श्रवण गर्ग | जब हुकूमत ही अपनी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है, तो फिर जवाबदेही की उम्मीद किससे की जाए?
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने राम मंदिर में चढ़ावे और दान को लेकर उठे विवाद पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत निधीश त्यागी ने देश के प्रमुख मंदिरों के उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों की तुलना से की. उन्होंने राम मंदिर, माता वैष्णो देवी, तिरुमला वेंकटेश्वर, शिरडी साईं बाबा और सांवलिया सेठ मंदिर में प्रति श्रद्धालु दान और चढ़ावे के अनुमानित आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग सार्वजनिक स्रोतों से जुटाए गए इन आंकड़ों के आधार पर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन आंकड़ों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि का दावा नहीं किया जा रहा है.
इसी संदर्भ में श्रवण गर्ग ने कहा कि असली सवाल केवल चढ़ावे की राशि का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का है. उन्होंने पूछा कि यदि राम मंदिर में करोड़ों लोग दर्शन के लिए पहुंचे हैं, तो प्रति श्रद्धालु औसत चढ़ावा अन्य प्रमुख मंदिरों की तुलना में इतना कम क्यों दिखाई देता है. उनके अनुसार यदि दान और चढ़ावे को लेकर किसी तरह की अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे.
श्रवण गर्ग ने कहा कि इस पूरे विवाद को केवल राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने बद्रीनाथ-केदारनाथ, काशी विश्वनाथ, तिरुपति, सबरीमाला और अन्य बड़े धार्मिक संस्थानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कहीं भी दान, प्रबंधन या पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं, तो वहां भी समान रूप से जवाबदेही तय होनी चाहिए. उनके अनुसार यह बहस किसी एक मंदिर की नहीं, बल्कि देशभर के धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता और जनता के विश्वास की है.
चर्चा के दौरान श्रवण गर्ग ने राजनीतिक जवाबदेही का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि यदि राम मंदिर और धार्मिक आस्था लंबे समय तक राजनीति के प्रमुख विषय रहे हैं, तो ऐसे मामलों में केवल ट्रस्ट या स्थानीय प्रबंधन ही नहीं, बल्कि सत्ता से भी जवाबदेही पूछी जानी चाहिए. उनका कहना था कि लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं दोनों से पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा रखने का अधिकार है.
एपिसोड के अंत में श्रवण गर्ग ने कहा कि मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितना चढ़ावा आया, बल्कि यह भी है कि श्रद्धालुओं के दान का उपयोग किस प्रकार हुआ और उसकी जवाबदेही किसके पास है. पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

