जम्मू-कश्मीर में ड्रग्स पर सख्ती से बढ़ा संकट, नशामुक्ति केंद्रों पर मरीजों की भीड़

'आर्टिकल 14' की रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में ड्रग्स के खिलाफ सरकार की व्यापक कार्रवाई के बाद नशीले पदार्थों की उपलब्धता और कीमतों में बदलाव ने नशे के आदी लोगों के बीच विदड्रॉल और इलाज की मांग बढ़ा दी है. श्रीनगर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (आईएमएचएएनएस) जैसे नशामुक्ति केंद्रों पर मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है.

श्रीनगर के आईएमएचएएनएस में गर्मी के बीच मरीजों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं. कई लोग पर्ची लेकर दवाइयों के लिए इंतजार करते हैं, जबकि कुछ मरीज नशे से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंचते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, नशीले पदार्थों की आपूर्ति पर कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में ऐसे मरीज सामने आ रहे हैं जो विदड्रॉल के लक्षणों से जूझ रहे हैं या दोबारा नशे की गिरफ्त में लौट चुके हैं.

ओपिओइड पर निर्भर मरीजों के इलाज में डॉक्टर आमतौर पर ब्यूप्रेनॉर्फिन जैसी दवा देते हैं. यह नशे की तलब और विदड्रॉल के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करती है. लेकिन खुद ओपिओइड होने के कारण इसके इस्तेमाल को नियंत्रित रखा जाता है और मरीजों को आमतौर पर सीमित मात्रा में दवा दी जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि कुछ मरीज दवा की निर्धारित मात्रा से अधिक इस्तेमाल करते हैं और फिर दोबारा पर्ची हासिल करने की कोशिश करते हैं.

आईएमएचएएनएस के सहायक प्रोफेसर डॉ. साजिद मुहम्मद वानी के मुताबिक, कुछ साल पहले कश्मीर में हेरोइन की कीमत करीब 2,000 रुपये प्रति ग्राम थी, जो अब बढ़कर करीब 15,000 रुपये हो गई है. उनकी बात का सीधा अर्थ यह है कि सरकारी कार्रवाई के बाद नशीले पदार्थ महंगे और मुश्किल से उपलब्ध हुए हैं, जिसके कारण कुछ मरीज इलाज केंद्रों की ओर रुख कर रहे हैं.

कश्मीर में नशे की समस्या पहले से ही गंभीर रही है. 2022 के एक अध्ययन के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की करीब 2.23 प्रतिशत आबादी ओपिओइड का इस्तेमाल करती थी. 2023 की एक संसदीय रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर में लगभग 13.5 लाख लोगों के नशे की समस्या से प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया था. इनमें करीब 1.68 लाख बच्चे 10 से 17 वर्ष की उम्र के थे.

सरकार ने अप्रैल 2026 में 'नशा मुक्त अभियान' शुरू किया. अभियान के तहत पुलिस ने कथित ड्रग तस्करों के खिलाफ कार्रवाई तेज की, बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ जब्त किए और आरोपियों से जुड़ी संपत्तियों को कुर्क किया. अधिकारियों के अनुसार, अभियान के शुरुआती 50 दिनों में 58,138 मरीजों ने नशामुक्ति केंद्रों की ओपीडी का रुख किया. इसकी तुलना में अप्रैल 2016 से मार्च 2017 के बीच ऐसे मरीजों की संख्या केवल 489 थी.

आईएमएचएएनएस में डॉक्टरों के मुताबिक, औसतन एक सोमवार को करीब 800 मरीजों में सिर्फ 10 से 15 नए मामले होते हैं. इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में मरीज पहले इलाज करा चुके हैं और दोबारा नशे की समस्या के साथ लौट रहे हैं. कई मरीजों में लंबे समय तक नशीले पदार्थों के इस्तेमाल के कारण गंभीर संक्रमण भी देखा जा रहा है.

डॉ. वानी के अनुसार, कुछ लोग हेरोइन का इंजेक्शन लगाते-लगाते ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं कि नसें मिलना मुश्किल हो जाता है. इसके बाद वे मांसपेशियों में इंजेक्शन लगाने लगते हैं, जिससे गंभीर संक्रमण हो सकता है और कई मामलों में अंग काटने तक की नौबत आ जाती है. इंजेक्शन साझा करने वाले मरीजों में हेपेटाइटिस-सी का खतरा भी काफी अधिक पाया गया है.

इस संकट की एक महत्वपूर्ण वजह जम्मू-कश्मीर का लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक और सामाजिक तनाव भी माना जाता है. Article 14 की रिपोर्ट में ऐसे मरीजों की कहानी सामने आती है जिनके नशे की शुरुआत किसी व्यक्तिगत त्रासदी या संघर्ष से जुड़े मानसिक आघात के बाद हुई. एक 28 वर्षीय कंप्यूटर ग्रेजुएट ने बताया कि बचपन के दोस्त की मौत के बाद वह गहरे सदमे में चला गया था. दोस्तों ने उसे हेरोइन का इस्तेमाल करने की सलाह दी और धीरे-धीरे यह उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गया.

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल डिटॉक्सिफिकेशन से नशे की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता. क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट ज़ोया मीर के मुताबिक, मरीजों को लंबे समय तक काउंसलिंग, कौशल प्रशिक्षण, मोटिवेशन और पुनर्वास की जरूरत होती है. उनके अनुसार, अस्पतालों पर पहले से ही दबाव है और कश्मीर में स्वास्थ्य व्यवस्था के बाहर सामुदायिक स्तर पर पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है.

यही इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी चुनौती है. ड्रग्स की सप्लाई रोकना जरूरी है, लेकिन नशे के आदी लोगों को केवल अपराधी के रूप में देखने से समस्या खत्म नहीं होगी. उन्हें इलाज, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और समाज में दोबारा स्थापित होने का अवसर भी देना होगा. कश्मीर में नशे की समस्या सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि बेरोजगारी, मानसिक स्वास्थ्य, लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष और सामाजिक असुरक्षा से जुड़ा एक जटिल संकट है.

एक मरीज ने इलाज के दौरान कहा, "मैं सच में अपनी पुरानी जिंदगी वापस चाहता हूं." यही वाक्य कश्मीर के ड्रग संकट की असली मानवीय तस्वीर सामने रखता है.

*पहचान की सुरक्षा के लिए नाम बदल दिया गया है.

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