हिरेन गोहाईं | भारतीय लोकतंत्र के चारों ओर सिमटती दीवारें
‘काउंटरकरंट्स’ में राजनीतिक टिप्पणीकार हिरेन गोहाईं ने भारतीय लोकतंत्र, निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार की भूमिका पर तीखी आलोचनात्मक टिप्पणी की है. उनका तर्क है कि चुनावी संस्थाओं में कथित अनियमितताओं पर उठ रहे सवालों का जवाब जवाबदेही से नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारियों को राजनीतिक और कानूनी संरक्षण देकर दिया जा रहा है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े विवाद और जनता पार्टी नाम से उभरी राजनीतिक गतिविधियों ने सार्वजनिक चर्चा का ध्यान खींचा है. उनका आरोप है कि सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उठे आरोपों के बीच संसद के समर्थन से उनके चारों ओर सुरक्षा-कवच तैयार किया और निर्वाचन आयोग के अन्य सदस्यों के साथ एकजुटता का प्रदर्शन किया. लेखक इसे आयोग के भीतर दर्ज असहमति और आरोपों को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखते हैं.
लेख में गोहाईं निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हैं. उनका दावा है कि वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके सहयोगी पहले गुजरात में नौकरशाह के रूप में काम कर चुके थे और नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके निर्देशों का पालन करते थे. वह पूर्व केन्द्रीय नौकरशाहों की तुलना में वर्तमान आयोग के सदस्यों के अनुभव और स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाते हैं.
चयन समिति की संरचना में ऐसा हितों का टकराव था जिसमें केंद्र सरकार के दो प्रतिनिधि तीसरे सदस्य को पराजित कर अपनी पसंद के उम्मीदवार चुन सकते थे. वह इस प्रक्रिया को कानूनी और संस्थागत जवाबदेही के लिए समस्या बताते हैं. इसके बाद, उनके आरोप में, निर्वाचन आयोग ने संवैधानिक मानदंडों से हटकर नए नियम लागू किए, जिनसे बड़ी संख्या में लोगों के मताधिकार पर असर पड़ा और चुनावों के संचालन की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे.
गोहाईं विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भी निर्वाचन आयोग की व्याख्या की आलोचना करते हैं. उनका कहना है कि जिस न्यायिक मिसाल का हवाला देकर एसआईआर को उचित ठहराया गया, उसका मूल उद्देश्य मतदाताओं की नागरिकता तय करना नहीं था. लेखक के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग की व्याख्या और अधिकारों को चुनौती देने वाले मामलों में उसके पक्ष को स्वीकार किया, जिससे आयोग के फैसलों को उच्चतम संस्थागत समर्थन मिला.
लेख में गोहाईं इसे किसी एक अधिकारी की कथित गलती के बजाय व्यापक संस्थागत समस्या के रूप में प्रस्तुत करते हैं. उनका आरोप है कि मीडिया के बड़े हिस्से और न्यायपालिका की कानूनी व्याख्याओं ने भी जवाबदेही के सवालों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया. वह इस स्थिति को लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने के रूप में देखते हैं.
गोहाईं जंतर-मंतर पर नागरिक समाज के प्रदर्शन को भय के माहौल को तोड़ने वाला बताते हैं, लेकिन साथ ही कहते हैं कि आंदोलन के उद्देश्य और आगे की रणनीति को लेकर स्पष्टता जरूरी है. उनके अनुसार, केवल किसी मंत्री या अधिकारी को हटाने अथवा मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करने से उन संस्थागत व्यवस्थाओं की जांच नहीं होगी जिनके तहत फैसले लिए जाते हैं.
लेख के अंत में गोहाईं नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं से योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कपिल सिब्बल और दुष्यंत दवे जैसे अनुभवी लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं की बात सुनने का आग्रह करते हैं. उनका निष्कर्ष है कि केवल व्यक्तियों पर ध्यान केंद्रित करने से व्यवस्था की संरचनात्मक समस्याएं अनदेखी रह सकती हैं.

