प्रेमपाल शर्मा  | एनटीए इस समय देश के नौजवानों को मुंह दिखाने लायक नहीं है 

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस विस्तृत इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी ने पूर्व रेलवे अधिकारी, लेखक और शिक्षा मामलों के जानकार डॉ. प्रेमपाल शर्मा के साथ नीट परीक्षा पेपर लीक, एनटीए की कार्यप्रणाली, भर्ती परीक्षाओं में बढ़ती अनियमितताओं और देश के युवाओं के भीतर बढ़ते अविश्वास पर लंबी बातचीत की. चर्चा की शुरुआत इस सवाल से हुई कि आखिर क्यों देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाएं लगातार विवाद, पेपर लीक और भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आती जा रही हैं.

प्रेमपाल शर्मा ने बातचीत की शुरुआत बेहद तीखी टिप्पणी से की. उन्होंने कहा कि “अगर केमिस्ट्री की भाषा में कहूं तो पानी 100 डिग्री पर उबलता है, लेकिन मेरे भीतर का पानी 1000 डिग्री पार कर चुका है.” उनके अनुसार पिछले कई वर्षों से देश में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं का जो हाल है, उसने करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों के भीतर गहरा गुस्सा और निराशा पैदा कर दी है.

उन्होंने कहा कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए को इसी उद्देश्य से बनाया गया था कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं पारदर्शी और पेशेवर तरीके से करवाई जा सकें, लेकिन लगातार हो रहे पेपर लीक ने इस संस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. प्रेमपाल शर्मा के अनुसार नीट जैसी परीक्षा केवल एक एग्जाम नहीं है, बल्कि करोड़ों परिवारों के सपनों और वर्षों की मेहनत से जुड़ा सवाल है. उन्होंने कहा कि “22 लाख छात्र परीक्षा देते हैं, लेकिन असल में एक करोड़ से ज्यादा लोग इस प्रक्रिया में शामिल होते हैं.”

बातचीत में उन्होंने शिक्षा व्यवस्था की उस मानसिकता की भी आलोचना की जिसमें “शिक्षा” की जगह केवल “परीक्षा” बची रह गई है. उन्होंने कहा कि भारत में केजी से लेकर मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश तक हर स्तर पर केवल परीक्षा का दबाव बनाया गया है. उनके शब्दों में, “भारतीय शिक्षा व्यवस्था अब शिक्षा नहीं, सिर्फ परीक्षा बनकर रह गई है.”

प्रेमपाल शर्मा ने भर्ती परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं का भी जिक्र किया. उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती, बिहार शिक्षक भर्ती, सीयूईटी, स्टाफ सिलेक्शन कमीशन और अन्य परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों को उदाहरण बताते हुए कहा कि समस्या किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था में फैल चुकी है. उनके अनुसार परीक्षा संचालन का काम जिन एजेंसियों और निजी संस्थानों को दिया जाता है, उनमें पेशेवर जवाबदेही और नैतिकता का गंभीर अभाव है.

बातचीत के दौरान उन्होंने समाज की सामूहिक नैतिकता पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि नकल और पेपर लीक केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सामाजिक संकट भी है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गांवों और कस्बों में आज भी ऐसे माहौल को सामान्य माना जाता है जहां रिश्तेदारों और परिचितों के जरिए नकल कराने की कोशिशें होती हैं. उनके अनुसार जब समाज में मेहनत की बजाय “जुगाड़” को स्वीकार्यता मिल जाती है, तब ऐसी घटनाएं लगातार होती रहती हैं.

प्रेमपाल शर्मा ने इस बात पर भी चिंता जताई कि जिन बच्चों पर सबसे ज्यादा दबाव डाला जाता है, वे अक्सर साधारण और मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं. उन्होंने कहा कि अमीर और प्रभावशाली वर्ग अपने बच्चों को विदेश भेज देता है, लेकिन सामान्य परिवारों के बच्चे इन्हीं परीक्षाओं को अपनी जिंदगी का एकमात्र रास्ता मानते हैं. उन्होंने यूक्रेन युद्ध के दौरान विदेशों में पढ़ रहे भारतीय मेडिकल छात्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था की असमानता उसी समय खुलकर सामने आ गई थी.

इंटरव्यू में एनटीए और सरकार की जवाबदेही को लेकर भी तीखे सवाल उठे. प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि हर बार जांच एजेंसियों और सीबीआई को मामला सौंप देने से समस्या का समाधान नहीं होगा. उन्होंने मांग की कि पिछले वर्षों में हुए सभी पेपर लीक मामलों की सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए और यह बताया जाना चाहिए कि दोषियों को क्या सजा मिली. उनके अनुसार जब तक बड़े स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है.

बातचीत के अंत में निधीश त्यागी ने प्रेमपाल शर्मा से पूछा कि ऐसे माहौल में 17-18 साल के उन युवाओं से क्या कहा जाए जिनके सपने और उम्मीदें इन परीक्षाओं से जुड़ी हैं. जवाब में प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि युवाओं को सबसे पहले हर बात को तर्क और वैज्ञानिक सोच की कसौटी पर परखना सीखना होगा. उन्होंने कहा कि मेहनत, ज्ञान और विवेक को आदर्श बनाने की जरूरत है, न कि अंधविश्वास और दिखावे को.

उन्होंने यह भी कहा कि अगर देश अपने युवाओं की ऊर्जा, उम्मीद और विश्वास को लगातार तोड़ता रहेगा, तो उसका असर केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे समाज और लोकतंत्र पर पड़ेगा. पूरी वीडियो यहाँ देखी जा सकती है.

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