आकार पटेल | विरोध का इम्तिहान- अधिकार और पाबंदियाँ

गांधी जयंती की यादें अभी हमारे ज़ेहन में ताज़ा हैं. शांतिपूर्ण तरीक़े से इकट्ठा होने का अधिकार भी फिर से चर्चा में है. ऐसे में आइए, इससे जुड़ी कुछ बातों पर नज़र डालते हैं. जब मैं यह लिख रहा हूँ, तब मोदी सरकार प्रदर्शनकारियों को इकट्ठा होने से रोक रही है, क्योंकि वह मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाबदेही से बचाना चाहती है. उनके ग़लत रवैये पर कोई बहस नहीं है. तथ्य हमारे सामने हैं. लेकिन सरकार ने वह रवैया अपना लिया है जिसे हम हिंदुस्तानी 'जो करना है कर लो' कहते हैं. क्या यह रवैया टिक पाएगा? इस पर भी आएँगे, लेकिन पहले थोड़ा पीछे चलते हैं.

भारत में गांधी का पहला विरोध प्रदर्शन 1917 में हुआ था, जब वे 47 साल के थे. उन्हें पता चला कि चंपारण के बटाईदार किसानों को 'तिनकठिया' नाम की एक व्यवस्था के तहत क़ानूनन अपनी 15 प्रतिशत ज़मीन पर नील की खेती करनी ही पड़ती थी, चाहे वे चाहें या नहीं.

गांधी ने चंपारण जाकर सच्चाई का पता लगाने का फ़ैसला किया. ब्रिटिश मजिस्ट्रेट ने उन्हें वहाँ से चले जाने का आदेश दिया. गांधी ने यह आदेश नहीं माना. इसके बाद क्या हुआ, इस बारे में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है:

"अधिकारियों यानी कलेक्टर, मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक से मेरी एक तरह की दोस्ती-सी हो गई. मैं चाहता तो मुझे दिए गए नोटिसों का क़ानूनी तौर पर विरोध कर सकता था. इसके बजाय मैंने उन सबको स्वीकार कर लिया, और अधिकारियों के साथ मेरा बर्ताव बिल्कुल ठीक रहा. इससे उन्होंने देखा कि मैं उन्हें निजी तौर पर ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था. मैं तो बस उनके आदेशों का सविनय प्रतिरोध करना चाहता था. इस तरह वे सहज हो गए. मुझे परेशान करने के बजाय उन्होंने भीड़ सँभालने में मेरी और मेरे साथियों की मदद ख़ुशी-ख़ुशी ली. लेकिन यह उनके लिए इस बात का साफ़ सबूत था कि उनकी सत्ता हिल चुकी थी. लोगों के मन से पल भर के लिए सज़ा का सारा डर निकल गया था. वे उस प्रेम की ताक़त के आगे झुक गए थे जो उनके नए दोस्त ने दिखाई थी."

अंग्रेज़ों ने जल्दी ही समझ लिया कि इन हालात में जीतना नामुमकिन है. गांधी लिखते हैं:

"इससे पहले कि मैं सज़ा सुनने के लिए अदालत में पेश हो पाता, मजिस्ट्रेट ने लिखित संदेश भेजा कि लेफ़्टिनेंट गवर्नर ने मेरे ख़िलाफ़ केस वापस लेने का आदेश दिया है. कलेक्टर ने भी मुझे लिखकर कहा कि मैं अपनी प्रस्तावित जाँच करने के लिए आज़ाद हूँ, और अधिकारियों से जो भी मदद चाहिए, उस पर भरोसा कर सकता हूँ. हम में से कोई भी इतने जल्दी और सुखद नतीजे के लिए तैयार नहीं था. किसानों की भीड़ अपने बयान दर्ज कराने आने लगी. उनके पीछे-पीछे उनके साथियों की ऐसी फ़ौज आई कि पूरा अहाता और बग़ीचा खचाखच भर गया."

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि ब्रिटिश सरकार ने तब हमदर्दी से जवाब दिया था. गांधी लिखते हैं:

"बयान दर्ज कराने आ रहे किसानों (रैयतों) की बढ़ती तादाद से बाग़ान मालिकों का ग़ुस्सा बढ़ गया. मेरी जाँच रोकने के लिए उन्होंने ज़मीन-आसमान एक कर दिया. लेकिन लेफ़्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गेट ने मुझे मिलने बुलाया. उन्होंने एक जाँच बिठाने की इच्छा जताई और मुझे उस कमेटी का सदस्य बनने का न्योता दिया. कमेटी ने किसानों के पक्ष में फ़ैसला दिया. उसने सिफ़ारिश की कि बाग़ान मालिक किसानों से वसूले गए उस पैसे का कुछ हिस्सा लौटाएँ जिसे कमेटी ने ग़ैरक़ानूनी पाया था, और तिनकठिया व्यवस्था क़ानून बनाकर ख़त्म की जाए. इस तरह क़रीब एक सदी से चली आ रही तिनकठिया व्यवस्था ख़त्म हो गई, और इसके साथ ही बाग़ान मालिकों का राज भी ख़त्म हो गया."

सरकार को इसी तरह काम करना चाहिए. उसे शांतिपूर्ण तरीक़े से इकट्ठा होने और विरोध करने के अधिकार को मानना चाहिए, और अन्याय को दूर करना चाहिए.

आइए, अब आज के समय में लौटते हैं. परीक्षा प्रणाली की गड़बड़ियों को लेकर जब मोदी सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान को हटाया, तो उसे जवाबदेही का सिद्धांत मानने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह रियायत तब दी गई जब साफ़ हो गया कि सरकार का रवैया प्रदर्शनकारियों को मंज़ूर नहीं था. इसमें प्रधानमंत्री का इंस्टाग्राम वीडियो भी शामिल था.

सरकार अब मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का विरोध कर रही है. वे बीजेपी के लिए बहुत अहम हैं. यह हमने न सिर्फ़ एसआईआर के इस हंगामे में देखा है, बल्कि विपक्षी पार्टियों के प्रति उनके रवैये में भी देखा है. एसआईआर पर सरकार का तेज़ी से क़दम पीछे खींचना दिखाता है कि वह घबरा गई है. वह छोटी-मोटी रियायतें देकर लोगों का ग़ुस्सा शांत करना चाहती है. कहीं प्रक्रिया में थोड़ा-सा बदलाव कर दिया, तो कहीं कोई नया फ़ॉर्म भरवा लिया.

अफ़सोस, यह काम नहीं आया, क्योंकि नागरिकों ने देख लिया है कि मतदाता सूची का यह पूरा घोटाला कितना भयानक है. सरकार की दिक़्क़त यह है कि जब नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतर आता है, तो सत्ता को झुकना ही पड़ता है. किसानों के मामले में ऐसा ही हुआ, एनआरसी के मुद्दे पर ऐसा ही हुआ, और धर्मेंद्र प्रधान के मामले में भी ऐसा ही हुआ. यह फिर होगा, क्योंकि कोई दूसरा असली विकल्प है ही नहीं.

ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है. यानी अभी ढाई साल बाक़ी हैं. यह देखना मुश्किल है कि सरकार उन्हें तब तक पद पर बनाए रख पाएगी, चाहे वे मोदी के लिए कितने भी क़ीमती क्यों न हों. सरकारी गज़ट में मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर उनकी नियुक्ति 19 फ़रवरी 2025 से दर्ज है, और चुनाव आयोग अभी उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में ही दिखाता है.

अगर प्रदर्शनकारी एकजुट रहे, तो सरकार को आख़िरकार सही काम करना ही पड़ेगा. उसे जवाबदेही के सिद्धांत को फिर से मानना पड़ेगा.

यह कहना अजीब लग सकता है, लेकिन बात बिल्कुल सही है. मोदी सरकार को चंपारण में गांधी के साथ ब्रिटिश राज के बर्ताव से सीख लेनी चाहिए.

शांतिपूर्ण तरीक़े से इकट्ठा होने के अधिकार को मानें. करोड़ों मतदाताओं के साथ हुए अन्याय को सुधारें. और ज़िम्मेदार व्यक्ति को सज़ा दें.

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