सामूहिक अंधत्व को वीरता की कहानी में बदलने का आरोप: फिल्म 'चौहान' के ट्रेलर पर क्यों छिड़ी बहस

'चौहान' के ट्रेलर का एक दृश्य.

‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित प्रिया रमानी की रिपोर्ट के अनुसार, निर्देशक नीरज यादव की आगामी फिल्म 'चौहान' का ट्रेलर रिलीज होने के बाद नई बहस शुरू हो गई है. आरोप है कि फिल्म कश्मीर में पेलेट गन के इस्तेमाल जैसी गंभीर मानवीय त्रासदी को एक अलग नजरिए से प्रस्तुत करती है. जहां पहले कई राजनीतिक फिल्मों पर घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के आरोप लगे, वहीं इस फिल्म पर वास्तविक त्रासदी की गंभीरता को कम करके दिखाने की आलोचना हो रही है.

शुरुआत 2017 में एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में दर्ज एक कश्मीरी युवक की गवाही से होती है. युवक ने बताया था कि उसके चेहरे पर 92 पेलेट लगे थे. उसके अनुसार, इन छर्रों ने केवल उसकी आंखों की रोशनी ही नहीं छीनी, बल्कि उसके सपनों, उम्मीदों और सामान्य जीवन को भी गहरा आघात पहुंचाया. यह गवाही उन हजारों लोगों के दर्द का प्रतीक मानी गई है, जो पेलेट गन के इस्तेमाल से प्रभावित हुए.

फिल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा की उस टिप्पणी का भी जिक्र किया गया है, जिसमें उन्होंने निर्देशक नीरज यादव की पिछली फिल्म की आलोचना की थी. इसके बाद यह तर्क सामने रखा गया है कि 'चौहान' का ट्रेलर उन फिल्मों की श्रेणी में दिखाई देता है, जिनमें मुस्लिम पात्रों को विरोधी और राज्य को नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.

ट्रेलर में अजय देवगन का किरदार कहता है कि "गलती हमारी नहीं थी" और पेलेट गन से केवल "सीमित नुकसान" होता है. इसी दौरान घायल प्रदर्शनकारी की आंखों का दृश्य दिखाया जाता है. यही दृश्य फिल्म के संदेश और वास्तविक घटनाओं के बीच सबसे बड़ा विरोधाभास पैदा करता है.

एक समय सुरक्षा बलों ने पेलेट गन को "गैर-घातक" हथियार बताया था, लेकिन बाद में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और कई मीडिया रिपोर्टों ने इस दावे पर सवाल उठाए. ब्रिटेन स्थित ओमेगा रिसर्च फाउंडेशन के एक प्रतिनिधि ने इसे पंप-एक्शन शॉटगन बताया, जिसके छर्रों की दिशा नियंत्रित नहीं की जा सकती और जिससे गंभीर चोटें लग सकती हैं.

उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 से 2016 के बीच लगभग 10 हजार कश्मीरी पेलेट गन से घायल हुए. इनमें करीब 60 प्रतिशत मामले केवल जुलाई से अक्टूबर 2016 के चार महीनों में सामने आए. एक हजार से अधिक लोगों ने आंशिक या पूर्ण रूप से अपनी दृष्टि खो दी.

श्रीनगर के मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान के 2019 के अध्ययन में पाया गया कि पेलेट हिंसा के शिकार कम से कम 85 प्रतिशत लोगों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं विकसित हुईं. आंखों में गंभीर चोट झेलने वाले सबसे अधिक प्रभावित पाए गए.

एक ऐसे पीड़ित की गवाही भी शामिल की गई है जिसकी एक आंख की रोशनी जा चुकी है और जिसके शरीर में आज भी सैकड़ों पेलेट फंसे हुए हैं. उसके अनुसार, दृष्टि खोना ही सबसे बड़ी समस्या नहीं है. लंबे समय तक धूप में रहने पर शरीर में सूजन और जलन होने लगती है तथा शरीर में मौजूद छर्रे लगातार दर्द देते रहते हैं.

पेलेट गन मूल रूप से शिकार के लिए बनाई गई थीं, लेकिन बाद में भीड़ नियंत्रण के लिए उनका इस्तेमाल किया गया. इनसे निकलने वाले धातु के छोटे-छोटे छर्रों की दिशा नियंत्रित नहीं की जा सकती. एक सामाजिक समूह के आंकड़ों के अनुसार, पेलेट गन से एक या दोनों आंखों की रोशनी खो चुके 1,432 लोगों का पंजीकरण किया गया था, जिनमें 32 महिलाएं भी शामिल थीं.

फोटोग्राफर कैमिलो पास्क्वारेली की फोटो श्रृंखला 'वैली ऑफ शैडोज़' का भी उल्लेख किया गया है. इस श्रृंखला में पेलेट पीड़ितों के चित्रों के साथ उनके एक्स-रे दिखाए गए हैं, जिनमें शरीर और सिर के भीतर फंसे धातु के छर्रे साफ दिखाई देते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड में कश्मीर की छवि भी तेजी से बदली है. कभी फिल्मों में कश्मीर को प्रेम, पर्यटन और प्राकृतिक सुंदरता के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता था, लेकिन अब कई फिल्मों में इसे सुरक्षा अभियानों, आतंकवाद और राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. इसे केवल कहानी का नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण में आए बदलाव का संकेत माना गया है.

ट्रेलर में कश्मीर को "पठानों की जमीन" बताया जाता है, जबकि स्थानीय पहचान को लगभग नजरअंदाज कर दिया जाता है. आलोचकों का मानना है कि इस तरह की प्रस्तुति कश्मीर को केवल धार्मिक संघर्ष के नजरिए से देखने की प्रवृत्ति को मजबूत करती है.

फिल्म के शीर्षक को लेकर भी विवाद सामने आया है. क्षत्रिय परिषद ने बयान जारी कर कहा कि ऐतिहासिक राजपूत वंश के नाम को समकालीन सांप्रदायिक राजनीति से जोड़ना उचित नहीं है. परिषद ने भारतीय इतिहास के कई उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग समय में राजपूत और अफगान शासकों ने कई युद्धों में एक-दूसरे के साथ मिलकर भी लड़ाई लड़ी थी. इसलिए इतिहास को केवल धार्मिक विभाजन के आधार पर नहीं देखा जा सकता.

पूरा विवाद अंततः एक बड़े सवाल पर आकर ठहरता है कि क्या किसी दस्तावेजीकृत मानवीय त्रासदी को लोकप्रिय सिनेमा में इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है कि उसके वास्तविक पीड़ितों की पीड़ा और अनुभव पीछे छूट जाएं. पेलेट गन से प्रभावित हजारों लोगों की कहानियां आज भी मौजूद हैं और इसी कारण फिल्म के ट्रेलर को लेकर यह बहस केवल सिनेमा तक सीमित नहीं, बल्कि इतिहास, स्मृति और मानवीय अधिकारों की चर्चा का भी हिस्सा बन गई है.

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