अरुंधति रॉय | कयामत अभी और तब भी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को मानव सभ्यता की अगली बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे बढ़ती कॉरपोरेट सत्ता, पर्यावरणीय नुकसान, निगरानी और मानवीय स्वतंत्रता के क्षरण का खतरा छिपा है. अरुंधति रॉय अपने लेख ‘Apocalypse Now and Then’ में तर्क देती हैं कि एआई का संकट केवल नौकरियों या तकनीक तक सीमित नहीं है. यह भाषा, रचनात्मकता, लोकतंत्र और मानव अस्तित्व को प्रभावित कर सकता है.
भाषा, रचनात्मकता और मशीनों का बढ़ता प्रभाव
एआई के प्रसार से लेखकों, प्रकाशकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच भरोसा कमजोर हो रहा है. अब मौलिक रचनाओं पर भी संदेह किया जाने लगा है. रॉय के लिए भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों और सामूहिक पहचान की बुनियाद है. उन्हें आशंका है कि मशीनों पर निर्भरता मनुष्यों की स्वतंत्र सोच, कल्पनाशीलता और अपनी भाषा में अभिव्यक्ति की क्षमता को कमजोर कर सकती है.
तकनीकी कंपनियों और सरकारों का गठजोड़
रॉय एआई कंपनियों के उन दावों पर सवाल उठाती हैं, जिनमें वे मानवता के विनाश की आशंका जताने के साथ सरकारी नियमन की मांग भी करती हैं. उनके मुताबिक, अस्तित्वगत संकट की चर्चा इन कंपनियों को अपनी अहमियत बढ़ाने, सरकारी संसाधनों तक पहुंच बनाने और छोटे प्रतिस्पर्धियों को बाहर करने में मदद कर सकती है.
वह पीटर थिल, सैम ऑल्टमैन और मार्क एंड्रीसन जैसे तकनीकी उद्योग के प्रभावशाली लोगों के बयानों का उल्लेख करते हुए बताती हैं कि एआई को आर्थिक प्रगति, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जोड़कर पेश किया जा रहा है. अमेरिका और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता का इस्तेमाल भी निगरानी प्रणालियों, स्वायत्त हथियारों और सैन्य तकनीक के विस्तार को उचित ठहराने के लिए किया जा सकता है.
निगरानी, युद्ध और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता
रॉय के अनुसार, एआई आधारित हथियारों और निगरानी तकनीकों का इस्तेमाल गंभीर सवाल खड़े करता है. वह इजरायल के गाजा अभियान में इस्तेमाल किए गए एआई सिस्टम और अमेरिकी सैन्य तकनीक का उल्लेख करती हैं. टिमनिट गेबरू और मेरेडिथ व्हिटेकर जैसी आलोचकों ने एआई में नस्लीय पूर्वाग्रह, लैंगिक भेदभाव, पर्यावरणीय लागत और सैन्य इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं.
भारत में दिल्ली के प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट बंद होने और कश्मीर तथा मणिपुर में लंबे समय तक इंटरनेट सेवाएं बाधित किए जाने के उदाहरण देते हुए रॉय बताती हैं कि डिजिटल तकनीक और सरकारी नियंत्रण का गठजोड़ असहमति की आवाज को दबा सकता है.
डेटा, पर्यावरण और श्रमिकों की कीमत
एआई कंपनियों को विशाल डेटा केंद्रों के लिए जमीन, पानी और बिजली चाहिए. भारत में विशाखापत्तनम में प्रस्तावित डेटा केंद्रों का उल्लेख करते हुए रॉय पर्यावरणीय निगरानी की कमी और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताती हैं.
केरल की एक रेयॉन फैक्टरी का उदाहरण बताता है कि औद्योगिक निवेश रोजगार तो पैदा कर सकता है, लेकिन प्रदूषण, जंगलों के विनाश और श्रमिकों की स्वास्थ्य समस्याओं की कीमत पर. रॉय को आशंका है कि एआई के प्रशिक्षण के लिए श्रमिकों के काम और गतिविधियों से डेटा जुटाया जा रहा है, जबकि यही तकनीक भविष्य में उनकी नौकरियां खत्म कर सकती है.
वह यह भी सवाल उठाती हैं कि एंथ्रोपिक जैसी कंपनियां लेखकों की अनुमति के बिना उनकी किताबों का इस्तेमाल एआई प्रशिक्षण में कैसे कर सकती हैं. उनके अनुसार, मानव सभ्यता की सामूहिक बौद्धिक उपलब्धियों पर निजी कंपनियों का नियंत्रण ज्ञान के कॉरपोरेटीकरण का खतरा पैदा करता है.
किसका होगा एआई से होने वाला लाभ?
रॉय सार्वभौमिक बुनियादी आय और एआई कंपनियों में सार्वजनिक हिस्सेदारी जैसे प्रस्तावों पर भी सवाल उठाती हैं. उनका तर्क है कि जब तक संपत्ति का वितरण अधिक समान नहीं होता, तब तक तकनीकी प्रगति के लाभ सीमित लोगों तक सिमट सकते हैं. भारत, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका से डेटा जुटाकर मुनाफा विकसित देशों में केंद्रित होने की आशंका भी बनी रहती है.
अंततः रॉय की चेतावनी है कि एआई पर अत्यधिक निर्भरता मानवीय बुद्धि, रचनात्मकता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को कमजोर कर सकती है. उनके अनुसार, सवाल केवल यह नहीं है कि एआई मनुष्यों के लिए क्या कर सकता है, बल्कि यह भी है कि वह मनुष्यों को क्या बना रहा है. तकनीकी प्रगति को मानवता, पर्यावरण और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए.
(‘इक्वेटर’ में प्रकाशित अरुंधति रॉय का यह लेख उनके मूल लेख अंग्रेजी का हिंदी में अनूदित अंश है. मूल लेख अंग्रेजी में यहां पढ़ सकते हैं.)

