.
उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन की वैचारिक दिशा स्पष्ट नहीं थी. यदि नई शिक्षा नीति का पहले समर्थन किया गया था, तो उसके खिलाफ आंदोलन की स्पष्ट व्याख्या सामने आनी चाहिए थी. सोशल मीडिया पर मिले व्यापक समर्थन को वास्तविक जन समर्थन मान लेना भी एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई. उनके अनुसार किसी भी आंदोलन के लिए केवल डिजिटल समर्थन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि जमीन पर संगठित जनभागीदारी जरूरी होती है.
गांधीवादी राजनीति पर चर्चा करते हुए प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि गांधी का सबसे बड़ा हथियार अनशन नहीं, बल्कि जनता की गोलबंदी था. उन्होंने शाहीन बाग, किसान आंदोलन और कई आदिवासी आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि स्थायी परिवर्तन तब आता है जब प्रभावित लोग स्वयं अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष करते हैं. उन्होंने अभिजीत दीपके से भी अपील की कि वे दूसरी भूख हड़ताल शुरू करने के बजाय छात्रों, अभिभावकों और नागरिकों को जोड़कर व्यापक जन आंदोलन खड़ा करने पर जोर दें.
चर्चा के अंत में दोनों वक्ताओं ने कहा कि अब निगाहें 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र पर होंगी. बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष शिक्षा व्यवस्था, युवाओं के भविष्य और सरकारी जवाबदेही को राष्ट्रीय बहस का केंद्रीय मुद्दा बना पाएगा या यह आंदोलन भी दूसरे राजनीतिक मुद्दों के बीच दबकर रह जाएगा. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

