श्रवण गर्ग | मोदीजी के साथ इस समय कौन है? क्या वे अकेले हैं?
देश की डेढ़ सौ करोड़ जनता को इस समय सिर्फ एक सवाल का जवाब समझने की ज़रूरत है! सवाल सिंपल है! इतनी ताक़तवर मोदी सरकार कुछेक हज़ार या कुछ लाख युवाओं के ख़िलाफ़ इतनी बड़ी पुलिस फ़ोर्स की ख़ौफ़नाक तैनाती सिर्फ़ एक अफ़सर ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए क्यों कर रही है? क्या कोई बड़ा कारण है? ज्ञानेश कुमार को भी धर्मेंद्र प्रधान की तरह पद से हटाकर सारा मामला शांत क्यों नहीं कर देती? ऐसा क्यों नहीं कर पा रही है? क्या इस बात का डर है कि ज्ञानेश कुमार प्रधान नहीं हैं? मामला कुछ अलग है?
क्या चुनाव आयोग यानी ज्ञानेश कुमार के क़ब्ज़े में कथित चुनावी भ्रष्टाचार के सारे सीक्रेट्स हैं? ज्ञानेश के जाते ही सारे राज सड़कों पर आ जाएँगे? उनके ख़िलाफ़ मुक़दमे की माँग उठने लगेगी. राहुल की सलाह मानते हुए वे अगर अप्रूवर बन गए तो सरकार के ख़िलाफ़ देश भर में तूफ़ान खड़ा हो जाएगा! हरियाणा, बिहार और बंगाल सहित वे तमाम राज्यों की सरकारें, जो कथित तौर पर चुनावी भ्रष्टाचार के चलते बनी हैं, उनकी रवानगी हो जाएगी! अदालतों के फ़ैसले शक के दायरों में आ जाएँगे? संविधान के प्रति निष्ठाएँ संदिग्ध हो जाएँगी? अभी जेलें युवा आंदोलनकारियों से भरी जा रही हैं, फिर भ्रष्टाचारी नेताओं और अफसरों से भरी जाने लगेंगी? देश में संवैधानिक संकट उपस्थित हो जाएगा?
इतनी बहादुर सरकार डरी हुई है, पूरी दुनिया को भी अब पता चल रहा है. पहले ‘जंतर-मंतर’, फिर नई दिल्ली के हृदय स्थल कनॉट प्लेस स्थित ‘सेंट्रल पार्क’ को पुलिस छावनी बना देने के बावजूद शुक्रवार को हज़ारों युवा और नागरिक तिरंगा लहराते हुए उसके इर्द-गिर्द पहुँच गए. गिरफ़्तारियाँ देने को तैयार हो गए! पहले नागरिक सरकार से डरते थे, अब उल्टा हो गया.
दिल्ली में दुनिया भर के देशों के राजदूत, उच्चायुक्त, ट्रेड और राजनीतिक प्रतिनिधि, कल्चरल सेंटर्स और बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के संवाददाता चौबीसों घंटे उपस्थित रहते हैं. ये सभी नज़रें रखे हुए हैं कि छह जून के बाद से भारत में नागरिकों के स्तर पर डेमोक्रेसी की असली स्थिति क्या है? अहिंसक प्रतिरोधों को दबाने के लिए सुरक्षा बलों का किस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है. न्यायपालिका किस तरह के फ़ैसले दे रही है! विपक्षी पार्टियाँ क्या कर रही हैं. ये सब लोग अपने-अपने देशों के नागरिकों को सूचित कर रहे हैं. जिन मुल्कों के इंडियन डायस्पोरा में मोदीजी हाल तक तालियाँ बजवाते थे, वहीं अब सरकार के ख़िलाफ़ ये प्रवासी भारतीय विरोध प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं?
नागरिकों के लिए जिज्ञासा का सवाल यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस और इनके सैकड़ों संगठनों के करोड़ों सदस्य/कार्यकर्ता ‘मुट्ठीभर’ आंदोलनकारियों का राजनीतिक स्तर पर प्रतिरोध करने के लिए सड़कों पर क्यों नज़र नहीं आ रहे हैं? उन राज्यों में भी क्यों नहीं, जहाँ डबल इंजन की हुकूमतें हैं? जनता का सामना करने से क्यों कतरा-घबरा रहे हैं? क्या इन तमाम लोगों को सिर्फ़ सांप्रदायिक विद्वेष क़ायम करने के लिए ही ट्रेंड किया गया है?
वे तमाम सेलिब्रिटीज़, ऐक्टर्स, फ़िल्म निर्माता, जो एक आवाज़ पर तालियाँ-थालियाँ बजाते थे, मोदीजी के कठिन वक्त में मौन क्यों हैं? कवि-गीतकार-रचनाकार भांड क्यों साबित हो रहे हैं? गोदी मीडिया के कवि सम्मेलनों से कवि ग़ायब क्यों हैं? मंत्री, सांसद, एमएलए जनता के बीच जाकर ज्ञानेश कुमार का बचाव क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या इन सबने भी सरकार का साथ छोड़ दिया है?
और सवाल यह भी है कि एनडीए के सहयोगी दल तेलुगू देशम और जेडीयू आंध्र और बिहार में चुनाव आयोग के पक्ष में पब्लिक ओपिनियन क्यों नहीं बना रहे हैं? एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र में रैलियाँ क्यों नहीं कर रहे हैं? मोदी कैबिनेट में तो इन सभी दलों के वाचाल प्रतिनिधि मौजूद हैं. ऐसा अचानक क्या हो गया कि तमिलनाडु से राज्यसभा सांसद और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण और संसदीय कार्य राज्य मंत्री एल. मुरुगन ने दोनों स्थानों से इस्तीफ़ा दे दिया और उसे स्वीकार भी कर लिया गया?
एनडीए की कोई भी बैठक या आपात बैठक क्यों नहीं हो रही है? इस समय तो इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. क्या सहयोगी दल जहाज़ छोड़ने का मुहूर्त तलाशने लगे हैं? क्या नौकरशाही ने राहुल गांधी के साथ अंदर की ख़बरें साझा करना शुरू कर दिया है, जैसा कि विपक्ष के नेता दावा भी करते हैं?
उल्टे हो यह रहा है कि बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, जो अभी तक मुँडेर पर बैठकर सारा तमाशा देख रहे थे, अब चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ बोलने लगे हैं! पटनायक ने ज्ञानेश कुमार के तुरंत इस्तीफ़े और एसआईआर के रिव्यू की माँग की है.
अंत में यह कि अगर मोदीजी के करिश्मे और अमित शाह के ख़ौफ़ का अंत होता दिखाई पड़ रहा है, तो फिर इस कठिन समय में प्रधानमंत्री के साथ कौन है? क्या वे अकेले हैं?

