वादा था अवसरों का, युवाओं को मिली त्रुटिपूर्ण परीक्षाएं, चिंता और अतीत के गौरव की याद
‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, भारत ने दुनिया की सबसे कठोर परीक्षा प्रणालियों में से एक विकसित कर ली है, लेकिन इसके साथ वह संस्थागत क्षमता, प्रशासनिक जवाबदेही और भावनात्मक सुरक्षा तंत्र नहीं बना पाया जिसकी ऐसी व्यवस्था को आवश्यकता होती है. नतीजा यह है कि करोड़ों युवा, जो बेहतर भविष्य के सपने देखते हुए शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, अब एक कड़वी सच्चाई का सामना कर रहे हैं. भारत ने शिक्षा क्षेत्र में सफलता का प्रदर्शन तो तैयार कर लिया है, लेकिन वास्तविक सफलता अभी भी दूर है.
छात्रों की निराशा
नागपुर में एक छात्रा की आत्महत्या ने देश को झकझोर दिया. उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि वह नीट (NEET) की दोबारा परीक्षा देने का साहस नहीं जुटा सकी. पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द होने और फिर पुनर्परीक्षा की स्थिति ने हजारों छात्रों को मानसिक दबाव में डाल दिया. यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि उस शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है जिसमें एक परीक्षा, एक अंक और एक प्रतिशत पूरे जीवन का भविष्य तय करने का माध्यम बन जाते हैं.
भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी इस संकट को स्वीकार कर चुका है. जनवरी 2026 में छात्र मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम पर गठित राष्ट्रीय कार्यबल की अंतरिम रिपोर्ट पर चर्चा करते हुए अदालत ने कहा कि युवाओं में आत्महत्या की दर चिंताजनक रूप से बढ़ रही है. न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि हर छात्र आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत असफलता मान लेना गलत है. कई बार इसके पीछे संस्थागत दबाव और व्यवस्था की खामियां जिम्मेदार होती हैं.
यह समस्या केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है. सीबीएसई, नीट और सीयूईटी जैसी परीक्षाओं में हाल के वर्षों में सामने आई गड़बड़ियां इस बात का संकेत हैं कि छात्रों से अधिकतम प्रदर्शन की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन बदले में उन्हें भरोसेमंद और निष्पक्ष व्यवस्था नहीं मिलती.
असामान्य किशोरावस्था
भारतीय छात्रों का तनाव विश्वविद्यालय पहुंचने के बाद शुरू नहीं होता. बचपन से ही उन्हें अंकों और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में शामिल कर दिया जाता है. शिक्षा का उद्देश्य सीखना कम और परीक्षा में सफल होना अधिक बन गया है.
ग्रामीण भारत में शिक्षा का विस्तार तो हुआ है, लेकिन उसकी गुणवत्ता समान गति से नहीं बढ़ी. विभिन्न सर्वेक्षण बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता तक हासिल नहीं कर पाते. इसके बावजूद वे लगातार अगली कक्षाओं में पहुंचते जाते हैं और अंततः प्रवेश परीक्षाओं की कठिन दुनिया में प्रवेश करते हैं.
सीयूईटी और नीट जैसी परीक्षाओं के लिए लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं. वे कोचिंग संस्थानों पर भारी धन खर्च करते हैं, घर से दूर हॉस्टलों में रहते हैं और परिवार की उम्मीदों का बोझ उठाते हैं. लेकिन जब परीक्षा प्रणाली ही पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ियों, परीक्षा रद्द होने और पुनर्परीक्षा जैसी समस्याओं से घिर जाती है, तो यह दबाव कई गुना बढ़ जाता है.
इसी पृष्ठभूमि में छात्रों के भीतर असंतोष बढ़ रहा है. हाल के महीनों में बड़ी संख्या में युवाओं ने तथाकथित “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे व्यंग्यात्मक आंदोलन का समर्थन किया, जो बेरोजगारी और व्यवस्था के प्रति निराशा का प्रतीक बन गया है.
घटती स्वतंत्रता, बढ़ती बयानबाजी
शिक्षा व्यवस्था की एक और चुनौती है—शैक्षणिक स्वतंत्रता का लगातार सीमित होना. 2026 के अकादमिक फ्रीडम इंडेक्स में भारत को दुनिया के निचले 10-20 प्रतिशत देशों में रखा गया. विश्वविद्यालयों में असहमति और आलोचनात्मक विचारों के लिए जगह सिकुड़ती दिखाई देती है.
साथ ही, सरकार और संस्थान अक्सर वास्तविक समस्याओं के बजाय उपलब्धियों की ब्रांडिंग पर अधिक जोर देते हैं. यह तथ्य बार-बार सामने आता है कि दुनिया की शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में कोई भारतीय विश्वविद्यालय शामिल नहीं है. हालांकि सरकार यह बताती है कि वैश्विक रैंकिंग सूची में भारतीय संस्थानों की संख्या बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के स्तर पर अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है.
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक और विरोधाभास दिखाई देता है. एक ओर नीति आयोग भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र बनाने की बात करता है, दूसरी ओर हर साल लाखों भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई के लिए जा रहे हैं. 2024 तक विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 13 लाख से अधिक पहुंच चुकी थी. यह केवल बेहतर शिक्षा की तलाश नहीं, बल्कि घरेलू संस्थानों पर घटते भरोसे का भी संकेत है.
मुरझाता जनसांख्यिकीय लाभांश
भारत को लंबे समय से अपनी युवा आबादी पर गर्व रहा है. 2005 के आसपास शुरू हुआ जनसांख्यिकीय लाभांश का दौर 2055 तक जारी रहने की उम्मीद है. लेकिन यह लाभ अपने आप आर्थिक शक्ति में नहीं बदलता. इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार और मजबूत संस्थानों की आवश्यकता होती है.
वास्तविकता यह है कि बड़ी संख्या में युवा शिक्षा पूरी करने के बाद भी रोजगार नहीं पा रहे हैं. अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 25 वर्ष आयु वर्ग के स्नातकों में बेरोजगारी लगभग 40 प्रतिशत तक है. करोड़ों युवा कार्यबल में शामिल होने के लिए तैयार हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था उनके लिए पर्याप्त अवसर पैदा नहीं कर पा रही.
इस स्थिति में मध्यमवर्गीय परिवार अपनी बचत और कर्ज के सहारे बच्चों को विदेश भेजने की कोशिश कर रहे हैं. शिक्षा अब सामाजिक उन्नति का भरोसेमंद माध्यम कम और अनिश्चित दांव अधिक बनती जा रही है.
भारत की असली चुनौती केवल शिक्षा के गिरते मानक नहीं हैं. उससे भी बड़ी समस्या यह है कि युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास कमजोर हो रहा है. जब परीक्षाएं विवादों में घिरें, विश्वविद्यालय वैश्विक स्तर पर पिछड़ें और डिग्री के बाद रोजगार की गारंटी न हो, तब निराशा स्वाभाविक है.
आज का भारतीय युवा महत्वाकांक्षी है, शिक्षित है और बेहतर जीवन चाहता है. लेकिन उसके सामने खड़ी व्यवस्थागत बाधाएं यह याद दिलाती हैं कि केवल सफलता की कहानी सुनाने से सफलता नहीं मिलती. यदि शिक्षा और रोजगार की बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो भारत का बहुप्रचारित जनसांख्यिकीय लाभांश एक खोए हुए अवसर में बदल सकता है.

