एम.एच. इलियास | गांधी आज भी प्रासंगिक हैं
एम.एच. इलियास ने लिखा है कि आज के अनिश्चित और उथल-पुथल भरे दौर में महात्मा गांधी को विचार के किस खांचे में रखा जाए? क्या वे बीसवीं सदी के एक आदर्शवादी थे, एक दार्शनिक अराजकतावादी जिन्होंने हमेशा राज्य की सत्ता को कमतर माना, या एक ऐसे उदारवादी विचारक जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता को राज्य की सर्वोपरिता से ऊपर रखते थे? अथवा उन्हें उत्तर-औपनिवेशिक चेतना के ऐसे स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसने आधुनिकता की यूरो-केंद्रित और अमानवीय अवधारणाओं को चुनौती दी? गांधीवादी विचारों के शोधकर्ताओं और अध्यापकों के लिए यह एक उलझाऊ प्रश्न रहा है.
यह सवाल आज इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि गांधी का 'प्रतिरोध का विचार' दुनिया भर में समाज और राजनीति को लोकतांत्रिक बनाने वाले आंदोलनों को लगातार प्रेरित कर रहा है. बाल्टिक देशों की 'सिंगिंग रिवोल्यूशन' (1987-1991) से लेकर 'अरब स्प्रिंग' तक इसके अनगिनत प्रमाण मिलते हैं. हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर छात्रों का विरोध प्रदर्शन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि गांधीवादी सत्याग्रह आज भी लोकतांत्रिक प्रतिरोध का सबसे प्रभावी माध्यम है.
अनुभवों से गढ़ा गया बौद्धिक संसार
गांधी के प्रतिरोध संबंधी विचारों के निर्माण के बारे में कई सिद्धांत हैं, लेकिन वे सभी एक बिंदु पर सहमत हैं: गांधी की सोच को उनके व्यक्तिगत अनुभवों ने सबसे गहराई से आकार दिया. मानवविज्ञानी जोसेफ एस. अल्टर गांधी को एक "अनूदित विचारक" मानते हैं, जिनका बौद्धिक जगत मुख्य रूप से भारतीय और पश्चिमी ग्रंथों के अनुवादों के अध्ययन से निर्मित हुआ था.
लंदन में अपने छात्र जीवन के दौरान वे मूल भाषाओं में शास्त्र पढ़ने से दूर थे. उदाहरण के लिए, उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता को संस्कृत या अपनी मातृभाषा गुजराती में नहीं, बल्कि इसके अंग्रेजी अनुवाद में समझा. यानी अपने धर्म की मौलिक समझ भी उन्हें पश्चिमी लेखकों और अनुवादों के माध्यम से प्राप्त हुई. फिर भी, उन्होंने अपने जीवन के व्यावहारिक अनुभवों को कभी किसी सिद्धांत के अधीन नहीं माना; वही अनुभव उनकी राजनीतिक सोच का आधार बने.
अहिंसक विरोध और सत्याग्रह के बीजारोपण का श्रेय आमतौर पर दक्षिण अफ्रीका के उनके अनुभवों को दिया जाता है. लेकिन इसके शुरुआती अंकुर लंदन के छात्र जीवन में ही फूट चुके थे. वहाँ वे समाजवादियों, अराजकतावादियों और स्वतंत्र विचारकों के संपर्क में आए, जो औद्योगिक पूंजीवाद के तीखे आलोचक थे. ब्रिटिश युवाओं के पहनावे और तौर-तरीकों की नकल करने के शुरुआती प्रयास के बाद, गांधी को जल्द ही यह अहसास हुआ कि इन युवाओं से सीखने योग्य सबसे बड़ी बात राजनीतिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता है.
पश्चिमी लोकतंत्र और 'हिंद स्वराज' की पृष्ठभूमि
ब्रिटिश संसदीय राजनीति के प्रत्यक्ष अनुभव ने गांधी को प्रक्रियात्मक लोकतंत्र से मोहभंग की स्थिति में ला खड़ा किया. उन्होंने केवल संसद जैसी संस्थाओं के कामकाज से लोकतंत्र के मूल्यांकन की परंपरा को बेमानी माना. बहुसंख्यकवादी सहमति और दलीय राजनीति की सत्ता-लोलुपता को उन्होंने पाखंडी पाया. इन्हीं अंतर्दृष्टियों ने आगे चलकर पश्चिमी संसदीय लोकतंत्र की उनकी उस प्रसिद्ध और तीखी आलोचना की नींव रखी, जिसे उन्होंने अपनी मौलिक पुस्तक 'हिंद स्वराज' में रेखांकित किया.
गांधी ने पश्चिमी लोकतंत्र को केवल 'जनसंख्या पर शासन करने की तकनीक' के रूप में देखा, न कि एक वास्तविक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में. उनकी दृष्टि में सार्वजनिक प्रश्नों के माध्यम से सत्ता के खिलाफ नैतिक असहमति दर्ज कराना लोकतंत्र की जीवन-वायु है.
गांधी लोकतंत्र के औपचारिक संवैधानिकरण के पक्षधर नहीं थे; उनका मानना था कि संवैधानिक रूप देने से लोकतंत्र की मूल आत्मा दब जाती है, जबकि इसे जनता के भीतर स्वाभाविक रूप से जीवित रहना चाहिए. पूरे जीवन भर उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति अगाध निष्ठा बनाए रखी.
अनुभवात्मक राजनीति और जनता का सीधा संवाद
1914 के बाद गांधी का सार्वजनिक जीवन दुनिया के सबसे अधिक प्रलेखित इतिहासों में से एक है. उनकी हर यात्रा, विविध लोगों से संवाद और रोज़मर्रा के सामाजिक अनुभवों ने उनके विचारों को लगातार अद्यतन किया.
गांधी का लोकतंत्र शासन का कोई ढांचा मात्र नहीं था, बल्कि एक जीवंत, अनुभवात्मक राजनीतिक प्रक्रिया था. इस विचार में असहमति या भिन्न राय कोई व्यवधान नहीं, बल्कि नागरिक का नैतिक कर्तव्य है. ऐसा लोकतंत्र राज्य की संस्थागत संरचनाओं से बाहर जनता की सीधी लामबंदी से आकार लेता है.
जंतर-मंतर प्रदर्शन और गांधीवादी मॉडल
जंतर-मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन गांधी के सत्याग्रह के मूल सिद्धांतों से पूरी तरह मेल खाता है. जिस प्रकार गांधी ने ब्रिटिश शासन के संस्थागत अन्याय को बेनकाब करने के लिए अहिंसक साधनों का उपयोग किया, उसी प्रकार इन प्रदर्शनकारियों ने धरनों, उपवासों, सार्वजनिक प्रश्नों और शांतिपूर्ण रैलियों के माध्यम से सरकार की कमियों को उजागर किया. जब सत्ता ने दमन का सहारा लिया, तो उसने अपनी ही साख खो दी.
सोशल मीडिया और अनौपचारिक नेटवर्क के ज़रिए स्वतःस्फूर्त रूप से उभरा यह आंदोलन गांधी के इस विश्वास को दोहराता है कि सच्चे आंदोलन राजनीतिक दलों की ऊपर-से-नीचे वाली व्यवस्था के बजाय नीचे-से-ऊपर की ओर संचालित होते हैं. मुख्यधारा के मीडिया द्वारा जिसे "अराजकता" या "शिष्टाचार का पतन" कहा गया—जैसे हास्य, व्यंग्य, ट्रोल्स और बेबाकी—उसी ने युवाओं को डर की दीवार लांघने में मदद की.
अंग्रेज़ों की निरंकुश सत्ता से लड़ने के लिए गांधी की रणनीति का सबसे पहला नियम था—भय पर विजय पाना. इसके लिए उन्होंने असहयोग, सविनय अवज्ञा और सत्ता के उपहास जैसे अपरंपरागत साधनों का प्रयोग किया. गांधी के लिए राजनीति कभी सत्ता, प्रभुत्व या नियंत्रण हासिल करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि जनता के दुख, अपमान और अन्याय को कम करने का ज़रिया थी.
साधन चाहे औपचारिक हों या अनौपचारिक, उनका उद्देश्य नैतिक होना चाहिए. जंतर-मंतर का विरोध प्रदर्शन भारतीय युवाओं की भावी राजनीतिक रणनीतियों के लिए एक नया और क्रांतिकारी मार्ग प्रस्तुत करता है. यदि आज गांधी जीवित होते, तो वे निश्चित रूप से इस आंदोलन के नैतिक तालमेल और इसकी प्रभावशीलता का पूर्ण समर्थन करते.
(एम.एच. इलियास महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, केरल के गांधीवादी विचार और विकास अध्ययन स्कूल में प्रोफेसर हैं. यह अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख का हिंदी में अनूदित और संपादित अंश है)

