‘काउंटरकरेंट्स’ में डॉ. राजेंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा है कि वर्ष 2025 से 2026 के बीच भारत के कई राज्यों में सरकारी चिकित्सा खरीद में बड़े पैमाने पर कथित अनियमितताओं की जांच की गई है. इन मामलों की अवधि, आकार और राजनीतिक परिस्थितियां भले ही अलग-अलग हों, लेकिन इनमें कुछ समानताएं दिखाई देती हैं. इनमें उपकरणों और दवाओं की बढ़ी हुई कीमतें, चुनिंदा कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली निविदाएं और सरकारी अधिकारियों तथा निजी आपूर्तिकर्ताओं के बीच कथित मिलीभगत शामिल हैं. दिल्ली का मामला सबसे प्रमुख बनकर सामने आया है, जहां भाजपा और आम आदमी पार्टी (आप) एक-दूसरे पर आरोप लगा रही हैं.
दिल्ली: 700 करोड़ रुपये तक के घोटाले का आरोप
दिल्ली की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने 2 जून को सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा उपकरणों और दवाओं की खरीद में कथित अनियमितताओं को लेकर मामला दर्ज किया. जांच के दायरे में पोर्टेबल एक्स-रे और सी-आर्म मशीनें, एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन, दवाएं, ओआरएस और सर्जिकल सामग्री शामिल हैं. कथित घोटाले का अनुमानित मूल्य 600 से 700 करोड़ रुपये के बीच बताया गया है. कुछ वस्तुओं की कीमतों में 200 से 500 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी किए जाने का आरोप है.
जांच के अनुसार, लगभग 10 लाख रुपये की कीमत वाली पोर्टेबल एक्स-रे मशीन 33 लाख रुपये में खरीदी गई, जबकि करीब ढाई रुपये का ओआरएस पैकेट 15 रुपये में खरीदा गया. आरोप है कि निविदाओं की शर्तें चुनिंदा कंपनियों के अनुकूल तैयार की गईं और खरीद से जुड़े दस्तावेज भी अधूरे रखे गए. जांचकर्ताओं का दावा है कि फर्जी कंपनियों और विशेष तकनीकी शर्तों के जरिए ठेके पसंदीदा आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंचाए गए.
दिल्ली सरकार के सतर्कता निदेशालय को मिली शिकायत के बाद जांच शुरू हुई थी. शिकायत में सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के बीच कथित साजिश के जरिए निविदाओं में हेरफेर करने का आरोप लगाया गया. केंद्रीय खरीद एजेंसी के पूर्व प्रमुख डॉ. विनोद रंगा, तत्कालीन स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ. वत्सला अग्रवाल और एजेंसी के उप लेखा नियंत्रक नीरज चोपड़ा को गिरफ्तार किया गया. कारोबारी राजीव रंगीला को भी मामले का प्रमुख आरोपी बताया गया है. आरोप है कि मामला दर्ज होने के बाद वह देश छोड़कर चला गया था और बाद में उसे गिरफ्तार किया गया. एसीबी ने लगभग 12,000 पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया है. प्रवर्तन निदेशालय ने धनशोधन का मामला भी दर्ज किया. आंतरिक जांच के बाद दिल्ली सरकार ने पांच फार्मासिस्ट और दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया.
छत्तीसगढ़: कंपनियों के गठजोड़ का आरोप
छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड से जुड़े मामले में जरूरत से अधिक चिकित्सा उपकरण और जांच सामग्री खरीदने के कारण लगभग 550 करोड़ रुपये के नुकसान का आरोप है. जांच एजेंसियों के अनुसार, एक ईडीटीए ब्लड कलेक्शन ट्यूब 2,352 रुपये में खरीदी गई, जबकि अन्य संस्थानों में इसकी अधिकतम कीमत 8.50 रुपये थी. इसी तरह, बाजार में पांच लाख रुपये में मिलने वाली सीबीसी मशीन कथित तौर पर 17 लाख रुपये में खरीदी गई.
आरोप है कि कंपनियों ने गठजोड़ बनाकर एक जैसी रणनीति के तहत निविदाएं जमा कीं. अप्रैल 2025 में छह आरोपियों के खिलाफ लगभग 18,000 पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया गया. प्रवर्तन निदेशालय ने बाद में 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियां जब्त या फ्रीज कीं. ये खरीद जनवरी 2022 से अक्टूबर 2023 के बीच हुई थीं, जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. अब भाजपा सरकार के कार्यकाल में इस मामले की जांच और कार्रवाई जारी है.
उत्तर प्रदेश: पुराने मामलों की जांच
उत्तर प्रदेश में प्रवर्तन निदेशालय लगभग 100 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं की जांच कर रहा है. मामला बलरामपुर, श्रावस्ती, गोंडा और बहराइच के अस्पतालों में दवाओं तथा उपकरणों की खरीद से जुड़ा है. पूर्व कांग्रेस विधायक मुकेश श्रीवास्तव को तीन जिलों में दर्ज प्राथमिकी में मुख्य आरोपी बताया गया है. कुछ कथित अनियमितताएं 2013 और 2014 की हैं.
जांच में घटिया दवाओं और उपकरणों की आपूर्ति तथा ऐसे कार्यों के लिए फर्जी बिल तैयार करने के आरोप सामने आए हैं, जो या तो पूरे नहीं हुए थे या जिनका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं था. जांच एजेंसियों ने 2013-14 से अस्पतालों के रिकॉर्ड मांगे हैं. एक अलग मामले में राज्य की चिकित्सा आपूर्ति निगम के एक अधिकारी को भी बर्खास्त किया गया. आरोप है कि 15 लाख रुपये की निविदा को बढ़ाकर 15 करोड़ रुपये का खरीद आदेश बना दिया गया.
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
दिल्ली में आप ने लगभग 650 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाते हुए भाजपा सरकार पर खरीद के नियम बदलकर पूरी प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में लेने का आरोप लगाया है. भाजपा ने इस आंकड़े को आधारहीन बताया और कहा कि अनियमितताएं सामने आने के बाद सरकार ने स्वयं कार्रवाई की.
आप नेताओं ने सवाल उठाया कि केंद्रीय खरीद एजेंसी में खरीद संबंधी अधिकार केंद्रित क्यों किए गए और वरिष्ठ अधिकारियों की उपलब्धता के बावजूद डॉ. अग्रवाल को महत्वपूर्ण पद पर क्यों नियुक्त किया गया. उन्होंने आरोपी कारोबारी के जर्मनी चले जाने और मुख्यमंत्री तथा स्वास्थ्य मंत्री की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए. भाजपा का कहना है कि सतर्कता जांच, गिरफ्तारियां और निलंबन इस बात का प्रमाण हैं कि व्यवस्था ने कार्रवाई की है. वहीं, विपक्षी दलों का आरोप है कि जांच एजेंसियां राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ चुनिंदा कार्रवाई करती हैं.
सुधार और जवाबदेही की जरूरत
इन मामलों से सरकारी चिकित्सा खरीद व्यवस्था की कई कमजोरियां सामने आती हैं. इनमें खरीद संबंधी अधिकारों का एक ही एजेंसी में केंद्रित होना, बाजार की कीमतों से पर्याप्त तुलना न करना, चुनिंदा कंपनियों के अनुकूल निविदा शर्तें तैयार करना और खरीद से जुड़े दस्तावेजों का उचित रखरखाव न होना शामिल है.
इन कमियों को दूर करने के लिए बाजार और दूसरे राज्यों की कीमतों के आधार पर स्वतंत्र मूल्यांकन, पारदर्शी ई-निविदा प्रक्रिया, नियमित ऑडिट और आपूर्तिकर्ता कंपनियों के वास्तविक मालिकों की जानकारी सार्वजनिक करना जरूरी है. इसके साथ ही जांच और कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए, ताकि उन्हें राजनीतिक बदले की भावना से जोड़कर न देखा जाए.
इन कथित घोटालों का सबसे बड़ा नुकसान सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को होता है. चिकित्सा उपकरणों और दवाओं पर जरूरत से ज्यादा खर्च होने का सीधा असर अस्पतालों में जांच, दवाओं और अन्य सुविधाओं के लिए उपलब्ध बजट पर पड़ता है. दिल्ली, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के मामलों में आरोप अभी कानूनी जांच के अधीन हैं. आरोपियों को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाना चाहिए. सबसे अहम सवाल यह है कि क्या सरकारें इन घटनाओं से सबक लेकर चिकित्सा खरीद व्यवस्था में स्थायी सुधार करेंगी या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बाद इन मामलों को भुला दिया जाएगा.
(डॉ. राजेंद्र चट्टोपाध्याय समाजशास्त्री और नीति शोधकर्ता हैं. )

