फ़िलिस्तीनियों के साथ यौन हिंसा: न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट, इज़रायल का मुकदमा और ज़मीनी सच्चाई
इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स के ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा दायर करने का ऐलान किया है. यह क़दम उस लेख के तीन दिन बाद उठाया गया जिसमें वरिष्ठ स्तंभकार निकोलस क्रिस्टोफ़ ने 14 फ़िलिस्तीनी पीड़ितों — पुरुषों और महिलाओं दोनों — के बयानों के आधार पर इज़रायली सुरक्षा बलों द्वारा यौन हिंसा के गंभीर आरोपों का विस्तार से दस्तावेज़ीकरण किया था.
प्रधानमंत्री कार्यालय ने बयान जारी कर कहा कि नेतन्याहू और विदेश मंत्री गिदोन सार ने यह मुकदमा दायर करने के निर्देश दिए हैं. इज़रायल ने इस रिपोर्ट को "आधुनिक प्रेस में इज़रायल के ख़िलाफ़ प्रकाशित सबसे घिनौना और तोड़-मरोड़ा गया झूठ" करार दिया और इसे "ब्लड लाइबल" यानी खून का झूठा आरोप बताया. नेतन्याहू ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा: "मेरे नेतृत्व में इज़रायल चुप नहीं रहेगा. हम इन झूठों से लोकमत की अदालत में और क़ानून की अदालत में भी लड़ेंगे."
हालांकि, क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुकदमा अमेरिकी अदालत में बेहद कठिन राह से गुज़रेगा क्योंकि अमेरिकी संविधान प्रेस को व्यापक संवैधानिक संरक्षण देता है, ख़ासकर सरकारी चुनौतियों के मामले में. यह भी उल्लेखनीय है कि नेतन्याहू पिछले साल भी — गाज़ा में अकाल पर एक रिपोर्ट के बाद — यह जांच कर रहे थे कि "क्या कोई देश न्यूयॉर्क टाइम्स पर मुकदमा कर सकता है."
न्यूयॉर्क टाइम्स के प्रवक्ता चार्ली स्टेड्टलेंडर ने बयान में कहा कि यह "गहराई से रिपोर्ट किया गया ओपिनियन जर्नलिज़्म" है. उन्होंने स्पष्ट किया कि 14 पीड़ितों के बयानों को जहां तक संभव था, गवाहों, परिवार के सदस्यों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से पुष्टि करके तथा मानवाधिकार समूहों की स्वतंत्र शोध, सर्वेक्षणों और संयुक्त राष्ट्र की गवाही से क्रॉस-रेफ़रेंस किया गया है.
इस मामले में यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अख़बार पर दोनों तरफ़ से आलोचनाएं हो रही हैं. एक तरफ़ इज़रायल मुकदमे की धमकी दे रहा है, तो दूसरी तरफ़ आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि क्रिस्टोफ़ का यह लेख "ओपिनियन" सेक्शन में क्यों छापा गया, जबकि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में इज़रायली महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न की रिपोर्टें "न्यूज़" सेक्शन में प्रकाशित हुई थीं. उस दिसंबर 2023 की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे थे — यहां तक कि अख़बार के अपने न्यूज़रूम के भीतर से भी. बाद में 50 पत्रकारिता प्रोफ़ेसरों ने अख़बार से उस रिपोर्ट की जांच की मांग की थी.
निकोलस क्रिस्टोफ़ ने क्या लिखा न्यू यॉर्क टाइमस में 14 पीड़ितों की ज़ुबानी: फ़िलिस्तीनी बंदियों के साथ क्या हुआ
निकोलस क्रिस्टोफ़ एक ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने कांगो से सूडान तक, इथियोपिया से म्यांमार तक — दुनिया के तमाम युद्धक्षेत्रों में यौन हिंसा को क़रीब से देखा और रिपोर्ट किया है. उनका 11 मई 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख "द साइलेंस दैट मीट्स द रेप ऑफ़ पैलेस्टीनियंस" इस संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल आरोप नहीं, बल्कि 14 पीड़ितों के प्रत्यक्ष साक्षात्कारों पर आधारित है जो वकीलों, मानवाधिकार संगठनों, सहायता कर्मियों और आम फ़िलिस्तीनियों से संपर्क करके खोजे गए थे.
क्रिस्टोफ़ लिखते हैं कि इज़रायली नेताओं के यौन हिंसा का आदेश देने का कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में उन्होंने एक ऐसा सुरक्षा तंत्र खड़ा कर दिया है जिसमें यौन हिंसा संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के शब्दों में "मानक संचालन प्रक्रिया" और "फ़िलिस्तीनियों के साथ दुर्व्यवहार का एक प्रमुख तत्व" बन चुकी है. जिनेवा स्थित यूरो-मेड ह्यूमन राइट्स मॉनिटर की एक रिपोर्ट यह निष्कर्ष देती है कि इज़रायल "एक संगठित राज्य नीति के रूप में व्यापक यौन हिंसा" का प्रयोग करता है.
सबसे मर्मांतक गवाही पश्चिमी किनारे के तुल्कर्म के फ्रीलांस पत्रकार सामी अल-साई, 46, की है. अल जज़ीरा और न्यूयॉर्क टाइम्स — दोनों ने उनसे बात की. सामी ने बताया कि 2024 में हिरासत में लिए जाने के बाद जेल की कोठरी में ले जाते वक्त गार्डों के एक समूह ने उन्हें ज़मीन पर पटक दिया. उनकी पैंट और अंडरवियर खींच ली गई. फिर एक गार्ड ने रबर की डंडी का इस्तेमाल किया और उसके बाद गाजर. "यह असहनीय दर्द था. मैं मौत की दुआ माँग रहा था," उन्होंने कहा. आँखों पर पट्टी बंधी होने के बावजूद उन्होंने हिब्रू में यह सुना: "फ़ोटो मत लो" — जिससे उन्हें लगा कि किसी ने कैमरा निकाल लिया था. एक महिला गार्ड ने भी उनके साथ यौन शोषण किया. जब गार्ड चले गए तो उन्हें एहसास हुआ कि यह जगह पहले भी इस्तेमाल हो चुकी है क्योंकि ज़मीन पर दूसरों की उल्टी, खून और टूटे दाँत थे. सामी मेगिड्डो और रिमोन जेलों में फ़रवरी 2024 से जून 2025 तक क़ैद रहे और लगातार पिटाई झेलते रहे. रिहाई के बाद भी वे शारीरिक और मानसिक पीड़ा में हैं.
एक 42 वर्षीया फ़िलिस्तीनी महिला ने बताया कि उन्हें एक धातु की मेज़ पर नग्न अवस्था में जंजीरों से बाँधकर दो दिनों तक इज़रायली सैनिकों ने बलात्कार किया, जबकि दूसरे सैनिक फ़िल्म बनाते रहे. बाद में उन्हें वे तस्वीरें दिखाकर धमकी दी गई कि यदि उन्होंने इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी से सहयोग नहीं किया तो तस्वीरें सार्वजनिक कर दी जाएंगी.
एक गज़ा के पत्रकार ने बताया: "किसी को यौन हमले से नहीं बख़्शा गया. हर कोई किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न से गुज़रा." उन्होंने बताया कि एक बार गार्डों ने उनके गुप्तांग को ज़िप-टाई से बाँधकर घंटों पिटाई की जिसके बाद वे दिनों तक खून पेशाब करते रहे. एक अन्य अवसर पर उन्हें हथकड़ी लगाकर आँखों पर पट्टी बाँधी गई और एक प्रशिक्षित कुत्ते को उन पर छोड़ा गया, जबकि गार्ड हिब्रू में उसे प्रोत्साहित कर रहे थे और कैमरे से फ़ोटो खींच रहे थे. रिहाई पर एक इज़रायली अधिकारी ने उन्हें चेताया: "अगर ज़िंदा रहना चाहते हो तो मीडिया से बात मत करना." फिर भी इस पत्रकार ने बोलने का फ़ैसला किया और कहा: "कुछ पलों में याद करना असहनीय लगता है. लेकिन मुझे याद रहता है कि अभी भी लोग वहाँ बंद हैं. इसलिए मैं बोलता हूँ."
एक किसान जिनका नाम नहीं लिया जा सकता — उन्हें पिछले साल बिना किसी आरोप के कई महीने प्रशासनिक हिरासत में रखा गया — ने बताया कि एक दिन आधा दर्जन गार्डों ने उनकी बाँहें और पैर पकड़कर उन्हें ज़मीन पर गिराया, पैंट उतारी और धातु की डंडी से गुदा में घुसाई. कुछ घंटे बाद बेहोश होने पर वे अस्पताल भेजे गए. होश आने पर उन्हें उसी दिन फिर दो बार यही यातना दी गई. जब उन्होंने शिकायत लिखने के लिए पेन-पेपर माँगा तो गार्ड ने कहा: "अब और भी शिकायत करने को मिल गई है." कुछ दिन बाद शिन बेत (इज़रायल की आंतरिक ख़ुफ़िया एजेंसी) के अधिकारी घर आए और उन्हें चुप रहने की धमकी दी. बाद में उन्होंने क्रिस्टोफ़ से कहा कि वे अपना नाम छापने नहीं देना चाहते.
23 वर्षीया एक फ़िलिस्तीनी महिला जिसे अक्टूबर 2023 के बाद गिरफ़्तार किया गया, ने बताया कि कई दिनों तक बार-बार महिला और पुरुष गार्डों की टीमें आतीं, उन्हें नग्न करतीं, हथकड़ी लगाकर आगे की तरफ़ झुकातीं — कभी-कभी सिर को शौचालय में डुबोतीं — और फिर पिटाई और शरीर पर हाथ फेरती रहतीं. "मुझे नहीं पता कि उन्होंने मेरे साथ बलात्कार किया या नहीं, क्योंकि कभी-कभी मैं पिटाई से बेहोश हो जाती थी," उन्होंने बताया. रिहाई के वक्त छह अधिकारियों ने उन्हें धमकी दी: "अगर बोली तो बलात्कार करेंगे, मार देंगे और पिता को भी."
बच्चों के बारे में क्रिस्टोफ़ ने तीन किशोर लड़कों से बात की जो इज़रायली हिरासत में रह चुके थे. सभी ने यौन उत्पीड़न का वर्णन किया. एक 15 वर्षीय लड़के ने बताया: "वे कहते थे — 'यह करो वरना यह डंडा तुम्हारी गुदा में डाल देंगे.'" सेव द चिल्ड्रन के एक सर्वेक्षण में 12 से 17 साल के जिन बच्चों से बात की गई जो इज़रायली हिरासत में रहे थे, उनमें से आधे से ज़्यादा ने यौन हिंसा देखने या भुगतने की बात कही. संस्था का मानना है कि असली संख्या और अधिक है क्योंकि कलंक के डर से कई बच्चे सच नहीं बताते.
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने 59 फ़िलिस्तीनी पत्रकारों का सर्वेक्षण किया जिन्हें 7 अक्टूबर के बाद इज़रायली अधिकारियों ने रिहा किया था. उनमें से 3 प्रतिशत ने बलात्कार की बात कही और 29 प्रतिशत ने अन्य यौन हिंसा का उल्लेख किया.
इज़रायल में मानवाधिकार वकील सारी बाशी, जो पब्लिक कमेटी अगेंस्ट टॉर्चर इन इज़रायल की कार्यकारी निदेशक हैं, ने कहा: "फ़िलिस्तीनी क़ैदियों के साथ यौन शोषण एक सच्चाई है, यह सामान्य हो चुका है. मुझे इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि इसका आदेश दिया गया हो. लेकिन यह स्थायी सबूत है कि अधिकारियों को इसकी जानकारी है और वे रोक नहीं रहे." उन्होंने बताया कि उनके संगठन ने सैकड़ों शिकायतें दर्ज की हैं, लेकिन एक भी मामले में अभियोग नहीं लगा. "दंडमुक्ति यौन हिंसा को हरी झंडी देती है," उन्होंने कहा. एक अन्य इज़रायली वकील बेन मार्मारेली ने कहा कि जिन फ़िलिस्तीनी क़ैदियों का उन्होंने प्रतिनिधित्व किया उनके अनुभव के आधार पर वस्तुओं से बलात्कार "हर जगह हो रहा है."
पूर्व इज़रायली प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट (2006-2009) ने क्रिस्टोफ़ से कहा: "क्या मुझे विश्वास है कि यह होता है? बिल्कुल." उन्होंने यह भी जोड़ा: "क्षेत्रों में हर दिन युद्धापराध किए जा रहे हैं."
सबसे चर्चित मामला गज़ा के एक क़ैदी का है जिसे जुलाई 2024 में रेक्टम में दरार, टूटी पसलियां और फेफड़े में चोट के साथ अस्पताल भेजा गया. जेल के कैमरे की फुटेज में हमले का दृश्य क़ैद था. नौ रिज़र्विस्ट सैनिकों को हिरासत में लिया गया, लेकिन दक्षिणपंथी भीड़ — जिसमें राजनेता भी शामिल थे — ने जेल तोड़कर सैनिकों के समर्थन में प्रदर्शन किया. मार्च 2026 में सभी आरोप हटा दिए गए और सेना ने सैनिकों को फिर से ड्यूटी पर वापस ले लिया. नेतन्याहू ने इसे "ब्लड लाइबल के अंत" के रूप में सराहा. सारी बाशी ने टिप्पणी की: "आरोप हटाना यानी बलात्कार की अनुमति देना."
क्रिस्टोफ़ ने 1997 के न्यूयॉर्क के उस मामले का हवाला दिया जब पुलिस अधिकारियों ने हाईशियन प्रवासी एबनर लुइमा के साथ बर्बरता की थी. मेयर रूडी जियुलियानी अस्पताल गए, पुलिसकर्मियों पर मुकदमा चला और यह संदेश पूरे पुलिस बल में गया: "जो क़ैदी पर हमला करेगा, उसे सज़ा मिलेगी." क्रिस्टोफ़ का कहना है कि यही संदेश इज़रायली सुरक्षा बलों तक पहुँचना चाहिए. उनका सुझाव है कि ट्रंप प्रशासन यदि रेड क्रॉस की जेल-दौरों की बहाली पर ज़ोर दे, अमेरिकी राजदूत कैमरे के साथ पीड़ितों से मिलें और हथियारों की आपूर्ति को यौन हिंसा की समाप्ति से जोड़ा जाए, तो एक नैतिक और व्यावहारिक संदेश जा सकता है.
पश्चिमी किनारे में यौन हिंसा: ज़मीन ख़ाली करवाने का हथियार
इसी सिलसिले में अल जज़ीरा की संवाददाता फ़य्हा शलश की ज़मीनी रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी किनारे में यौन हिंसा अब छिटपुट घटनाएं नहीं रहीं, बल्कि एक व्यवस्थित औज़ार बन गई हैं जिसके ज़रिए फ़िलिस्तीनियों को उनकी ज़मीन से खदेड़ा जा रहा है.
जॉर्डन घाटी में बेदोइन किसान क़ुसय अबू अल-कबाश, 29, (न्यूयॉर्क टाइम्स में इन्हें सुहैब अबू अल-कबाश के नाम से भी उल्लेख किया गया है) ने बताया कि 13 मार्च की रात 70 से अधिक बसने वालों (सेटलर्स) ने खिर्बत हम्सा अल-फ़ौक़ा पर हमला किया. पाँच सेटलर्स उनके तंबू में घुसे, उन्हें बेल्ट और ज़िप-टाई से बाँधा, पैंट उतारी, गुप्तांगों पर प्रहार किया और ज़िप-टाई बाँधी. "मुझे डर था कि वे मेरे गुप्तांग काट देंगे," उन्होंने कहा. 45 मिनट के इस हमले में बच्चों सहित सभी निवासियों को पीटा गया और सैकड़ों जानवर चुरा लिए गए. क़ुसय ने बताया: "इस यौन हमले का मनोवैज्ञानिक प्रभाव शारीरिक पीड़ा से कहीं अधिक है. मैं बेहद गुस्से में रहने लगा, अकेला रहने लगा और बेचैन रहता हूँ."
यह घटना अप्रैल 2026 में नॉर्वेजियन रेफ़्यूजी काउंसिल के नेतृत्व में और यूरोपीय संघ द्वारा वित्तपोषित वेस्ट बैंक प्रोटेक्शन कंसोर्टियम की उस रिपोर्ट से मेल खाती है जिसमें तीन साल की अवधि में यौन हिंसा के दस्तावेज़ीकरण से यह नतीजा निकला कि 70 प्रतिशत से अधिक विस्थापित परिवारों ने कहा कि महिलाओं और बच्चों के साथ यौन हिंसा की धमकियाँ उनके घर छोड़ने की निर्णायक वजह बनीं. कंसोर्टियम की एलेग्रा पाचेको ने कहा: "यौन हिंसा वह तंत्र है जो लोगों को उनकी ज़मीन से भगा रहा है."
हेब्रॉन में यूथ अगेंस्ट सेटलमेंट्स समूह के समन्वयक ईसा अम्रो — जिन्हें कभी-कभी "फ़िलिस्तीनी गांधी" भी कहा जाता है — ने अल जज़ीरा को बताया कि अक्टूबर 2023 से पहले यौन उत्पीड़न व्यक्तिगत सैनिकों की हरकतें थीं, लेकिन अब यह एक व्यापक परिघटना बन चुकी है. उन्होंने बताया कि इब्राहीमी मस्जिद के इर्द-गिर्द लगे इज़रायली चेकपॉइंट पर महिलाओं और लड़कों को रोज़ परेशान किया जाता है. "इज़रायल इस बात की परवाह नहीं करता कि हम एक रूढ़िवादी समाज हैं. सैनिक महिलाओं को चेकपॉइंट पर उनके सामने कपड़े उतरवाते हैं, संवेदनशील जगहों को छूते हैं और यौन सवाल पूछते हैं," उन्होंने कहा. दिसंबर 2023 में तेल रुमेदा इलाक़े में एक सैनिक ने 17 वर्षीया फ़िलिस्तीनी लड़की के सामने अपनी पैंट उतारी थी.
जेनिन शरणार्थी शिविर की अबीर अल-सब्बाग़, 60, ने बताया कि 13 अप्रैल को शिविर में घर देखने जाते वक्त उन्हें बिना किसी सूचना के तलाशी के लिए रोका गया. महिला सैनिकों ने पहले हाथ से, फिर कपड़े उठवाकर और अंत में पूरे कपड़े उतरवाकर तलाशी ली. जब उन्होंने शिविर में न जाकर वापस जाने की बात कही तो सैनिक ने चिल्लाकर कहा: "तुम्हारी तलाशी होगी चाहे तुम शिविर में जाओ या नहीं." "मुझे वास्तव में अपमानित महसूस हुआ. शायद जो भी हमने जेनिन शिविर के निवासियों के रूप में झेला है, यह मेरे साथ हुई सबसे बुरी बात है," उन्होंने कहा.
फ़िलिस्तीनी अधिकारी मोहम्मद मतर ने बताया कि सेटलर्स ने उन्हें नग्न कर पिटाई की, डंडे से बलात्कार की धमकी दी और आंखों पर पट्टी बाँधकर अर्धनग्न उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली. "छह महीने तक मैं इस बारे में अपने परिवार से भी नहीं बोल सका," उन्होंने कहा. अब वे अपने दफ़्तर की दीवार पर उस तस्वीर को बड़ा करके लगाते हैं — कलंक तोड़ने के लिए.
इज़रायली मानवाधिकार संगठन बी'त्सेलेम ने "फ़िलिस्तीनियों के प्रति यौन हिंसा के एक गंभीर पैटर्न" का दस्तावेज़ीकरण किया है. इज़रायली समूह ब्रेकिंग द साइलेंस को दी गई एक पूर्व इज़रायली जेल अस्पताल अधिकारी की गवाही में कहा गया: "आप देखते हैं कि सामान्य, साधारण लोग ऐसे मुकाम पर पहुँच जाते हैं जहाँ वे लोगों को अपने मनोरंजन के लिए प्रताड़ित करते हैं, किसी पूछताछ के लिए नहीं. मज़े के लिए, दोस्तों को सुनाने के लिए, या बदले के रूप में."
इज़रायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने फ़िलिस्तीनी क़ैदियों को "गंदगी" और "नाज़ी" कहा है और जेल की स्थितियाँ और कठोर बनाने का दंभ भरा है. इज़रायल का कहना है कि सैनिकों द्वारा यौन हिंसा के मामले अलग-थलग घटनाएं हैं और किसी व्यापक नीति का हिस्सा नहीं हैं. जेल सेवा के एक अनाम प्रवक्ता ने आरोपों को "सिरे से नकारा" और कहा कि शिकायतों की जांच होती है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि कभी किसी जेल कर्मचारी को यौन उत्पीड़न के लिए बर्खास्त या अभियोजित किया गया है या नहीं.
संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत रीम अलसलेम ने दिसंबर में कहा था कि इज़रायल ने इज़रायलियों और फ़िलिस्तीनियों दोनों के साथ यौन हिंसा की स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच के लिए पहुँच के अनुरोध का जवाब नहीं दिया है.

