पराकला प्रभाकर : ममता को चुनाव अस्वीकार्य है, तो नतीज़ों का बहिष्कार करना चाहिए

इन विधानसभा चुनावों के बाद ही लोग यह सोचने लगे हैं कि चुनाव और अदालतें कोई उपाय नहीं हैं. भारत का विचार ख़तरे में है. यह सब चुनावी अंकगणित और हिसाब-किताब बनकर रह गया है.

मैं काफ़ी समय से यह तर्क देता रहा हूँ कि समस्त विपक्ष को चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए और सभी विधायिकाओं — लोकसभा और राज्य विधानसभाओं — से अपनी सीटें छोड़ देनी चाहिए. भाजपा को एक ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़ाधारी की तरह दिखाएँ. उसे हमारी जनता और दुनिया की नज़रों में वैधता से वंचित करें.

एक तरफ़ ये विपक्षी दल वोट चोरी का शोर मचाते हैं, लेकिन किसी तरह जीत जाने की अस्पष्ट उम्मीद लेकर चुनाव लड़ते हैं. वे यह समझ नहीं पाते कि पूरा खेल पहले से तय है. वे इसे मानने से इनकार करते हैं. या तो वे भोले हैं, या जब वोट चोरी का नारा लगाते हैं तो वे ईमानदार नहीं होते.

अगर वे वाक़ई मानते हैं कि वोट चोरी और बड़े पैमाने पर लक्षित नाम-कटाई हो रही है, तो फिर वे इन नक़ली चुनावों में भाग क्यों ले रहे हैं और वोट चोरी व नाम-कटाई के आधार पर चुनी गई विधायिकाओं में क्यों बैठे हैं? इससे तो एक चोरे हुए जनादेश को वैधता ही मिलती है, है न?

ममता बनर्जी के रुख़ के बारे में यह कहना ज़रूरी है. अगर वे सच में घोषित जनादेश को अस्वीकार करने को लेकर गंभीर हैं और इस्तीफ़ा देने से मना करती हैं, तो इसका मतलब है कि वे गठित होने वाली विधानसभा को मान्यता नहीं देतीं. यानी वे विदा हो रही विधायिका को अभी भी वैध मान रही हैं. ऐसे में उन्हें यह कहना चाहिए कि उनकी पार्टी के जो लोग इस ग़ैर-क़ानूनी चुनाव में जीते हैं, वे सदन छोड़ दें - और उनसे इस्तीफ़ा दिलवाना चाहिए. 

तब उनका रुख़ विश्वसनीय लगेगा.

अगर आप कहें कि 'मेरी पार्टी के विजेता तो ठीक हैं, लेकिन आपकी पार्टी के विजेता ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से चुने गए हैं' — तो इससे उनकी प्रतिबद्धता के बारे में क्या कहा जाएगा? अगर उन्होंने यह कहा होता — 'देखिए, 93 लाख मतदाताओं के नाम कटने और 28 लाख लोगों को वोट देने से वंचित किए जाने के बाद, अगर मैं पूरा चुनाव भी जीत जाती, तो भी चुनाव-प्रक्रिया दूषित थी और मैं इसे वैध नहीं मानती', तो उसे वास्तविक माना जाता और उनका रुख़ दृढ़ विश्वास से उपजा लगता. अफ़सोस, अब वे इस आरोप के प्रति सुभेद्य हैं कि वे महज़ एक हारी हुई खिलाड़ी की तरह व्यवहार कर रही हैं. यह आरोप निराधार नहीं है.

लेकिन क्या वे हैं? बड़े पैमाने पर नाम-कटाई और 'अंडर एडज्यूडिकेशन' श्रेणी के भारी संख्या में मतदाताओं को वोट न डालने देने के बाद, मुझे लगता है कि यह वक़्त है जब सभी विपक्षी दल एक साथ बैठें और गंभीरता से सोचें. बिहार देखिए: दो लड़कों (राहुल गांधी और तेजस्वी यादव) ने वोट अधिकार यात्रा निकाली. उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर मतदाता नाम-कटाई हुई है. तो फिर उन्होंने चुनाव लड़ा ही क्यों? उमड़ती भीड़ देखकर उन्हें लगा कि वे किसी तरह जीत जाएँगे? तो क्या वास्तव में उन्हें मताधिकार से वंचित लोगों की परवाह नहीं थी? अगर वे जीत जाते तो नाम-कटाई और मताधिकार हनन कोई मायने नहीं रखता?

क्या सिर्फ़ उनकी जीत या हार ही मायने रखती है? मताधिकार हनन का मुद्दा तभी उठता है जब विपक्षी दल हारते हैं? वरना कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता? कोई भी सुपात्र जिसका नाम मतदाता सूची से काटा गया हो, उसे हर उस व्यक्ति की चिंता का विषय होना चाहिए जो मतदाता सूची में है. है न? ज़रा याद करें कि सुप्रीम कोर्ट के जज बागची ने क्या कहा था. अगर नाम-कटाई की संख्या जीत के अंतर से अधिक है, तो सुप्रीम कोर्ट को इसकी गंभीरता से जाँच करनी चाहिए. इसका मतलब यह है: मेरा नाम काटा जाना तभी मुद्दा बनता है जब जो लोग काटे नहीं गए, उनकी पसंद से चुने जाने वाले दल/उम्मीदवार की जीत का अंतर मेरे उन कटे हुए भाई-बहनों की संख्या से कम हो! 

क्या कोई अदालत इससे ज़्यादा बेतुकी हो सकती है? नतीजों के बाद कोई भी बिहार में मतदाता सूची से काटे गए उन 63 लाख लोगों की बात नहीं करता. चुनाव ख़त्म हो गए और अब वे हम में से किसी के लिए मायने नहीं रखते. कोई पार्टी उनकी परवाह नहीं करती. यही हाल तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी का है. जिन राज्यों में चुनाव नहीं हुए लेकिन विशेष सारांश पुनरीक्षण (एसआईआर) हुआ, जैसे उत्तर प्रदेश - जहाँ 2.83 करोड़ नाम काटे गए,  उनका क्या? हम परवाह नहीं करते?

वैसे भी हम मणिपुर की परवाह नहीं करते, चाहे पिछले दो साल या उससे अधिक समय से वह जल रहा हो. इन कटे हुए मतदाताओं में और उनमें क्या फ़र्क़ है? क्योंकि वहाँ अभी चुनाव नहीं हैं, इसलिए उनकी कोई बात नहीं करता. कोई राजनीतिक दल नहीं, कोई मीडिया नहीं, यहाँ तक कि तथाकथित स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म भी नहीं. 2.83 करोड़ लोग हमारे लिए तब मायने नहीं रखते जब कोई चुनाव न हो? चुनावों का बहिष्कार करना और विधायिकाओं से इस्तीफ़ा देना, जब तक यह संस्थागत क़ब्ज़ा न टूटे — यह आदर्श लेकिन अव्यावहारिक समाधान लग सकता है.

लेकिन मैं आपको बताता हूँ, वास्तविक जीवन में बहुत कम बार आदर्श और व्यावहारिक अवसर एक साथ आते हैं. यह हमारे राष्ट्र-जीवन में वह क्षण है जो ठीक इसी कन्वर्जेंस (अभिसरण) की माँग करता है. जो आदर्श है वही अब आगे बढ़ने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है. और जो व्यावहारिक है वही आदर्श है, और कुछ नहीं.

दूसरे शब्दों में, हमारे गणतंत्र के इस मोड़ पर व्यावहारिक ही आदर्श है और आदर्श ही व्यावहारिक है. हमारा गणतंत्र गहरे संकट में है. जानलेवा ख़तरे में है.

अगर आप चाहते हैं कि मैं मानूँ कि ममता बनर्जी एक सच्ची सेनानी हैं, तो वे यह तय करें कि उनके नवनिर्वाचित विधायक उस नई विधायिका में इस्तीफ़ा दे दें या शपथ न लें, जिसकी वैधता पर वे सवाल उठाती हैं. तब मेरे हिसाब से वे विश्वसनीय लगेंगी. वरना वे इस आरोप के प्रति असुरक्षित रहेंगी कि वे महज़ एक हारी हुई खिलाड़ी हैं. अगर कोई यह आरोप लगाए तो मैं भी उनका बचाव नहीं कर सकता.

लेकिन क्या वे हैं? क्या वे यह कर सकती हैं: अपने विधायकों से इस्तीफ़ा दिलाएँ और उस नई विधायिका की वैधता अस्वीकार करें जो इस दिखावटी चुनाव से निकली है?

क्या विपक्ष यह कड़वा घूँट पी सकता है? यह अब सामान्य स्थिति नहीं रही. असाधारण समय असाधारण क़दमों की माँग करता है. अगर राजनीतिक दल यह नहीं कर सकते, यह करने में अक्षम हैं, तो कम से कम वे नागरिक समाज के पीछे खड़े हों जब वह यह क़दम उठाए. यह अब राजनीतिक दलों के बीच का खेल नहीं रहा. दाँव पर गणतंत्र है.

हमारा गणतंत्र. हमने ख़ुद अपने लिए संविधान दिया था. केवल एक शांतिपूर्ण, गाँधीवादी, ज़मीन पर टिकी हुई जन-आंदोलन ही हमारे 1950 के संकल्प को बचा सकती है. उस 1950 के संकल्प में समाहित मूल्य — स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, न्याय, धर्मनिरपेक्षता — केवल उसी से बचाए जा सकते हैं.

वरना नहीं. क्या हम इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं?

हम में से हर एक को तय करना होगा. और सामूहिक कार्रवाई के लिए तैयार होना होगा. समन्वित कार्रवाई. हर दूसरे एजेंडे को एक तरफ़ रखकर गणतंत्र और भारत के विचार को बचाने के लिए काम करना होगा. यह ध्यान रखें कि इस भूमि पर रहने वाला हर इंसान इस देश का मालिक है. यह किसी एक समुदाय, धर्म, जाति, पंथ, क्षेत्र, रंग, खान-पान की आदतों और परंपराओं की संपत्ति नहीं है. यह सबकी है. जो ताक़तें भारत के इस विचार से असहमत हैं, उन्होंने इस पर हमला किया और इसे कमज़ोर करने के लिए सौ साल काम किया. अब हम इसे बचाने के लिए कुछ महीने काम करें.

भारत के मूलभूत चरित्र की रक्षा करने का कोई विकल्प नहीं है — एक ऐसा देश, एक ऐसी भूमि, एक ऐसा स्थान जो सबके लिए है.

पराकला प्रभाकर भारतीय अर्थशास्त्री, लेखक और राजनीतिक टीकाकार हैं. वे तेलुगु साहित्य और राजनीतिक विमर्श में भी सक्रिय भागीदारी रखते हैं. आंध्र प्रदेश में 2014 से 2018 तक चंद्रबाबू नायडू सरकार के दौरान वे संचार सलाहकार के पद पर कार्यरत रहे और उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल था. वे केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं, किंतु वैचारिक रूप से वे सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के मुखर आलोचक हैं और भारतीय लोकतंत्र, संविधान तथा चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बेबाक़ी से लिखते और बोलते हैं.





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