सिर्फ ‘दिव्य तलवारें’ ही नहीं, एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक ने नेहरू और सेंगोल पर भाजपा के सिद्धांत को दोहराया
नरेंद्र मोदी सरकार के उस दावे को एनसीईआरटी की कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया है, जिसमें कहा गया था कि 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय सत्ता का हस्तांतरण एक "सेंगोल" (हिंदू धार्मिक नेताओं द्वारा पवित्र किया गया चोल शैली का राजदंड) सौंपकर हुआ था. हालाँकि कई विशेषज्ञ इस सिद्धांत का खंडन कर चुके हैं.
‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी इंडिया एंड बियोंड-पार्ट 2' में यह भी कहा गया है कि शिवाजी सहित मध्यकालीन भारत के कई शासकों के बारे में "माना जाता था" कि उन्हें देवी-देवताओं से तलवारें प्राप्त हुई थीं.
यह पुस्तक मंगलवार को जारी की गई, जो कि नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के छह महीने बाद है. पाठ्यपुस्तक का पहला भाग जून में जारी किया गया था.
एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में लिखा है: "शासन और सुशासन का सांस्कृतिक प्रतीक 'सेंगोल', वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत के नए उद्घाटन किए गए संसद भवन में स्थापित किया गया था. न्यायसंगत शासन के प्रतीक के रूप में सेंगोल का उपयोग करने की परंपरा एक हजार से अधिक वर्ष पूर्व चोल राजवंश के शासनकाल के दौरान शुरू हुई थी."
पाठ्यपुस्तक का यह अध्याय सेंगोल को स्वतंत्रता के समय हुए सत्ता के हस्तांतरण से जोड़ता है. इसमें कहा गया है: "भारत की स्वतंत्रता के अवसर को चिह्नित करने के लिए, 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि के समय, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तमिलनाडु के अधीनम संतों (एक पुरानी शैव परंपरा) से सेंगोल प्राप्त किया था."
सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में सेंगोल के सिद्धांत का कई लोगों द्वारा खंडन किया गया है, जिनमें कांग्रेस, शिक्षाविद राजमोहन गांधी और स्वतंत्रता संग्राम के विशेषज्ञ इतिहासकार आदित्य मुखर्जी शामिल हैं.
मुखर्जी ने कहा था कि उन्हें इस बात का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिला है कि सेंगोल, नेहरू को किसी धार्मिक संस्थान से मिले उपहार से बढ़कर कुछ था. उन्होंने कहा था कि चोल परंपरा और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े इस राजदंड को लेकर मचाया गया यह हंगामा "पूरे घटनाक्रम का हिंदुत्वकरण करने का एक प्रयास था, मानो 1947 में एक हिंदू राष्ट्र की स्थापना हुई हो."
सुधीर (इतिहासकार) को भी ऐसा कुछ सुनने या पढ़ने का स्मरण नहीं था जो इन हालिया दावों की पुष्टि करता हो कि भारत के अंतिम वायसराय, लॉर्ड माउंटबेटन ने नेहरू से सत्ता हस्तांतरण को चिह्नित करने के लिए एक प्रक्रिया का सुझाव देने को कहा था, और कांग्रेस नेता ने सी. राजगोपालाचारी से मदद मांगी थी, जिन्होंने कथित तौर पर तमिलनाडु के शैव मठ 'तिरुववदुथुरई अधीनम' से सोने की परत चढ़ा राजदंड बनवाया था.
राजगोपालाचारी के पोते और उनकी जीवनी लिखने वाले राजमोहन गांधी ने लिखा था कि उन्होंने "सेंगोल की कहानी में राजाजी की कथित भूमिका के बारे में कभी नहीं सुना था."
वर्ष 2023 में नए संसद भवन का उद्घाटन करने के अवसर पर लोकसभा कक्ष में अपने संबोधन में, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि 1947 में सेंगोल ने राजाजी और अधीनमों के मार्गदर्शन में सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक प्रस्तुत किया था.
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने सेंगोल का वर्णन इस प्रकार किया है: "कभी तमिल राजाओं के राज्याभिषेक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग रहा सेंगोल, केवल एक औपचारिक वस्तु नहीं था, बल्कि किसी शासक को सौंपी गई नैतिक जिम्मेदारियों का एक गहन प्रमाण था. इस पवित्र परंपरा को 1947 में भारत की स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर अभूतपूर्व रूप से पुनर्जीवित किया गया था, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू को औपचारिक रूप से सेंगोल भेंट किया गया था."

