दिव्यांगों की देखभाल के लिए प्रशिक्षित सहायकों की कमी, सरकारी योजनाओं का सीमित असर
‘स्क्रोल’ की रिपोर्ट में दिव्यांग व्यक्तियों और उनके परिवारों के सामने नियमित देखभाल, प्रशिक्षित सहायकों की कमी और बढ़ते खर्च की चुनौतियों को रेखांकित किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की योजनाओं के बावजूद देखभाल के लिए प्रशिक्षित कार्यबल और सुलभ सेवाओं का अभाव बना हुआ है.
मार्च 2022 में राहुल कुमार के परिवार ने तीन दिन के लिए एक निजी एजेंसी से नर्स नियुक्त की. पांच साल पहले उन्हें मोटर न्यूरॉन बीमारी का पता चला था. बीमारी बढ़ने के साथ वे व्हीलचेयर पर निर्भर हो गए थे और रोजमर्रा के कामों के लिए देखभालकर्ता की जरूरत पड़ने लगी थी. परिवार ने नर्स की सेवा के लिए 8,300 रुपये दिए, लेकिन काम के दूसरे दिन वह राहुल को बाथरूम में छोड़कर घर का सामान लेकर भाग गया.
परिवार के अनुसार, एजेंसी ने केवल 4,900 रुपये लौटाने की पेशकश की और यह भी स्वीकार किया कि नर्स को नियुक्त करने से पहले उसका आपराधिक रिकॉर्ड नहीं जांचा गया था. राहुल के बहनोई सुमीत पारिक्षित, जो दिव्यांग व्यक्तियों के रोजगार को बढ़ावा देने वाले राष्ट्रीय केंद्र में कार्यक्रम प्रबंधक हैं, कहते हैं कि यह घटना प्रशिक्षित और भरोसेमंद देखभालकर्ताओं की कमी को दिखाती है.
पारिक्षित के मुताबिक, दिव्यांगता के साथ जीवनयापन का खर्च बहुत अधिक है. दवाइयों और देखभालकर्ताओं के खर्च के अलावा, दिल्ली में सुलभ आवास मिलना कठिन है और कुछ हद तक सुलभ घरों का किराया 45,000 रुपये से अधिक हो सकता है. कई न्यूरोलॉजिकल या बौद्धिक दिव्यांगताओं वाले लोगों के लिए नियमित रोजगार संभव नहीं होता, जिससे परिवार की आर्थिक निर्भरता और बढ़ जाती है.
‘सहयोगी’ योजना सीमित प्रशिक्षण के बाद बंद
सरकार ने 2015 में ‘सहयोगी’ योजना शुरू की थी, जिसका उद्देश्य ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी और बहु-दिव्यांगता वाले लोगों की देखभाल के लिए प्रशिक्षित कार्यबल तैयार करना था. इसमें कम से कम आठवीं कक्षा तक पढ़े उम्मीदवारों को दैनिक गतिविधियों में सहायता, सहायक उपकरणों के उपयोग, स्वास्थ्य, पोषण और गतिशीलता से जुड़े प्रशिक्षण देने का प्रावधान था.
‘स्क्रॉल’ की सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जवाब में राष्ट्रीय न्यास ने बताया कि 2015 से 2019 के बीच इस योजना के तहत केवल 1,762 लोगों को देखभालकर्ता के रूप में प्रशिक्षित किया गया. 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांग व्यक्ति थे. विशेषज्ञों का कहना है कि इतने सीमित प्रशिक्षित कार्यबल से परिवारों की जरूरत पूरी होना संभव नहीं था.
मुंबई स्थित सोसाइटी ऑफ पेरेंट्स ऑफ चिल्ड्रेन विद ऑटिस्टिक डिसऑर्डर्स की ट्रस्टी रुबीना लाल के अनुसार, योजना में प्रशिक्षित लोगों को नौकरी खोजने में कठिनाई हुई और जरूरतमंद परिवारों को भी यह पता नहीं था कि देखभालकर्ता कहां मिलेंगे. प्रशिक्षण की अवधि और कौशल भी सीमित थे. योजना में तीन महीने का प्राथमिक और छह महीने का उन्नत प्रशिक्षण था, लेकिन इसमें इंजेक्शन लगाने जैसे अधिक उन्नत कौशल शामिल नहीं थे. वर्ष 2019 में योजना बंद कर दी गई. प्रशिक्षित लोगों का कोई रजिस्टर भी नहीं रखा गया.
बुजुर्गों की देखभाल के लिए प्रशिक्षण, दिव्यांगों के लिए कमी
रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने कहा है कि सरकार ने बुजुर्गों की देखभाल के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया. 2022 में शुरू की गई पीएम स्पेशल योजना के तहत तीन वर्षों में एक लाख जेरियाट्रिक केयरगिवर्स को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया था. केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि वित्त वर्ष 2023-24 में इस कार्यक्रम के तहत 36,785 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया.
इसके विपरीत, दिव्यांग व्यक्तियों के लिए देखभाल सेवाओं का विस्तार सीमित रहा है. ‘समर्थ-कम-घरौंदा’ योजना के तहत अनाथ और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के दिव्यांग सदस्यों के लिए आवासीय देखभाल केंद्र स्थापित किए जाने हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे केवल 11 पंजीकृत संगठन हैं और दिल्ली में इस योजना के तहत कोई केंद्र संचालित नहीं है.
परिवारों पर आर्थिक और भावनात्मक दबाव
दिल्ली में 20,000 रुपये मासिक आय वाले परिवार की काजल कश्यप की छह वर्षीय बेटी रिधिशा को सेरेब्रल पाल्सी है. वह नगर निगम के स्कूल में पढ़ती है, जहां फिलहाल विशेष शिक्षक उपलब्ध नहीं है. निजी विशेष स्कूलों की फीस और दूरी परिवार की पहुंच से बाहर है. कश्यप को उम्मीद है कि उनकी बेटी के भविष्य के लिए औपचारिक सहायता व्यवस्था विकसित होगी.
दिव्यांगता पेंशन और अन्य सहायता योजनाओं का लाभ लेने के लिए यूनिक डिसएबिलिटी आईडी (यूडीआईडी) कार्ड जरूरी है. सरकारी पोर्टल के अनुसार, आवेदन के बाद कार्ड मिलने में 264 दिन तक लग सकते हैं. रिपोर्ट में मिले कुछ परिवारों ने एक साल से अधिक प्रतीक्षा की बात कही.
कुछ गैर-सरकारी संस्थाएं इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रही हैं. दिल्ली के वसंत कुंज स्थित ‘मुस्कान’ का आवासीय केंद्र 20 वर्ष से अधिक उम्र के अधिकतम 16 लोगों को रहने, व्यावसायिक कौशल सीखने और सामुदायिक जीवन में भाग लेने का अवसर देता है. लेकिन केंद्र के 16 निवासियों की देखभाल के लिए 15 प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है और परिवारों को प्रति माह 42,000 रुपये तक खर्च करना पड़ सकता है.
रिपोर्ट में विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे केंद्र उपयोगी मॉडल हो सकते हैं, लेकिन व्यापक जरूरत पूरी करने के लिए प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं, सुलभ सेवाओं और सरकारी सहायता की अधिक मजबूत व्यवस्था जरूरी है.
यह रिपोर्ट इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर डिसएबिलिटी इन्क्लूजन की पत्रकारिता फेलोशिप के सहयोग से तैयार की गई है.

