डॉ. अरुण मित्रा | फासीवादी हमले के दौर में मानवाधिकार: आत्मसंतुष्टि की कोई गुंजाइश नहीं
‘काउंटरकरंट्स’ में डॉ. अरुण मित्रा लिखते हैं कि दिल्ली में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजामों ने राजधानी को लगभग छावनी में बदल दिया है. यह स्थिति ब्रिटिश राज की याद दिलाती है, जब औपनिवेशिक शासक जन आंदोलनों को कुचलने और असहमति दबाने के लिए बल प्रयोग करते थे. सीजेपी, एआईएसएफ, एसएफआई और एआईएसए के नेताओं, कार्यकर्ताओं, छात्रों तथा युवाओं की देशभर में बड़े पैमाने पर हुई गिरफ्तारियां मोदी सरकार की बढ़ती घबराहट और असुरक्षा को उजागर करती हैं.
दिल्ली में जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए जुट रहे नागरिकों के सामने जिस तरह सुरक्षा बल तैनात किए गए, उससे ऐसा लगता है मानो राजधानी किसी दुश्मन सेना के हमले की तैयारी कर रही हो. लोगों को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए ट्रेनों को रद्द करना और परिवहन के अन्य साधनों पर जांच सख्त करना लोकतांत्रिक असहमति को दबाने की कोशिश है. मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुए आंदोलन को रोकने के बजाय इन कदमों ने उसे देश के अलग-अलग हिस्सों तक फैला दिया है.
लोकतांत्रिक सरकारें आम तौर पर संवाद के जरिए शिकायतों का समाधान तलाशती हैं, जबकि सत्तावादी शासन बल और दमन का सहारा लेते हैं. ऐसी कार्रवाई ताकत नहीं, बल्कि कमजोरी, असुरक्षा और विवेकहीनता का संकेत है.
इतिहास बताता है कि जर्मनी में नाजियों और कॉरपोरेट हितों के बीच गठजोड़ था. नाजियों ने यहूदियों को राष्ट्र का दुश्मन बताकर उनके खिलाफ नफरत और उन्माद फैलाया, जिसका परिणाम बड़े पैमाने पर नरसंहार के रूप में सामने आया. कम्युनिस्टों, समाजवादियों, ट्रेड यूनियनों और प्रगतिशील समूहों ने फासीवाद का विरोध किया, लेकिन कई लोग चुप रहे या नाजियों का समर्थन करते रहे. इटली में मुसोलिनी के शासन के दौरान भी इसी तरह का दमन देखने को मिला.
भारत में भी राज्यसत्ता के भीतर बढ़ती सत्तावादी और बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं. दिल्ली में लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली की मांग कर रहे युवाओं को रोकने के लिए अर्धसैनिक बलों की तैनाती इसी प्रवृत्ति को दर्शाती है. आलोचकों के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया. संघ के विचारक एम.एस. गोलवलकर ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को साहसी, लेकिन भटका हुआ बताया था. गोलवलकर ने राष्ट्रीय संपदा को कुछ हाथों में केंद्रित करने का समर्थन किया था, जिससे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का वर्चस्व बना रह सके. यह वैचारिक दृष्टिकोण मणिपुर में साढ़े तीन वर्षों से जारी हिंसा के प्रति सरकार की कथित उदासीनता और निगरानी तथा दमन पर आधारित शासन की प्रवृत्ति को समझने में मदद करता है. भारत-इजरायल के गहरे होते रक्षा संबंधों और नागरिकों तथा राजनीतिक विरोधियों की निगरानी के लिए इजरायल में विकसित पेगासस स्पाइवेयर के कथित इस्तेमाल को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है.
मतदाता सूची और चुनाव आयोग पर सवाल
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर उठे सवालों के बाद सरकार दबाव में है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को मंजूरी नहीं दी थी, जबकि ज्ञानेश कुमार के हवाले से इन बदलावों को अदालत की सहमति प्राप्त होने की बात कही गई थी. इस विरोधाभास ने निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी निभाने वाले चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और मुख्य चुनाव आयुक्त की सत्यनिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नागरिकों के बाहर होने की आशंका लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है. शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छ पर्यावरण और उचित पारिश्रमिक जैसे अधिकार आज भी बड़ी आबादी के लिए दूर की आकांक्षाएं बने हुए हैं. ऐसे में मतदान का अधिकार उन सीमित माध्यमों में से एक है, जिसके जरिए लोग सरकार की नीतियों पर अपनी राय जाहिर कर सकते हैं और सत्ता से जवाबदेही मांग सकते हैं. इस अधिकार को कमजोर करना नागरिकों की लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित कर सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की कथित टिप्पणियों को लेकर उठे विवाद के बाद हजारों युवा अपने सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए सामने आए हैं. विपक्षी इंडिया गठबंधन भी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है. उसका आरोप है कि चुनाव आयोग प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के प्रभाव में काम कर रहा है. इस तरह आंदोलन का दायरा चुनाव आयोग की भूमिका से आगे बढ़कर मोदी सरकार की नीतियों और राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंच रहा है.
फासीवाद के खिलाफ व्यापक एकता की जरूरत
इतिहास गवाह है कि लगातार चलने वाले जन आंदोलन शक्तिशाली और दमनकारी व्यवस्थाओं को चुनौती दे सकते हैं. लेकिन इसके लिए राजनीतिक स्पष्टता, अनुशासन, ठोस रणनीति और व्यापक जनभागीदारी जरूरी है. फासीवाद के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील ताकतों का मजबूत गठबंधन बनाना आवश्यक है.
जॉर्जी दिमित्रोव ने फासीवाद को वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, अंधराष्ट्रवादी और साम्राज्यवादी तत्वों की खुली आतंकवादी तानाशाही के रूप में परिभाषित किया था. यह बुर्जुआ लोकतंत्र की जगह हिंसा और दमन को स्थापित करता है तथा मजदूर वर्ग, किसानों और बुद्धिजीवियों को निशाना बनाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह उग्र अंधराष्ट्रवाद, विस्तारवाद और साम्राज्यवादी युद्ध के रूप में सामने आता है.
अंतोनियो ग्राम्शी के विचारों के अनुसार, फासीवाद का मुकाबला केवल सैन्य या आर्थिक संघर्ष तक सीमित नहीं रह सकता. इसके लिए राजनीतिक संगठन, सांस्कृतिक हस्तक्षेप और विचारों के क्षेत्र में भी संघर्ष करना होगा. मजदूरों और किसानों को अपने बुनियादी सिद्धांतों से समझौता करने वाली राजनीति तथा निष्क्रियता, दोनों को अस्वीकार करना होगा. फासीवाद केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सोच, लोकप्रिय संस्कृति और सामाजिक संस्थाओं में अपने विचारों की पैठ बनाकर भी कायम रहता है. इसलिए ग्राम्शी की ‘वर्चस्व की लड़ाई’ की अवधारणा के मुताबिक, नागरिक समाज और सांस्कृतिक संस्थानों में लगातार संघर्ष करके सत्तावादी विचारों को चुनौती देना जरूरी है.
भारत में लोकतांत्रिक ताकतों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए. इसके साथ ही उन्हें अपनी संगठनात्मक कमजोरियों और राजनीतिक रणनीतियों की ईमानदारी से समीक्षा करनी होगी. गौण मुद्दों पर मतभेदों को बुनियादी सवालों पर एकता में बाधा नहीं बनने देना चाहिए. रचनात्मक वैचारिक बहस आंदोलनों को मजबूत कर सकती है, लेकिन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और गुटीय हित सामूहिक कार्रवाई को कमजोर करते हैं और जनता का भरोसा घटाते हैं.
इस संघर्ष को राजनीतिक स्पष्टता, संगठनात्मक एकता, मजबूत रणनीति और निरंतर जनभागीदारी से आगे बढ़ाना होगा. खतरे की गंभीरता को पहचानने में विफलता या एकजुट प्रतिरोध खड़ा करने में हिचकिचाहट के परिणाम लोकतांत्रिक संस्थाओं, मेहनतकश लोगों के अधिकारों और पूरे समाज के लिए विनाशकारी हो सकते हैं.

