शोभन सक्सेना | इजराइल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो जाए
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना के साथ ईरान और अमेरिका के बीच उभरते समझौते, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति और उसके वैश्विक प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र यह सवाल था कि फरवरी से शुरू हुए तनाव और संघर्ष के बाद दुनिया किस नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है और इसका असर आने वाले समय में किन देशों पर सबसे अधिक पड़ सकता है.
चर्चा में कहा गया कि पिछले कई दशकों से पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव और इजराइल की रणनीतिक भूमिका को लगभग स्थायी मान लिया गया था. लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस धारणा को चुनौती दी है. अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर दबाव बनाने की कोशिशों के बावजूद ईरान न केवल टिके रहने में सफल रहा, बल्कि उसने खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में और मजबूती से स्थापित किया है. इससे उस विश्व व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हुए हैं जिसमें अमेरिका को निर्विवाद वैश्विक शक्ति माना जाता रहा है.
शोभन सक्सेना ने तर्क दिया कि अमेरिका अब केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक हितों के आधार पर भी ईरान को देख रहा है. नौ करोड़ की आबादी, विशाल तेल और गैस भंडार तथा बड़े बाजार के कारण ईरान के साथ समझौता अमेरिका के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. यही वजह है कि बातचीत और समझौते की दिशा में बढ़ते कदम दिखाई दे रहे हैं. इस घटनाक्रम को उभरती बहुध्रुवीय दुनिया और बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है.
बातचीत में इजराइल की स्थिति पर भी विस्तार से चर्चा हुई. वक्ताओं का मानना था कि गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने इजराइल की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाया है. यदि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौता होता है तो इजराइल की रणनीतिक अहमियत पहले जैसी नहीं रह सकती. यही वजह है कि इजराइल इस पूरी प्रक्रिया को लेकर असहज दिखाई देता है और क्षेत्रीय राजनीति में अपनी भूमिका बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.
डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका भी चर्चा का प्रमुख विषय रही. विश्लेषण में कहा गया कि ट्रंप की राजनीति अक्सर सार्वजनिक छवि, मीडिया प्रभाव और राजनीतिक संदेशों के इर्द-गिर्द घूमती है. वे युद्ध शुरू करने का श्रेय भी लेना चाहते हैं और शांति स्थापित करने का भी. आगामी अमेरिकी चुनावों और घरेलू आर्थिक चुनौतियों के बीच यह समझौता उनके लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. बढ़ती महंगाई, ऊर्जा कीमतों और आर्थिक दबावों का असर अमेरिकी मतदाताओं पर पड़ता है और ट्रंप इससे भलीभांति परिचित हैं.
भारत के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए. चर्चा में यह राय सामने आई कि भारत के हित पश्चिम एशिया के सभी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने में हैं. ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक हित और क्षेत्रीय स्थिरता भारत की प्राथमिकताएं हैं. ऐसे में बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत को अपनी विदेश नीति को व्यावहारिक और संतुलित बनाए रखने की आवश्यकता होगी.
चर्चा का निष्कर्ष यह रहा कि पश्चिम एशिया इस समय एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता आगे बढ़ता है तो इसका असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इजराइल, अरब देशों, भारत और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा. आने वाले महीनों में होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि यह बदलाव स्थायी रूप लेता है या फिर क्षेत्र एक बार फिर टकराव और अस्थिरता की ओर लौटता है. पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

