भवानी शंकर नायक | भारत में दो भूख हड़तालों की कहानी

भूख हड़ताल राजनीति में एक नैतिक रणनीति है, जिसका उद्देश्य सत्ता में बैठे लोगों की मानवीय चेतना को जगाना होता है. इतिहास में इसका उपयोग शासक वर्ग को अधिक मानवीय बनाने और समाज को लोकतांत्रिक दिशा में आगे बढ़ाने के लिए किया गया है. महात्मा गांधी ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनसमर्थन जुटाने के लिए भूख हड़ताल का सहारा लिया. उन्होंने विभाजन के दौरान हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए भी "आमरण अनशन" की रणनीति अपनाई. गांधी के इस अहिंसक हस्तक्षेप का असर हुआ और नोआखाली के दंगे थम गए. भारत, अफ्रीका और आयरलैंड के स्वतंत्रता आंदोलनों में भी भूख हड़ताल एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हथियार रही है. जेलों में बंद कैदियों ने भी अपनी मांगों के समर्थन में इसका इस्तेमाल किया है. इस तरह भूख हड़ताल आज भी अहिंसक प्रतिरोध की साझा राजनीतिक भाषा बनी हुई है.

गांधी से लेकर सोनम वांगचुक तक, स्वतंत्र भारत में अनेक भूख हड़तालें अहिंसक प्रतिरोध और आत्मबलिदान की भावना के साथ की गई हैं. गांधी इसे आत्मानुशासन और आत्मशुद्धि का माध्यम मानते थे, जो शासक और जनता दोनों की नैतिक चेतना को संबोधित करता है तथा उन्हें शांति और अहिंसा के रास्ते पर ले जाता है. ऐसे आंदोलनों ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है, लोकतंत्र को मजबूत किया है और नागरिक अधिकारों के विस्तार में योगदान दिया है. भूख हड़ताल का यह तरीका लगभग सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने अपने-अपने उद्देश्यों के लिए अपनाया है. महात्मा गांधी ने 21 दिन तक अनशन किया था, जबकि इरोम शर्मिला ने भारत के इतिहास की सबसे लंबी भूख हड़ताल की. उन्होंने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम, 1958 को समाप्त करने की मांग करते हुए 16 वर्षों तक भोजन नहीं किया और उन्हें नाक के जरिए जबरन तरल आहार देकर जीवित रखा गया.

पहली भूख हड़ताल

अप्रैल 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन के साथ 5 अप्रैल को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. "इंडिया अगेंस्ट करप्शन" आंदोलन के माध्यम से यह एक व्यापक जनआंदोलन में बदल गया, जिसने अंततः कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार को सत्ता से बाहर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस आंदोलन ने वह राजनीतिक माहौल तैयार किया, जिसने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया.

इसी आंदोलन से आम आदमी पार्टी का भी जन्म हुआ. लेखक के अनुसार, भ्रष्टाचार विरोधी उद्देश्य के बावजूद इस आंदोलन ने देश के अनेक छोटे-बड़े जन आंदोलनों की धार को कमजोर किया और भारतीय राजनीति को और अधिक गैर-राजनीतिक बनाने का काम किया.

अन्ना हजारे के 13 दिन के अनशन के जवाब में यूपीए सरकार ने आंदोलन की मांगों पर विचार किया, संसद में बहस कराई और लोकपाल विधेयक पारित किया. बाद में लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम लागू किया गया. हालांकि यह कानून बना, लेकिन इस आंदोलन को मिला जनसमर्थन यूपीए सरकार के राजनीतिक पतन का कारण बना. इससे कांग्रेस की राष्ट्रीय पकड़ कमजोर हुई और आरएसएस तथा भाजपा के उभार का रास्ता साफ हुआ.

लेखक का दावा है कि हिंदुत्व आधारित पूंजीवादी व्यवस्था में भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण और सामान्यीकरण हो चुका है. इसके बावजूद आज अन्ना हजारे और "इंडिया अगेंस्ट करप्शन" आंदोलन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लगभग पूरी तरह मौन दिखाई देते हैं. लेखक के अनुसार, यह आंदोलन अंततः भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने का माध्यम बनकर रह गया. उनके अनुसार, भाजपा के साथ-साथ किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल जैसे कई प्रमुख चेहरे भी इस आंदोलन के प्रत्यक्ष राजनीतिक लाभार्थी बने.

दूसरी भूख हड़ताल

सोनम वांगचुक केवल शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में अपने कार्यों के लिए ही नहीं, बल्कि लद्दाख में राज्य का दर्जा, जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर आंदोलनों के लिए भी जाने जाते हैं. उन्होंने 28 जून 2026 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की.

लेखक के अनुसार, वांगचुक की प्रमुख मांग केंद्रीय उच्च शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी. उनका आरोप था कि हाल के नीट प्रश्नपत्र लीक प्रकरण के लिए मंत्री जवाबदेह हैं, जिसके कारण अनेक छात्रों की मौत हुई और बड़ी संख्या में छात्र मानसिक आघात से अब तक उबर नहीं पाए हैं.

लेखक लिखते हैं कि 22 दिनों तक चले इस अनशन के बावजूद मोदी सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया. इसके बजाय पुलिस ने उन्हें धरनास्थल से हटाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया. लेखक का आरोप है कि सरकार ने जन जवाबदेही के बजाय अपने मंत्री का बचाव करना उचित समझा. उनके अनुसार, यह घटना लोकतांत्रिक मूल्यों और नैतिक जवाबदेही की कमी को दर्शाती है. लेखक का कहना है कि हिंदुत्व की राजनीति न केवल शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्कृति को भी कमजोर कर रही है.

व्यापक राजनीतिक संदर्भ

लेखक के अनुसार, हिंदुत्व की राजनीति राष्ट्रीय और वैश्विक पूंजीवादी शक्तियों की एक राजनीतिक और आर्थिक परियोजना है. उनका तर्क है कि यह राष्ट्रवाद या देशभक्ति की नहीं, बल्कि कॉरपोरेट हितों की रक्षा करने वाली एक प्रतिक्रियावादी राजनीतिक परियोजना है. लेखक का मानना है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों और भूख हड़ताल जैसे नैतिक प्रतिरोधों का इस सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि उसके पास नैतिक आधार का अभाव है.

लेखक के अनुसार, हिंदुत्व की राजनीति शासन में केंद्रीकरण, अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद, समाज में ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था और संस्कृति में प्रतिक्रियावादी सोच को बढ़ावा देती है. उनका निष्कर्ष है कि ऐसे राजनीतिक ढांचे में व्यक्तिगत भूख हड़तालें प्रभावी नहीं हो सकतीं. इसके बजाय, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए व्यापक जनआंदोलन की आवश्यकता है, जैसा कि उनके अनुसार अन्ना हजारे के आंदोलन ने यूपीए सरकार के खिलाफ किया था.

भवानी शंकर नायक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं. यह Countercurrents.org पर प्रकशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है.

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