आकार पटेल | बहिष्करण अभियान: भारत अपनी चुनावी विरासत क्यों नष्ट कर रहा है?

आजकल एक बेघर व्यक्ति के लिए निवास स्थान की आवश्यकता पूरी करने हेतु, 'बीएलओ [बूथ लेवल ऑफ़िसर] दिए गए पते पर... रात को यह सुनिश्चित करने के लिए जाएगा कि बेघर व्यक्ति वास्तव में उस स्थान पर सोता है जिसे उसने अपना पता बताया है... यदि बीएलओ यह सत्यापित करने में सक्षम हो जाता है कि बेघर व्यक्ति वास्तव में उस स्थान पर सोता है, तो निवास स्थान का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण आवश्यक नहीं होगा.' (भारत निर्वाचन आयोग, बूथ लेवल ऑफ़िसर्स के लिए हैंडबुक 2011).

"25 सितंबर 1948 के प्रेस नोट में 'मतदाता के रूप में शरणार्थियों के अधिकार' और चुनावी रोल में उनके समावेश के निर्देशों को विस्तार से शामिल किया गया था. प्रेस 'चुनावी रोल तैयार करने में प्रगति' के शीर्षक के अंतर्गत पूरे देश से ख़बरें लाती रही. इसने बताया कि पूर्वी पंजाब सरकार ने चुनावी रोल पूरा करने की अंतिम तिथि 31 अक्टूबर 1948 तक बढ़ा दी 'क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों ने अपना पंजीकरण नहीं कराया था'."

ये अंश ओर्नित शानी की पुस्तक 'हाउ इंडिया बिकेम डेमोक्रेटिक: सिटिज़नशिप एंड द मेकिंग ऑफ़ द यूनिवर्सल फ्रैंचाइज़' से लिए गए हैं. इनका उद्देश्य यह दर्शाना है कि दशकों से, जब भी मतदाताओं और उनके अधिकारों की बात आई है, भारतीय राज्य का ध्यान समावेश पर रहा है.

सरकार की एक और अनुदेश यहाँ है: "किसी पेढ़ी या दुकान में सोने वाले व्यक्ति या किसी होटल की अटारी में सोने वाले नौकर उस क्षेत्र के चुनावी रोल में शामिल होने के हक़दार होंगे जिसमें वह पेढ़ी, दुकान या होटल स्थित हो. इसी प्रकार, नगरपालिका की ज़मीन पर बनी झोपड़ियों में रहने वाले आवारा लोग भी मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के हक़दार होंगे. सामान्य या पिछले गलियारों, बालकनियों या सीढ़ियों में सोने वाले घरेलू नौकर भी समावेश के योग्य हैं."

क़रीब 25 साल पहले, एक पाकिस्तानी चैनल पर उनके मशहूर पत्रकार नजम सेठी ने मनोहर सिंह गिल का साक्षात्कार लिया था. गिल अभी-अभी भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त पद से सेवानिवृत्त हुए थे और चर्चा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की शुरुआत के बारे में थी. इस उपकरण को अत्यधिक जटिल और उपयोग में डरावना माना जाता था. इसे परखने के लिए, गिल और उनकी टीम इसे एक सब्ज़ी बाज़ार में ले गई. उन्होंने अपने प्रयोग में देखा कि बाज़ार के लोग इसका इस्तेमाल कैसे करते हैं और उन्होंने वही पाया जो हम सब अब जानते हैं: कि इसका उपयोग करना आसान है.

इसने भारत के चुनावी इतिहास के उस दौर का अंत किया जब चुनाव अक्सर विवादित होते थे और गड़बड़ी के आरोप लगाए जाते थे (जिसे उन दिनों बूथ-कैप्चरिंग कहा जाता था). अब हम यह नहीं सुनते, क्योंकि, मतदाताओं के समावेश के मामले की तरह, राज्य और चुनाव आयोग मतदाताओं के अधिकारों और उनके मतदान को आसान बनाने पर केंद्रित थे.

वह दौर अब समाप्त हो गया है. वह केंद्रितता भी समाप्त हो गई है.

सरकार और चुनाव आयोग अब बहिष्करण पर आमादा हैं और वे इसमें सफल भी हुए हैं. हाल ही में लाखों बंगालियों को मतदाता सूची से हटाए जाने को सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृति मिल गई है और इसे अन्य राज्यों में भी दोहराया जाएगा.

ग़लत तरीक़े से हटाए गए योग्य मतदाता अपील कर सकते हैं और बाद में ख़ुद को बहाल करवा सकते हैं, लेकिन इस बार उनका वोट नकार दिया गया है. कई लोगों को यह एक अवैध चुनाव जैसा लगता है और इसीलिए हमने वह भारतीय युग समाप्त कर दिया है जिसमें राजनीतिक दल और विशेष रूप से चुनाव हारने वाले दल, परिणामों और चुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र मानते हुए स्वीकार करते थे. लाखों व्यक्तियों के लिए इससे जुड़े अन्य मुद्दे भी होंगे.

13 मई की एक सुर्ख़ी पढ़ती है: "एसआईआर-हटाए गए लोग सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा सकते, बंगाल सरकार का कहना; बिहार के सीएम ने बैंक पासबुक रद्द करने की बात की." लेकिन आज हमें वहाँ नहीं जाना है.

हम जानबूझकर एक ऐसी चुनावी प्रणाली को क्यों तोड़ रहे हैं जो काम करती रही है? इसका कोई जवाब नहीं है, और इस बेतुके बदनामी कि विदेशी यहाँ वोट डाल रहे हैं — इस पर कोई आँकड़ा नहीं है और कभी रहा भी नहीं. असम में एनआरसी की भयावह प्रक्रिया की तरह, जो तत्कालीन सरकार के किसी समर्थन-डेटा के बिना हिस्टेरिकल नोट के साथ शुरू हुई थी, हमने यह मान लिया है कि एक समस्या है और सबसे चरम तरीक़े से उसे सुलझाने पर आमादा हैं.

इसके उस राष्ट्र के लिए परिणाम होंगे जिसकी सरकार उसे लोकतंत्र की जननी कहती है. इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने अब 'सार्वभौमिक मताधिकार' शब्द के अर्थ को कमज़ोर कर दिया है.

शानी अपनी पुस्तक की शुरुआत इन शब्दों से करती हैं, जो आज के संदर्भ में मनन के योग्य हैं:

"नवंबर 1947 से भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर पहले मसौदा चुनावी रोल की तैयारी शुरू की. संविधान सभा के सचिवालय में मुट्ठी भर नौकरशाहों ने यह काम शुरू किया. उन्होंने यह भारत-पाकिस्तान के बँटवारे के बीच किया जो भूमि और लोगों को अलग-अलग कर रहा था, और जब 552 संप्रभु रियासतों को अभी भारत में एकीकृत किया जाना था. अनेक बाधाओं के बावजूद अगले दो वर्षों में सभी वयस्क भारतीयों को मतदाता बनाना, और वह भी संविधान के लागू होने से पहले, जब वे औपचारिक रूप से नागरिक भी नहीं बने थे, इसके लिए अपार कल्पनाशक्ति की ज़रूरत थी. ऐसा करना भारत का उपनिवेशवाद से मुक्ति का साहसिक कदम था. यह औपनिवेशिक शासन की कोई विरासत नहीं थी: भारतीयों ने ख़ुद के लिए सार्वभौमिक मताधिकार की कल्पना की, इस कल्पना पर अमल किया और इसे अपनी राजनीतिक वास्तविकता बनाया. 1949 के अंत तक भारत ने विश्व की लोकतांत्रिक कल्पना की सीमाओं को पार कर लिया और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को जन्म दिया."

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