दाराब फ़ारूक़ी : ओवैसी की एआईएमआईएम कोई सियासी पार्टी नहीं, ख़ानदानी जायदाद है

असदुद्दीन ओवैसी का दाँव सीधा-सादा है. मुझे वोट दो. मैं मुसलमान हूँ. बस यही पूरी दलील है. इसके पीछे कोई कार्यक्रम नहीं है. कोई संस्था नहीं. कोई योजना नहीं. बस एक पहचान, जो एक प्रमाण-पत्र की तरह पेश की जाती है.

वे मुसलमानों की स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व बनना चाहते हैं. एक पल के लिए इसे गंभीरता से लेते हैं और देखते हैं कि वे असल में पेश क्या कर रहे हैं.

1. एआईएमआईएम कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. यह ख़ानदानी जायदाद है. दादा ने बनाई, बाप को मिली, बेटे को बाप से मिली. तीन पीढ़ियाँ. कोई चुनाव नहीं. कोई मुक़ाबला नहीं. कोई प्रक्रिया नहीं.

अध्यक्ष पद हर बार संपत्ति की तरह हस्तांतरित हुआ, और अगली बार भी संपत्ति की तरह ही होगा. यही वह शख़्स है जो मुसलमानों से स्वतंत्र लोकतांत्रिक नेतृत्व खड़ा करने की बात करता है. और यह काम वे एक विरासत में मिले तख़्त से कर रहे हैं.

2. एआईएमआईएम ने असल में बनाया क्या है? दंगा पीड़ितों के लिए कोई राष्ट्रीय क़ानूनी सहायता नेटवर्क नहीं है. संकट की माँग के अनुरूप कोई छात्रवृत्ति ढाँचा नहीं है. कोई आर्थिक सहकारिता नहीं. कोई भूमि अधिकार सेल नहीं.

जो है वह एक बेहद कुशल मीडिया ऑपरेशन है, जिसे गोदी मीडिया बड़े चाव से बढ़ाता है. हमदर्दी से नहीं. क्योंकि ओवैसी उनके काम का है. प्राइम टाइम पर एक ग़ुस्साया मुसलमान चेहरा ठीक वही है जो भाजपा की ध्रुवीकरण मशीनरी को चाहिए. ओवैसी कंटेंट देते हैं. गोदी मीडिया प्लेटफ़ॉर्म देता है. दोनों संतुष्ट होकर घर जाते हैं.

किसी मुसलमान के साथ नफ़रत का जुर्म होता है. बयान तैयार होते हैं. ट्वीट जाते हैं. आक्रोश हमेशा मुखर होता है. बेबसी हमेशा भावपूर्ण होती है. फिर अगला अत्याचार होता है और यही चक्र दोहराता है. इस बीच राज्य-दर-राज्य चुनाव लड़ने के लिए पैसा बिना किसी दिक़्क़त के आता रहता है. प्राथमिकताएँ साफ़ दिखती हैं. यह राजनीति नहीं है. यह प्रेस विज्ञप्ति के साथ परफ़ॉर्मेंस है.

3. ओवैसी के पास एक ट्रोल आर्मी है. और उनके पास उन मुसलमानों के लिए एक पसंदीदा गाली है जो धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को वोट देते हैं — दरी बिछाओ गैंग.

मतलब बिल्कुल साफ़ है. तुम बस उनकी रैली में दरी बिछाने के लायक़ हो. मंच पर कभी नहीं पहुँचोगे. यह गाली इस बात की सच्चाई को पकड़ती है कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने मुसलमानों की राजनीतिक भागीदारी को नेतृत्व नहीं, मज़दूरी समझा है.

लेकिन देखिए कि ओवैसी इसके बदले में क्या पेश कर रहे हैं. एक ऐसी पार्टी जिसके मंच पर सत्तर साल से एक ही ख़ानदान का क़ब्ज़ा है. जहाँ ख़ून के रिश्ते से बाहर का कोई मुसलमान कभी नेतृत्व तक नहीं पहुँचा. आप एक ऐसी जगह से निकले जहाँ मंच पर नहीं जा सकते थे. आप एक ऐसी जगह आ गए जहाँ मंच विरासती संपत्ति है.

दरी बस अंदर आ गई.

यह भाजपा की राजनीति का कोई विकल्प नहीं है. यह उसकी फ़ोटोकॉपी है. संघ भी उन हिंदुओं के साथ यही करता है जो भाजपा को वोट नहीं देते. भाषा एक जैसी है. इरादा एक जैसा है. फ़र्क़ बस यह है कि संघ के पीछे राज्य की ताक़त है. ओवैसी के पास ट्विटर है. लेकिन भूख एक जैसी है. तरीक़ा एक जैसा है. वे भाजपा की शक्ल हैं, उसी कमरे में खड़े हैं — बस थोड़े कम फ़र्नीचर के साथ.

4. देखिए उनकी पार्टी में कौन नहीं है. एक भी प्रगतिशील मुसलमान नहीं — न मर्द, न औरत — जिसने धर्मनिरपेक्ष जीवन में कुछ हासिल किया हो. कोई ऐसा जिसने करियर बनाया हो, नाम कमाया हो, पहचान की राजनीति से बाहर कुछ मूल्यवान रचा हो, और फिर वह प्रतिष्ठा अपने समुदाय की सेवा में सार्वजनिक जीवन में लाई हो. ऐसा कोई शख़्स एआईएमआईएम में नहीं है.

इसकी जगह जो हैं, वे वो लोग हैं जिनकी पूरी पहचान ही पार्टी है. जिनकी हैसियत ओवैसी से मिलती है, अपनी बनाई किसी चीज़ से नहीं.

प्रगतिशील लोग ओवैसी के लिए बोझ हैं. वे पूछते हैं कि योजना क्या है. वे जवाबदेही चाहते हैं. वे अंतर्विरोधों को भाँप लेते हैं. इसलिए उनकी पार्टी को सावधानी से इस तरह बनाया गया है कि वे उसमें शामिल न हो सकें. यह बहिष्करण इत्तिफ़ाक़ी नहीं है. यह उसकी बुनावट है.

एआईएमआईएम में मुस्लिम पहचान एक पोशाक है. कुर्ता या शेरवानी पहनो. टोपी पहनो. बाहरी दिखावा करो. यही दाख़िले का टिकट है. आपके विचार नहीं. आपका रिकॉर्ड नहीं. आपकी बनाई हुई चीज़ें नहीं.

प्रदर्शन लाइए. सवाल नहीं.

5. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट 2006 में आई थी. उसमें सटीक और चौंकाने वाले विवरण के साथ दर्ज किया गया कि भारतीय मुसलमान अधिकांश विकास संकेतकों पर अनुसूचित जातियों से भी पीछे थे. साक्षरता. रोज़गार. संस्थागत प्रतिनिधित्व. स्वास्थ्य.

बीस साल बीत गए. ओवैसी उस रिपोर्ट का हवाला संसद में बड़े वाक्पटुता से देते हैं. आँकड़े धाराप्रवाह सुनाते हैं. डेटा सच्चा है. आक्रोश सच्चा है.

लेकिन उस डेटा से निकलती कोई योजना नहीं है. कोई बीस साला ढाँचा नहीं. कोई ठोस लक्ष्य नहीं. कोई नीति-दस्तावेज़ नहीं जो कहे: मुसलमान अभी यहाँ हैं, उन्हें यहाँ पहुँचना है, हम वहाँ ऐसे पहुँचेंगे. कुछ नहीं. निदान ऊँचे स्वर में है. नुस्ख़ा हमेशा के लिए ग़ायब है.

जो है वह एक दरबार है. मेरे पास आओ क्योंकि बाक़ियों ने तुम्हें धोखा दिया है. यही पूरा प्रस्ताव है. शिकायत बतौर राजनीति.

भावनाएँ ही हम देते हैं और भावनाओं पर ही जीते हैं. हम इमोशन वैम्पायर हैं. योजना? जब तख़्त पर बैठेंगे तब बताएँगे.

हालाँकि ओवैसी एक बात में सही हैं. धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ मुसलमानों को नाकाम कर चुकी हैं. वह नाकामी हक़ीक़ी है और दर्ज है.

लेकिन उस नाकामी से जो जवाब उभरा है वह एक ऐसी पार्टी है जो विरासती ताक़त पर टिकी है, परफ़ॉर्मेंस से चलती है, ट्रोल्स से बचाई जाती है, और किसी भी योजना से ख़ाली है. उस चीज़ की ज़ेरॉक्स जिसका वह विरोध करने का दावा करती है. वही तानाशाही प्रवृत्ति. वही पहचान-आधारित लामबंदी. जवाबदेही के लिए वही हिक़ारत. बस पीछे राज्य की ताक़त नहीं है.

अभी तक.

दाराब फ़ारूक़ी एक कहानीकार, पटकथा लेखक और स्वतंत्र विचारक हैं. वे ट्वीट करते हैं. यह उनका एक लंबा ट्वीट है जो उन्होंने 2 भागों में लिखा था, जिसका हमने अनुवाद किया है.

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