आधिकारिक दस्तावेजों से परे, नागरिक होने और इस देश से जुड़ाव का अधिकार

24 जून 2026 को भारत के विदेश मंत्रालय (एमईए) के एक अधिकारी ने एक ऐसा बयान दिया जिसने नागरिकता को लेकर नई बहस छेड़ दी. अधिकारी ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट "यात्रा का दस्तावेज" है, "नागरिकता का दस्तावेज" नहीं. इसके बाद सवाल उठा कि यदि पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो फिर कौन-सा दस्तावेज है? लेकिन असली मुद्दा केवल पासपोर्ट नहीं, बल्कि यह है कि भारत में नागरिक होने का अर्थ क्या है और नागरिकता तय करने का आधार क्या होना चाहिए.

क्या पासपोर्ट केवल यात्रा का दस्तावेज है?

विदेश मंत्रालय का बयान पहली नजर में तकनीकी लग सकता है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में भारतीय पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है. अपवादस्वरूप सरकार जनहित में किसी गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट दे सकती है, पर ऐसे मामले बेहद दुर्लभ हैं. इसलिए, सामान्य रूप से पासपोर्ट किसी व्यक्ति की नागरिकता का महत्वपूर्ण और निर्णायक प्रमाण माना जाना चाहिए.

यदि यह साबित हो जाए कि किसी व्यक्ति ने गलत जानकारी देकर पासपोर्ट हासिल किया है, तो सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है. लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पासपोर्ट केवल यात्रा का दस्तावेज है और उसकी नागरिकता संबंधी अहमियत नहीं है.

जांच के घेरे में नागरिकता

यह बयान ऐसे समय आया है जब विभिन्न राज्यों में भारत निर्वाचन आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूचियों की समीक्षा कर रहा है. हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने बिहार में एसआईआर की वैधता और निर्वाचन आयोग के नागरिकता की जांच करने के अधिकार को स्वीकार किया. इससे पहले असम समझौते से जुड़े फैसले में भी अदालत ने नागरिकता की अवधारणा पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं.

इसी बीच, 2019 में नागरिकता अधिनियम में किया गया संशोधन, जिसे 2024 में लागू किया गया, प्राकृतिककरण के नियमों को धार्मिक आधार पर बदलता है. इन सभी घटनाओं ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत का नागरिक किसे माना जाएगा और किन आधारों पर?

संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 तक विभाजन के बाद नागरिकता से जुड़े प्रश्नों का समाधान किया गया था. अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता पर कानून बनाने का अधिकार देता है, लेकिन संविधान सभा की बहसें बताती हैं कि यह अधिकार संविधान के मूल सिद्धांतों से ऊपर नहीं माना गया था.

नागरिकता की बुनियाद

संविधान सभा में पी. एस. देशमुख ने प्रस्ताव रखा था कि दुनिया में कहीं भी रहने वाला हर हिंदू या सिख, यदि किसी अन्य देश का नागरिक नहीं है, तो उसे भारत की नागरिकता मिलनी चाहिए. इस प्रस्ताव का जवाहरलाल नेहरू और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर सहित कई सदस्यों ने विरोध किया. उनका स्पष्ट मत था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा और नागरिकता का आधार धर्म नहीं बन सकता. अंततः यह प्रस्ताव खारिज कर दिया गया और डॉ. भीमराव आंबेडकर की धर्मनिरपेक्ष नागरिकता की अवधारणा को स्वीकार किया गया.

भारत ने शुरुआत में जन्म और निवास आधारित नागरिकता यानी जस सोली के सिद्धांत को अपनाया था. लेकिन समय के साथ कानून में बदलाव हुए. 1985 में असम समझौते के तहत धारा 6ए जोड़ी गई और 2003 में यह प्रावधान किया गया कि यदि माता-पिता में से एक भी "अवैध प्रवासी" है, तो भारत में जन्म लेने वाला व्यक्ति स्वतः नागरिक नहीं होगा.

उच्चतम न्यायालय ने 2024 में धारा 6ए को वैध ठहराया. इसके बाद 2026 में बिहार के एसआईआर मामले में अदालत ने कहा कि निर्वाचन आयोग मतदाता सूची के उद्देश्य से नागरिकता की जांच कर सकता है और संदेह होने पर मामला सक्षम प्राधिकारी को भेज सकता है.

लेकिन असम का अनुभव बताता है कि ऐसी प्रक्रियाएं लोगों को वर्षों तक कानूनी और प्रशासनिक उलझनों में फंसा सकती हैं. किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित किए बिना भी उसके अधिकार लंबे समय तक अनिश्चित स्थिति में रखे जा सकते हैं.

इसी संदर्भ में विदेश मंत्रालय का बयान अधिक चिंताजनक लगता है. पहले जहां राज्य सामान्य रूप से किसी निवासी को नागरिक मानता था, वहीं अब नागरिकता साबित करने का भार धीरे-धीरे व्यक्ति पर आ गया है. आधार कार्ड को केवल निवास का प्रमाण, मतदाता पहचान पत्र को केवल पंजीकरण का प्रमाण और अब पासपोर्ट को भी केवल यात्रा का दस्तावेज बताया जा रहा है.

व्यक्ति होने की प्राथमिकता

भारतीय संविधान में कई मूल अधिकार नागरिकता नहीं, बल्कि व्यक्ति होने के आधार पर दिए गए हैं. अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है.

नागरिकता इन्हीं अधिकारों की बुनियाद पर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने, व्यवसाय करने और मतदान जैसे लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान करती है. इसलिए नागरिकता केवल कानूनी दर्जा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी का आधार है.

ऐसी संवैधानिक व्यवस्था में नागरिकता का निर्धारण केवल दस्तावेजों के आधार पर नहीं किया जा सकता. इसके केंद्र में प्रत्येक व्यक्ति की समान गरिमा, समान संरक्षण और संविधान के धर्मनिरपेक्ष तथा समानता के मूल आदर्श होने चाहिए. यही सिद्धांत सुनिश्चित करते हैं कि नागरिकता केवल कागजों का विषय न रह जाए, बल्कि व्यक्ति और राज्य के बीच भरोसे तथा अधिकारों के संबंध का आधार बनी रहे.

सुहृत पार्थसारथी मद्रास उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता हैं. यह लेख द हिन्दू में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवादित अंश है. 

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