वर्गीस के. जॉर्ज | परिसीमन पर संवैधानिक संशोधन नहीं हुआ तो क्या होगा?

वर्गीस के. जॉर्ज के लेख के मुताबिक, मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, 2027 की जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद ही नए सिरे से परिसीमन संभव है. महिलाओं के लिए आरक्षण भी इसी परिसीमन के साथ लागू किया जा सकता है. ऐसे में सवाल यह है कि यदि परिसीमन से जुड़ा कोई संवैधानिक संशोधन संसद से पारित नहीं होता है तो आगे क्या होगा?

भाजपा लोकसभा क्षेत्रों के नए परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने के पक्ष में है और इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही है. अप्रैल 2026 में सरकार ने इससे संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया था, लेकिन इसे पारित नहीं कराया जा सका. सरकार ने अभी तक अपने अंतिम प्रस्तावों को स्पष्ट नहीं किया है. पिछले सत्र में सामने आए प्रस्तावों में लोकसभा की अधिकतम संख्या बढ़ाकर 850 करने, 2011 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच सीटों का नए सिरे से बंटवारा करने और कुल लोकसभा सीटों में एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात थी.

हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि नए परिसीमन के लिए संवैधानिक संशोधन जरूरी नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में पहले से ही इसके प्रावधान मौजूद हैं. इनके अनुसार, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद लोकसभा की सीटों का राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच पुनर्वितरण तथा राज्यों के भीतर लोकसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन किया जाना है. इसलिए यदि कोई संवैधानिक संशोधन नहीं भी होता है, तब भी 2027 की जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है.

क्या 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन पूरा हो पाएगा?

इसका निश्चित जवाब अभी नहीं दिया जा सकता. पिछली बार 2001 की जनगणना के बाद 12 जुलाई 2002 को परिसीमन आयोग का गठन किया गया था. सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह इसके अध्यक्ष थे. आयोग की सिफारिशें 2008 में लागू हुईं और 2009 का लोकसभा चुनाव नए परिसीमन वाले क्षेत्रों के आधार पर हुआ.

हालांकि, उस समय राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण नहीं किया गया था. केवल राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदली गई थीं. आखिरी बार राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण 1973 में 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था. वर्तमान में भी लोकसभा की 543 सीटों का राज्यों के बीच अनुपात उसी आधार पर कायम है.

2027 की जनगणना पूरी तरह डिजिटल तरीके से होने वाली पहली जनगणना होगी. इसलिए सैद्धांतिक रूप से आंकड़ों के विश्लेषण और परिसीमन की प्रक्रिया पहले की तुलना में तेजी से पूरी हो सकती है. लेकिन यदि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो यह अगली लोकसभा और अगली सरकार के कार्यकाल में भी जारी रह सकती है.

राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा बदलेगा

यदि मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के तहत परिसीमन होता है तो राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का मौजूदा अनुपात बदलना तय माना जा रहा है. अभी 543 सीटों का बंटवारा 1971 की जनसंख्या के आंकड़ों पर आधारित है. 2027 की जनगणना के बाद यह आधार बदल जाएगा.

इसका सबसे बड़ा राजनीतिक असर दक्षिणी राज्यों पर पड़ सकता है. जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनके लोकसभा सीटों में हिस्से के घटने की आशंका है. दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों को अधिक सीटें मिलने की संभावना है. लोकसभा की कुल संख्या भी बढ़ सकती है.

इसके साथ ही लोकसभा की एक-तिहाई सीटें और प्रत्येक राज्य में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान भी लागू हो सकता है.

इस तरह बिना किसी संवैधानिक संशोधन के संभावित क्रम यह होगा—पहले राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण, उसके बाद राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और फिर महिलाओं के लिए आरक्षण का क्रियान्वयन. ये तीनों प्रक्रियाएं 2027 की जनगणना से जुड़ी होंगी.

असली विवाद प्रतिनिधित्व का है

परिसीमन की बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हर वोट का मूल्य समान कैसे रखा जाए और साथ ही राज्यों के संघीय हितों की भी रक्षा कैसे हो.

1967 में अधिकांश बड़े राज्यों में एक सांसद लगभग चार से पांच लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता था. आज केरल में एक सांसद करीब 14 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में यह संख्या करीब 19 लाख तक पहुंच जाती है.

यह अंतर इसलिए पैदा हुआ क्योंकि 1976 और 2001 में सभी राजनीतिक दलों की सहमति से उन राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडित नहीं करने का फैसला किया गया, जिन्होंने अपनी आबादी को स्थिर करने में सफलता हासिल की थी. संविधान में इसके लिए पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है.

यही कारण है कि परिसीमन केवल सीटों की संख्या बदलने का सवाल नहीं है. इसके केंद्र में दो सिद्धांतों के बीच संतुलन का सवाल है—संघवाद, यानी राज्यों का उचित प्रतिनिधित्व और लोकतंत्र, यानी एक व्यक्ति, एक वोट और एक समान मूल्य.

परिसीमन और 'जेरिमैंडरिंग' का खतरा

बराबर संख्या में मतदाता होने मात्र से हर वोट का मूल्य समान नहीं हो जाता. निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं किस तरह खींची जाती हैं, इसका चुनावी नतीजों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है. इसे 'जेरिमैंडरिंग' कहा जाता है.

मान लीजिए किसी क्षेत्र में कुल 50 मतदाता हैं. इनमें 20 एक पार्टी के समर्थक हैं और 30 दूसरी पार्टी के. पांच निर्वाचन क्षेत्र हैं और प्रत्येक में 10 मतदाता हैं. यदि दोनों पार्टियों के समर्थक समान रूप से वितरित हों तो सीटों का परिणाम लगभग उनके कुल वोट प्रतिशत के अनुरूप आएगा.

लेकिन यदि किसी पार्टी के समर्थकों को अलग-अलग क्षेत्रों में इस तरह फैला दिया जाए कि वे किसी भी सीट पर बहुमत हासिल न कर सकें तो इसे 'क्रैकिंग' कहा जाता है. दूसरी ओर, यदि किसी पार्टी के समर्थकों को कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में अत्यधिक केंद्रित कर दिया जाए तो इसे 'पैकिंग' कहा जाता है. इससे किसी पार्टी को कुछ सीटों पर भारी जीत तो मिल सकती है, लेकिन उसके कई वोट व्यर्थ चले जाते हैं और दूसरी पार्टी कम कुल वोट के बावजूद अधिक सीटें जीत सकती है.

इसलिए परिसीमन केवल नक्शे पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की प्रक्रिया नहीं है. यह तय करता है कि मतदाताओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस तरह होगा और चुनावी नतीजों पर उसका कितना प्रभाव पड़ेगा.

परिसीमन की मौजूदा बहस में यही सबसे बड़ी चुनौती है—एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य के लोकतांत्रिक सिद्धांत को बनाए रखते हुए भारत के संघीय ढांचे और उन राज्यों के हितों की रक्षा कैसे की जाए, जिन्होंने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को अपनाया है?

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