बंगाली मुसलमानों को अपने ही देश में बाहरी बना रहा है भारतीय राज्य
‘स्क्रोल’ में अभिषेक साहा ने लिखा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में बंगाली भाषी मुस्लिम कामगारों को उनकी भाषा, धर्म और पहचान के आधार पर संदेह की निगाह से देखा जा रहा है. उनके अनुसार, कई मामलों में नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ों की जांच से पहले ही लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है और कुछ को बांग्लादेश भेजा गया है.
हाल के हफ्तों की घटनाओं का हवाला देते हुए साहा लिखते हैं कि बंगाली भाषी मुस्लिम होना ही सरकारी अधिकारियों के संदेह का कारण बनता दिख रहा है. बेंगलुरु में पिछले महीने कथित अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए चलाए गए अभियान के दौरान करीब 3,000 बंगाली मुस्लिम कचरा और अपशिष्ट प्रबंधन कामगारों को पुलिस ने पूछताछ के लिए उठाया. इनमें से केवल 31 लोगों को बांग्लादेशी नागरिक पाया गया और उन्हें बांग्लादेश भेजने की प्रक्रिया के लिए पश्चिम बंगाल भेजा गया.
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में भी पश्चिम बंगाल के 23 कामगारों को बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया. इनमें एक हिंदू और बाकी मुस्लिम थे. जुलाई में उत्तर 24 परगना की एक मुस्लिम महिला को मुंबई में हिरासत में लेकर बांग्लादेश भेजे जाने का मामला भी सामने आया.
लेख के अनुसार, ये घटनाएं पिछले साल से जारी उस सिलसिले का हिस्सा हैं, जिसमें देशभर से हजारों बंगाली मुस्लिम कामगारों को हिरासत में लिया गया और सैकड़ों को बिना मुकदमे या उचित कानूनी प्रक्रिया के बांग्लादेश भेज दिया गया. इनमें कुछ लोग बांग्लादेश से आए अनियमित प्रवासी थे, लेकिन कई बंगाली भाषी भारतीय नागरिक भी थे, जो रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में गए थे. कुछ निर्वासित लोगों को बाद में भारत में दोबारा प्रवेश देना पड़ा.
साहा के मुताबिक, इन घटनाओं में दो प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं. पहली, अधिकारियों का संदेह व्यक्ति की भाषा, जातीय पहचान और धर्म से जुड़ा है; दस्तावेज़ों की जांच बाद में होती है. दूसरी, नागरिकता साबित करने के लिए दिए गए दस्तावेज़ों को अक्सर पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता. परिवारों द्वारा स्कूल, जमीन और मतदाता सूची से जुड़े रिकॉर्ड पेश करने के बावजूद कार्रवाई की जाती है. नामों की वर्तनी में मामूली अंतर भी दस्तावेज़ों को अमान्य मानने का आधार बन सकता है.
लेख में कानूनी विद्वान मोहसिन भट्ट की अवधारणा ‘दस्तावेज़ी दोहरी मानसिकता’ का उल्लेख है. इसके तहत अधिकारी एक ओर नागरिकता के प्रमाण के रूप में पेश दस्तावेज़ों पर संदेह करते हैं, वहीं दूसरी ओर लोगों से लगातार और दस्तावेज़ मांगते हैं. साहा इसे ऐसी प्रक्रिया बताते हैं जिसमें गरीब और प्रवासी परिवारों के लिए अपनी नागरिकता साबित करना कठिन हो जाता है.
लेख में सुनाली खातून और स्वीटी बीबी के उदाहरण दिए गए हैं, जिन्हें बांग्लादेश भेजे जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर भारत लौटने दिया गया. असम की मुमताज बेगम अब भी बांग्लादेश में हैं. गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने उनके निष्कासन के लिए राज्य सरकार को दो लाख रुपये मुआवजा देने और केंद्र से उनकी वापसी सुनिश्चित करने को कहा है.
साहा का तर्क है कि किसी देश को अनियमित प्रवासन पर कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन ऐसी कार्रवाई में अपने नागरिकों के अधिकारों और उचित कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी नहीं होनी चाहिए. लेख के अंत में वह चेताते हैं कि पहचान के आधार पर नागरिकों को देश से बाहर धकेलना समान नागरिकता की संवैधानिक अवधारणा को कमजोर करता है.

