श्रवण गर्ग | जंतर-मंतर अब कोई जगह नहीं, जहां बच्चे खड़े होंगे, वहीं जंतर-मंतर होगा 

'हरकारा डीप डाइव' के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और सरकार की कार्रवाई के राजनीतिक निहितार्थों पर चर्चा की. बातचीत में दिल्ली में सुरक्षा बलों की तैनाती, प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने, मीडिया की भूमिका और आंदोलन के संभावित दूरगामी प्रभावों पर सवाल उठाए गए.

श्रवण गर्ग के मुताबिक, 10 अक्टूबर को दिल्ली में सरकार ने जिस पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की और प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया, वह उसकी सफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक विफलता का संकेत है. उन्होंने कहा कि यह केवल ज्ञानेश कुमार की नौकरी बचाने का मामला नहीं है, बल्कि सरकार अपने सत्ता तंत्र और राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रही है. उनके अनुसार, यह विफलता केवल अमित शाह या किसी एक नेता की नहीं, बल्कि उस पूरी राजनीतिक व्यवस्था की है, जो इस कार्रवाई के पीछे खड़ी दिखाई देती है. गर्ग ने कहा कि सरकार ने दिल्ली में भय का माहौल बनाकर लोगों को प्रदर्शन से दूर रखने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद युवा और नागरिक विरोध के लिए सामने आए.

उनके शब्दों में, “जंतर-मंतर अब कोई जगह नहीं है. जहां बच्चे खड़े होंगे, वहीं जंतर-मंतर होगा.” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आंदोलन में शामिल युवाओं का बड़ा हिस्सा उन सामाजिक समूहों से आता है, जिन्हें लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का समर्थक माना जाता रहा है. गर्ग के अनुसार, सरकार ने जिस भय के जरिए लोगों को रोकने की कोशिश की, वह अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका.

बातचीत में गर्ग ने मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए. उनका कहना था कि पारंपरिक टेलीविजन मीडिया पर लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है और सोशल मीडिया के माध्यम से घटनाओं की जानकारी तेजी से सामने आ रही है. उन्होंने प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार, पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और दिल्ली में आम लोगों की आवाजाही पर लगी पाबंदियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन घटनाओं ने सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर घटनाओं के दृश्य सामने आने के कारण पारंपरिक मीडिया के लिए लोगों का भरोसा बनाए रखना कठिन हो गया है.

गर्ग ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित रखने से इनकार किया. उनके अनुसार, मूल विवाद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस असंतोष का समाधान नहीं करती, तो केवल एक अधिकारी को हटाने से व्यापक सवाल समाप्त नहीं होंगे. उनके विश्लेषण में, 10 अक्टूबर को हुई कार्रवाई ने सरकार की रणनीति और उसके राजनीतिक भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं.

उन्होंने मौजूदा टकराव के भविष्य पर चर्चा करते हुए आशंका जताई कि इसका असर संसद, न्यायपालिका और राजनीतिक दलों के संबंधों पर भी पड़ सकता है. गर्ग के मुताबिक, जंतर-मंतर इस आंदोलन का केंद्र जरूर है, लेकिन इसका प्रभाव देश के दूसरे हिस्सों में भी दिखाई दे सकता है. उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में आंदोलन की दिशा, सरकार की प्रतिक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर नजर रखना जरूरी होगा.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

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