अजाज अशरफ़ | राहुल गांधी का उभार मोदी के पतन के व्युत्क्रमानुपाती है

अजाज अशरफ़ के मुताबिक, राहुल गांधी कभी "पप्पू" कहकर खारिज किए जाते थे. उनकी राजनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता का मजाक उड़ाया जाता था, लेकिन आज वह लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और संसद के भीतर तथा बाहर मोदी सरकार के खिलाफ प्रमुख आवाज बन चुके हैं. जाति जनगणना, "वोट चोरी", क्रोनी कैपिटलिज्म, बढ़ते अधिनायकवाद, छात्रों के सवाल और ग्रेट निकोबार परियोजना जैसे मुद्दों पर वह लगातार सरकार को घेर रहे हैं. देश में जहां भी असंतोष का कोई बड़ा मुद्दा उभरता है, राहुल गांधी वहां पहुंचकर उसे अपनी राजनीतिक आवाज देने की कोशिश करते हैं.

उनकी लोकप्रियता में यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस ने हाल के वर्षों में कई चुनावी हार का सामना किया है. महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस या विपक्षी गठबंधन को पराजय मिली. इसके बावजूद राहुल गांधी की राजनीतिक स्वीकार्यता कम होने के बजाय बढ़ती दिखाई दे रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें 52 से बढ़कर 99 हुईं, जबकि भाजपा 303 से घटकर 240 पर आ गई. भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी की छवि में आया बदलाव इस चुनावी प्रदर्शन के साथ और स्पष्ट हुआ.

राहुल गांधी के इस उभार को समझने के लिए लेखक नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कद में आई गिरावट को महत्वपूर्ण मानते हैं. उनका तर्क है कि राहुल गांधी का राजनीतिक कद मोदी के कद के व्युत्क्रमानुपाती हो गया है. यानी मोदी की छवि जितनी कमजोर होती है, राहुल गांधी उतने ही मजबूत दिखाई देते हैं.

मोदी के राजनीतिक कद को पहली बड़ी चोट 2024 के लोकसभा चुनाव में लगी, जब भाजपा बहुमत के आंकड़े से नीचे आ गई और मोदी की अजेयता का मिथक कमजोर हुआ. इसी दौरान राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए "वोट चोरी" का मुद्दा उठाया. मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने इन आशंकाओं को और राजनीतिक मुद्दा बना दिया. राहुल गांधी के आरोपों को इससे व्यापक विपक्षी समर्थन मिला.

इसके बाद 2025 में ऑपरेशन सिंदूर और भारत-पाकिस्तान संघर्ष ने मोदी की मजबूत नेता वाली छवि को एक और चुनौती दी. भारत ने सैन्य स्तर पर सफलता का दावा किया, लेकिन लेखक के अनुसार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस संघर्ष के नैरेटिव में भारत को अपेक्षित बढ़त नहीं मिली. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत-पाकिस्तान युद्धविराम का श्रेय खुद लेने और मोदी के दावे को चुनौती देने से उनकी मजबूत नेता की छवि को नुकसान पहुंचा. इसके साथ ही ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ लगाने से विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार के दावों पर भी सवाल उठे.

यहीं से राहुल गांधी भाजपा विरोधी मतदाताओं के लिए केवल विपक्ष के नेता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विकल्प और उम्मीद के रूप में दिखाई देने लगे. उनकी राजनीति अब केवल बड़े वैचारिक मुद्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े सवालों तक पहुंची.

परीक्षा प्रश्नपत्रों के लीक होने का मुद्दा इसका उदाहरण है. यह सीधे छात्रों और उनके भविष्य से जुड़ा था. राहुल गांधी ने "छात्रों की गूंज" जैसे कार्यक्रमों के जरिए छात्रों के साथ संवाद किया और जंतर-मंतर के छात्र विरोध प्रदर्शन के समर्थन में भी सामने आए. 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी राज्य की कार्रवाई का सामना कर रहे छात्रों और असंतुष्ट समूहों के लिए एक राजनीतिक सुरक्षा कवच की तरह प्रस्तुत हुए.

इससे राहुल गांधी की छवि मोदी के राजनीतिक प्रतिरूप के रूप में भी उभरने लगी. राहुल छात्रों से बातचीत और संवाद की बात करते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं और सवालों का सामना करते हैं. इसके विपरीत मोदी की लंबे समय से प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने की आलोचना होती रही है. जेन-जी के बीच यह अंतर सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना है.

राहुल गांधी की "मोहब्बत की राजनीति" भी मोदी की ध्रुवीकरण की राजनीति के विपरीत खड़ी की जा रही है. राहुल गांधी संविधान में निहित उस भारत की बात करते हैं, जिसकी कल्पना देश के संस्थापकों ने की थी, जबकि उनके आलोचक मोदी की राजनीति को हिंदू राष्ट्र की परियोजना से जोड़ते हैं. जंतर-मंतर पर युवाओं के बीच हिंदू-मुस्लिम राजनीति के खिलाफ उठी आवाज को लेखक राहुल गांधी के इस वैकल्पिक राजनीतिक संदेश की स्वीकार्यता के संकेत के रूप में देखते हैं.

लेकिन लेखक के अनुसार राहुल गांधी अभी मोदी से अलग अपना स्वतंत्र राजनीतिक कद नहीं बना पाए हैं. इसके लिए उन्हें केवल मोदी सरकार का विरोध करने से आगे बढ़ना होगा. उन्हें कांग्रेस को मजबूत जमीनी संगठन में बदलना होगा, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और स्वयंसेवक पार्टी की विचारधारा को लगातार लोगों तक पहुंचाएं.

सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि राहुल गांधी को लोगों के सामने केवल विरोध नहीं, बल्कि बेहतर शासन का स्पष्ट विकल्प रखना होगा. कांग्रेस की राज्य सरकारें अभी तक ऐसा कोई मॉडल प्रस्तुत नहीं कर पाई हैं, जिसे पूरे देश के सामने उदाहरण के तौर पर रखा जा सके. राहुल गांधी ने भी अभी तक ऐसा स्पष्ट खाका नहीं दिया है कि उनकी पार्टी सत्ता में आने पर लोगों के लिए किस तरह का बेहतर भारत बनाएगी.

जब तक राहुल गांधी चुनावी जीत, मजबूत संगठन और बेहतर शासन का विश्वसनीय विकल्प पेश नहीं करते, उनका राजनीतिक कद मोदी की कमजोर होती छवि से जुड़ा रहेगा. एक वास्तविक नेता की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने राजनीतिक कद का पैमाना खुद तय करे. राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह मोदी के विरोध से आगे बढ़कर अपने दम पर एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प बनें.

(अजाज अशरफ दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं और "भीमा कोरेगांव: चैलेंजिंग कास्ट" पुस्तक के लेखक हैं. यह लेख ‘फ्रंटलाइन’ में प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.)

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