श्रवण गर्ग | क्या मोदीजी डर गए हैं कि अब बच्चे भी उनसे नहीं डरते?
कॉकरोच जनता पार्टी का असली आंदोलन तो अब शुरू हुआ है. उसकी ताक़त की परीक्षा अब होनी है कि वांगचुक की अनुपस्थिति में कैसे और इतने दिन चल पाता है. पार्टी के पास सोनम वांगचुक के क़द का कोई अन्य चेहरा नहीं है. सिद्ध करना पड़ेगा कि किसी अण्णा हजारे या वांगचुक के बिना भी आंदोलन को ज़िंदा रखा जा सकता है. कॉकरोचों का आंदोलन अगर हक़ीक़त में ग़ैर-राजनीतिक और गांधीवादी है तो अभिजीत दीपके को चाहिए कि वे मेधा पाटकर से मराठी में संपर्क करके उन्हें मनाएँ कि वे अपने ‘नर्मदा बाधाओ आंदोलन’ को छोड़ जंतर-मंतर पर आकर बैठ जाएँ और उसे विश्वसनीयता प्रदान करें. वे आएँगी नहीं.
मेधा पाटकर जानती हैं उन्हें जीवन में क्या करना है. वांगचुक नहीं जानते थे. (हालाँकि एक इंटरव्यू में वांगचुक ने कहा है कि लद्दाख के एलजी ने उन्हें दीपके से संपर्क करने के लिए ‘विवश’ किया था). बताया गया है कि वांगचुक की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी गीतांजलि आंदोलन को लीड करने वाली है. वांगचुक इस समय सरकार की मेडिकल कस्टडी में हैं. यह कस्टडी कब तक चलेगी पता नहीं. हो सकता है इलाज या आंदोलन की समाप्ति के बाद उन्हें उनके लद्दाख स्थित संस्थान ले जाकर छोड़ दिया जाए. वांगचुक को अनशन स्थल से उठाकर अस्पताल में भर्ती कराने के सरकार के कदम को हाई कोर्ट ने सही ठहरा दिया है.
पुलिस द्वारा वांगचुक को जबरन उठा लिये जाने (अथवा आरोपित तौर पर उन्हें अनशन से ‘ग्रेसफुल एग्जिट’ प्रदान कराने) के बाद दीपके अनशन पर बैठ गए हैं. दीपके से सरकार को कोई ख़तरा नहीं है. आश्चर्यजनक नहीं कि बीजेपी के मीडिया सेल या भक्तों ने दीपके की इस नाराज़गी को क़तई सीरियसली नहीं लिया कि ‘’मोदीजी अबतक के सबसे घटिया प्रधानमंत्री ही नहीं सबसे घटिया इंसान भी हैं. उनकी वजह से प्रधानमंत्री पद की कुर्सी का अपमान हो रहा है.’’ यही बात अगर राहुल कह देते तो मुल्क में बवाल मच जाता!
लोगों के मन में सवाल है कि अचानक ऐसा क्या हो गया कि बीस दिनों से अनशन कर रहे वांगचुक को किसी विदेशी आक्रांता की तरह हमला करके मेडिकल कस्टडी में लेने की ज़रूरत पड़ गई? सरकार क्या सभी अदालती आदेशों का इतनी ही गंभीरता से पालन करती या करवाती है? मोदीजी, जैसे कि अपने अहंकारी स्वभाव के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं, वांगचुक को भी पर्यावरणविद जी डी अग्रवाल की तरह ही जाने दे सकते थे?
एक सौ ग्यारह दिनों के आमरण अनशन के बाद जब डॉ अग्रवाल ने 11 अक्टूबर 2018 को ऑल-इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़, ऋषिकेश में प्राण त्यागे तब उनकी उम्र 86 वर्ष की थी. मोदीजी ने जब उन्हीं की कोई परवाह नहीं की तो फिर वांगचुक के अनशन को तो सिर्फ़ बीस दिन ही हुए थे और उनकी उम्र भी सिर्फ़ 59 साल की है. सरकार भरपूर रिस्क ले सकती थी.
अठारह जुलाई की अल-सुबह जंतर-मंतर पर जो पुलिसिया ड्रामा हुआ इशारा है कि मोदीजी में अब 2018 वाला साहस नहीं बचा. बिना किसी अनशन के भी उनकी सरकार का वज़न कम होता जा रहा है और प्रधानमंत्री का जनता के प्रति डर बढ़ता जा रहा है! मोदीजी शायद ख़ौफ़ में आ गए होंगे कि अब तो प्रदर्शनकारी बच्चे भी सरकार से नहीं डर रहे हैं. वांगचुक के गिरते स्वास्थ्य के प्रति देश-दुनिया में चिंता बढ़ती जा रही है और उनकी ही पार्टी की वाचाल भक्त-मंडली ठंडी पड़ी हुई है. जी डी अग्रवाल के अनशन के समय तो पार्टी की हालत ऐसी नहीं थी?
सरकार शायद इसलिए भी तुरंत हरकत में आई होगी कि सोनिया गांधी के निर्देशों पर हुई पवन खेड़ा की जंतर-मंतर पर एंट्री के ज़रिए राहुल गांधी की आत्मा का आंदोलन के शरीर में कर चुकी थी और बाज़ी नक़ली हाथों से फिसलकर असली हाथों में पहुँचने वाली थी!
सवाल यह है कि बॉस्टन से हवाई जहाज़ में उड़ाकर जंतर मंतर पहुँचे आंदोलन का हश्र अब क्या होगा? राहुल गांधी ने तो वांगचुक की बिगड़ती स्थिति के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए आंदोलन की माँगों के प्रति समर्थन ज़ाहिर कर दिया! दीपके के मुँह से क्यों नहीं निकल रहा है कि बिना माँगे पूरी हुए जंतर-मंतर अब ख़ाली नहीं होना चाहिए, वांगचुक की अनुपस्थिति में राहुल गांधी को आंदोलन का नेतृत्व करना चाहिए! दीपके की आख़िर पॉलिटिक्स क्या है? उनकी डोर किन अदृश्य या नोन-बायोलॉजिकल हाथों में है?
श्रवण गर्ग देश के एक वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार हैं.

