अपर्णा वैदिक | प्रतिरोध का रोमांच और बदलाव की चुनौती

कल रायसीना हिल पर सत्ता का सोया हुआ दैत्य उस समय जाग उठा, जब उन हजारों युवाओं और नागरिकों ने, जिन्हें अक्सर सत्ता द्वारा महत्वहीन समझ लिया जाता है, अपने अहिंसक विरोध प्रदर्शन से उसकी छाती पर दस्तक दी. सीजेपी द्वारा शुरू किया गया यह असाधारण जन आंदोलन दुनिया भर में पिछले कुछ वर्षों में हुए जेन-ज़ी आंदोलनों की उसी श्रृंखला का हिस्सा है, जिसने हांगकांग (2019), श्रीलंका (2022), केन्या और बांग्लादेश (2024) तथा नेपाल, मेडागास्कर और मोरक्को (2025) जैसे देशों में सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती दी है.

संस्थाओं द्वारा किए गए विश्वासघात, छात्रों के सपनों के टूटने, जलवायु संकट, दुनिया के सामने लाइव प्रसारित हो रहे नरसंहारों, खराब अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने मिलकर आज के युवाओं के भीतर भविष्य को लेकर गहरी निराशा और असुरक्षा पैदा कर दी है. सोशल और डिजिटल मीडिया ने उन्हें इतिहास में पहले कभी न देखी गई गति से एक-दूसरे से जोड़ने और संगठित करने का काम किया है. युवाओं के इस उभार को देखकर मनुष्य की संघर्षशीलता और प्रतिरोध की क्षमता पर विश्वास मजबूत होता है. यह हमें याद दिलाता है कि सामाजिक और राजनीतिक मुक्ति की आकांक्षा आज भी हमारे भीतर जीवित है.

अब तक कुछ टिप्पणीकार सीजेपी की स्पष्ट वैचारिक रूपरेखा के अभाव को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी मानते रहे हैं. उन्होंने इसे राजनीतिक रूप से अपरिपक्व और अपने हितों के लिए राजनीति करने वाले युवाओं का एक बिखरा हुआ समूह कहकर खारिज करने की कोशिश की है. लेकिन वास्तविक जन लामबंदी ने एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने रखी है.

इस आंदोलन में बेरोजगार और अल्प-रोजगार वाले युवा हैं. पेशेवर लोग हैं. विदेशी और भारतीय विश्वविद्यालयों के छात्र हैं. स्कूली बच्चे, अभिभावक, शिक्षक, राजनीतिक नेता, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, कलाकार और चर्चित हस्तियां भी इसमें शामिल हैं. कुछ लोग एकजुटता और समर्थन व्यक्त करने आए हैं. कुछ अपने बच्चों और साथियों के भविष्य को लेकर आक्रोशित हैं. कुछ अपनी मेहनत का उचित प्रतिफल न मिलने से नाराज़ हैं. कुछ अब भी नव-उदारवादी बाजार व्यवस्था की परिवर्तनकारी शक्ति में विश्वास रखते हैं. कुछ भारतीय जनता पार्टी के मोहभंग हुए समर्थक और इस्लामोफोबिक विचारों से प्रभावित लोग हैं. वहीं आंबेडकरवादी, उदारवादी और वामपंथी छात्र संगठन जैसे एआईएसएफ, एसएफआई और आइसा के कार्यकर्ता भी इसमें शामिल हैं.

ऐसे में इस आंदोलन से किसी एक स्पष्ट विचारधारा की अपेक्षा करना उस गहरे अस्तित्वगत संकट को समझने से इनकार करना है, जिसने इतने विविध लोगों को एक मंच पर ला खड़ा किया है.

इन सभी लोगों की राजनीतिक विचारधाराएं और सामाजिक मान्यताएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उनके जीवन का एक साझा अनुभव है. वे असुरक्षा और अनिश्चितता से भरे जीवन का अनुभव करते हैं. ब्रिटिश श्रम अर्थशास्त्री गाइ स्टैंडिंग ऐसे लोगों को 'प्रेकारियट' कहते हैं. यह शब्द 'प्रिकैरियस' यानी असुरक्षित और 'प्रोलेटेरियट' यानी श्रमिक वर्ग को मिलाकर बनाया गया है.

प्रेकारियट एक नया सामाजिक वर्ग है, जिसकी जिंदगी रोजगार, सामाजिक स्थिरता, जीवन स्तर और भविष्य की संभावनाओं को लेकर लगातार अनिश्चितताओं से घिरी रहती है. आदर्श रूप से ऐसी परिस्थितियां उन्हें सामाजिक समानता, संसाधनों के पुनर्वितरण और सामूहिक जिम्मेदारी जैसे विचारों की ओर ले जा सकती हैं, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता.

असुरक्षा और अलगाव का यही अनुभव उन्हें दक्षिणपंथी विचारधाराओं और जनोन्मादी नेताओं की ओर भी आकर्षित कर सकता है. क्योंकि वे उन्हें सुरक्षित भविष्य का वादा करते हैं, जीवन पर नियंत्रण और व्यवस्था का एहसास देते हैं, किसी बड़े समुदाय का हिस्सा होने की भावना प्रदान करते हैं और सामाजिक पदानुक्रम में अपनी स्थिति बनाए रखने का भरोसा देते हैं. यही कारण है कि यह वर्ग वैचारिक रूप से किसी एक दिशा में बंधा हुआ नहीं होता. इस आंदोलन की वैचारिक विविधता और अनिश्चितता को भी इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए.

इतिहास गवाह है कि कई बड़े और सफल छात्र आंदोलनों के पास कोई एकीकृत वैचारिक ढांचा नहीं था. इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण 1968 का छात्र आंदोलन है, जिसने यूरोप और उत्तर अमेरिका को प्रभावित किया था.

इसकी शुरुआत फ्रांस के नांतेर विश्वविद्यालय में शिक्षा सुधारों की मांग से हुई थी. देखते ही देखते यह सोरबोन विश्वविद्यालय पहुंचा और फिर सड़कों पर फैल गया. पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी और गिरफ्तारियां कीं. लेकिन इसके बाद आंदोलन ने पूरे फ्रांस को अपनी चपेट में ले लिया. मजदूरों ने हड़ताल कर दी, कारखानों पर कब्जा कर लिया और सरकार को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया. बदलाव भले ही धीरे-धीरे आए हों, लेकिन वे महत्वपूर्ण और स्थायी साबित हुए.

पेरिस का छात्र आंदोलन जल्द ही बर्लिन, प्राग, वारसॉ, न्यूयॉर्क और मैक्सिको सिटी तक फैलती वैश्विक प्रतिरोध की राजनीति का हिस्सा बन गया. उस समय टेलीविजन ने वही भूमिका निभाई थी, जो आज सोशल मीडिया निभा रहा है. दुनिया के दूसरे हिस्सों में अपने जैसे युवाओं को विरोध करते देखकर छात्रों को नई ऊर्जा और साहस मिला. इससे राजनीतिक रणनीतियों, विचारों और प्रतिरोध की भाषा का वैश्विक आदान-प्रदान संभव हुआ.

यह ध्यान देने योग्य है कि 1968 के अधिकांश छात्र आंदोलनों के पास भी कोई एकीकृत वैचारिक केंद्र नहीं था. उन्होंने पूंजीवाद और सोवियत शैली के साम्यवाद, दोनों को चुनौती दी थी. इन आंदोलनों ने यह स्थापित किया कि किसी बड़े जन आंदोलन का नेतृत्व केवल ट्रेड यूनियनों या स्पष्ट वैचारिक एजेंडे वाले राजनीतिक दलों द्वारा ही किया जाना आवश्यक नहीं है.

अरब स्प्रिंग (2010) और ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट (2011) भी इसी तरह के आंदोलन थे. ये विकेंद्रीकृत सामाजिक लामबंदी और डिजिटल नेटवर्किंग के माध्यम से खड़े हुए थे. इनका राजनीतिक एजेंडा किसी एक विचारधारा के बजाय साझा सहमति और जवाबदेही की मांग पर आधारित था. इन सभी आंदोलनों में एक बात समान थी—संस्थाओं, सत्ता में बैठे लोगों और बुजुर्ग नेतृत्व वाली राजनीतिक व्यवस्था से जवाबदेही की मांग.

हालांकि, इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि ऐसे आंदोलनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी स्थिरता होती है. जनसमर्थन के बावजूद वे अक्सर समय के साथ अपनी गति खो देते हैं. सीजेपी द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन भी इसी चुनौती का सामना कर रहा है.

इस आंदोलन का सामाजिक आधार अब पहले से कहीं अधिक व्यापक हो चुका है. इसके समर्थक इसकी शुरुआती मांगों से आगे बढ़कर इसे व्यापक राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन के रूप में देखने लगे हैं. कई लोगों के लिए यह नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ असंतोष की अभिव्यक्ति भी बनता जा रहा है. यही कारण है कि देशभर में अधिक से अधिक लोग इससे जुड़ रहे हैं.

लेकिन यदि इस आंदोलन को अपनी ऊर्जा और प्रभाव बनाए रखना है, तो इसे स्वयं से कुछ कठिन प्रश्न पूछने होंगे. क्या केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी समस्याओं को अलग-अलग हल करना पर्याप्त होगा? क्या केवल इस्तीफों की मांग करना समाधान है? क्या शिक्षा सुधार अपने आप ज्ञान के क्षेत्र में न्याय और अल्पसंख्यकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित कर देंगे? क्या सत्ता के इस दैत्य को चुनौती देना ही पर्याप्त है, जबकि हमारा समाज अब भी जातिगत असमानताओं और बहुसंख्यकवादी राजनीति की समस्याओं से जूझ रहा है?

प्रतिरोध का रोमांच निस्संदेह आकर्षक होता है. लेकिन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता व्यापक और संरचनात्मक सोच की है. इस आंदोलन को स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि उसका नैतिक दायित्व क्या है और वह किस प्रकार के समाज के निर्माण के लिए संघर्ष कर रहा है.

अपर्णा वैदिक एक भारतीय इतिहासकार, लेखक और शिक्षिका हैं.

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