दिल्ली में भगवा आतंक: फासीवादी ताकतें शांतिपूर्ण आंदोलनों के लिए भी खतरा हैं!

दिल्ली में 10 अक्टूबर से हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और हिंदुत्ववादी संगठनों की कथित हिंसा ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. सेनकनाल के इस लेख में इन घटनाओं को बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं और सरकार की नीतियों के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने की व्यापक कोशिश के रूप में देखा गया है.

पहला प्रदर्शन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर हुआ. दूसरे प्रदर्शन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठी. इसकी पृष्ठभूमि में इंडियन एक्सप्रेस की वह पड़ताल थी, जिसमें दावा किया गया कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग की कुछ कार्रवाइयों पर आपत्ति जताते हुए उन्हें अनधिकृत और अवैध बताया था. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर बर्बरता, बड़े पैमाने पर हिरासत और विरोध स्थलों पर हिंदुत्ववादी समूहों के सदस्यों के प्रवेश के आरोप लगाए.

ऐसी हिंसा का निशाना केवल किसी एक राजनीतिक विचारधारा के समर्थक नहीं हैं. बेरोजगारी, शिक्षा में अनियमितताओं और कॉरपोरेट हितों के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं तथा आम नागरिकों को भी निशाना बनाया जा सकता है, जिनमें भाजपा को वोट देने वाले लोग भी शामिल हैं. एक कथित पीड़ित का बयान इस विरोधाभास को सामने रखता है: “जिस उंगली से मैंने भाजपा को वोट दिया था, आज पुलिस ने उसी को लाठी से तोड़ दिया.”

प्रदर्शनकारियों ने कीलों वाली लाठियों के इस्तेमाल, सिर में गंभीर चोटों और यौन हिंसा जैसे आरोप भी लगाए हैं. अभिषेक ठाकुर से जुड़े वीडियो और सादे कपड़ों में आए हमलावरों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. इन गंभीर आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. 11 अक्टूबर को एक कार में सवार चार लोगों के पास लाठियां होने और पुलिसकर्मियों द्वारा कथित तौर पर उन्हें रास्ता दिए जाने की बात भी सामने आई. इन लोगों को हिंदू रक्षा दल और स्वतंत्र भारद्वाज से जोड़ा गया. भारद्वाज पर प्रदर्शनकारी निशु के पिता पर हमले से संबंधित बयान देने का आरोप भी लगाया गया है. निशु के पिता को कथित हमले में 60 टांके लगे थे.

आउटलुक को दिए एक साक्षात्कार में हिंदू रक्षा दल के भूपेंद्र तोमर उर्फ पिंकी भैया ने कथित तौर पर दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा की जिम्मेदारी ली और नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले समूह सीजेपी के लोगों के खिलाफ धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल किया. उन्होंने जेएनयू की हिंसा का भी उल्लेख किया और भारत को हिंदुओं का देश बताया. दिसंबर 2025 में गाजियाबाद में हिंदू राष्ट्र दल के छह सदस्यों की गिरफ्तारी हुई थी. उन पर तलवारें और कुल्हाड़ियां बांटने के आरोप थे.

कुछ समूहों पर विरोध-प्रदर्शनों को सांप्रदायिक रंग देने के लिए मुस्लिम पहचान के प्रतीकों का इस्तेमाल करने के आरोप भी लगाए गए हैं. झारखंड में परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा पर कथित हमले और 27 अगस्त को अहमदाबाद में बजरंग दल तथा विश्व हिंदू परिषद से जुड़े 30 से अधिक लोगों द्वारा एक रीडिंग सर्कल बाधित किए जाने की घटना भी इसी संदर्भ में आती है. उस आयोजन में मलाला यूसुफजई, ऐन फ्रैंक, चे ग्वेरा, जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी से जुड़ी किताबें शामिल थीं.

इन घटनाओं को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन, तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के प्रदर्शन, नीट अभ्यर्थियों की आवाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ उठे विरोध से भी जोड़ा गया है. तमिलनाडु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 1,400 से अधिक दैनिक शाखाओं और हथियारों के प्रशिक्षण का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया गया है कि संगठित वैचारिक लामबंदी लोकतांत्रिक विरोध के लिए किस तरह चुनौती बन सकती है.

6 और 7 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में कथित तौर पर लगाए गए नारे—“दिल्ली पुलिस, तुम लाठी बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं”, “गोली मारो गद्दारों को” और “उमर खालिद मुर्दाबाद”—इस बहस को और गंभीर बनाते हैं. जब असहमति जताने वाले लोगों को गद्दार कहा जाता है, तो निशाना केवल मुस्लिम समुदाय या किसी एक संगठन तक सीमित नहीं रहता. हिंदू राष्ट्र की राजनीति का विरोध करने वाले हिंदू भी इसकी चपेट में आ सकते हैं.

दूसरी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े समूहों पर भी हिंसा के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन सेनकनाल का तर्क है कि भगवा संगठन वैचारिक रूप से प्रेरित और संगठित ताकत के रूप में काम करते हैं. सनातन संस्था से जुड़े लोगों के खिलाफ नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एम.एम. कलबुर्गी की हत्याओं के मामलों का उल्लेख करते हुए हथियारों को धार्मिक प्रतीकों से जोड़ने वाली भाषा पर भी सवाल उठाए गए हैं.

शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा केवल पुलिस प्रशासन की जवाबदेही का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का सवाल भी है. इसके लिए संगठित राजनीतिक और वैचारिक प्रतिरोध जरूरी है. साथ ही, हिंसा से जुड़े विशिष्ट आरोपों की स्वतंत्र जांच और प्रमाणों के आधार पर जवाबदेही तय करना भी आवश्यक है.

यह सेनकनाल मैगज़ीन के लेख का हिंदी अनूदित सारांश है. मूल अंग्रेज़ी लेख काउंटरकरंट्स पर पढ़ा जा सकता है.

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