जेन अल्फा के विरोध प्रदर्शन दिखाते हैं कि भारत का आधिकारिक स्कूल डेटा कितना अविश्वसनीय है
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, हाल के हफ्तों में देश के अलग-अलग राज्यों में स्कूली छात्रों ने अपने स्कूलों की बदहाल स्थिति के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किए हैं. इन प्रदर्शनों को हाल में दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में हुए जेन जेड प्रदर्शनों की तर्ज पर "जेन अल्फा" प्रदर्शन कहा जा रहा है. छात्रों ने स्कूलों के मुख्य द्वार और सड़कों पर धरना दिया, कर्मचारियों को अंदर बंद किया और स्थानीय अधिकारियों के कार्यालयों तक मार्च कर अपनी मांगें रखीं. इन प्रदर्शनों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने "स्कूल ठीक करो" अभियान शुरू किया है.
छात्रों और अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं ने जो तस्वीरें और वीडियो साझा किए हैं, उनमें जर्जर कक्षाएं, छत से गिरता प्लास्टर, टूटी बेंचें और डेस्क, गंदे शौचालय तथा बदरंग पानी दिखाई देता है. यह स्थिति सरकारी आंकड़ों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के 99 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में शौचालय और 99.6 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल की सुविधा उपलब्ध है.
ये आंकड़े शिक्षा मंत्रालय के एकीकृत जिला शिक्षा सूचना तंत्र पर दर्ज किए जाते हैं. इसमें प्रत्येक स्कूल में विद्यार्थियों और शिक्षकों की संख्या, कक्षाओं, शौचालयों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं और पेयजल जैसी सुविधाओं की जानकारी शामिल होती है. लेकिन कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि जानकारी मुख्य रूप से स्कूल प्रधानाचार्यों द्वारा दर्ज की जाती है. राजस्थान की कार्यकर्ता एकता चंदा के अनुसार स्कूल कर्मचारी अपनी कमियां बताने से बच सकते हैं क्योंकि उन्हें नौकरी पर असर पड़ने का डर रहता है.
अलवर, राजस्थान
अलवर के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, जोधावास के 2025-26 के सरकारी आंकड़ों में छह कक्षाएं दर्ज थीं और केवल एक कक्षा में मामूली मरम्मत की जरूरत बताई गई थी. दोनों शौचालयों को चालू और पेयजल व्यवस्था को भी कार्यशील बताया गया.
लेकिन अगस्त की शुरुआत में एक खाली कक्षा की छत का हिस्सा गिरने के बाद छात्रों ने धरना शुरू किया. समाचार रिपोर्टों के अनुसार 174 छात्रों को केवल तीन कक्षाओं में बैठना पड़ रहा था क्योंकि स्कूल का बाकी भवन जर्जर था. छात्रों ने कक्षाओं और शौचालयों की मरम्मत, पानी का फिल्टर और अतिरिक्त शिक्षकों की मांग की.
कक्षा 10 की एक छात्रा ने बताया कि बारिश के दौरान कक्षा की छत से पानी टपकता था और बिजली भी दिन में केवल दो घंटे आती थी. शौचालयों की सफाई तक छात्रों और शिक्षकों को करनी पड़ती थी. प्रदर्शन के बाद मरम्मत शुरू हुई, लेकिन छात्रा ने कहा कि मांगें पूरी नहीं हुईं तो वे फिर प्रदर्शन करेंगे.
जयपुर, राजस्थान
श्रवण एवं श्रवण-बाधित विद्यार्थियों के लिए बने राजकीय सेठ आनंदीलाल पोद्दार बधिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के सरकारी आंकड़ों में 599 विद्यार्थियों के लिए 28 कक्षाएं दर्ज थीं और किसी कक्षा में मरम्मत की जरूरत नहीं बताई गई थी. आठों शौचालय और पेयजल सुविधा भी कार्यशील बताई गई. विद्यालय में 50 शिक्षक दर्ज थे.
इसके विपरीत छात्रों के प्रदर्शन और उनके साझा किए गए वीडियो में जर्जर भवन, टूटता प्लास्टर, गंदे और गैर-कार्यशील शौचालय तथा पेयजल और शिक्षकों की कमी की शिकायत सामने आई. इसी महीने छत से प्लास्टर गिरने से एक छात्र के घायल होने की भी खबर आई.
किशुनपुर, उत्तर प्रदेश
फतेहपुर के किशुनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज ने सरकारी पोर्टल पर 1,883 विद्यार्थियों के लिए 19 कक्षाएं दर्ज कीं. इनमें केवल छह में मामूली मरम्मत की जरूरत बताई गई. पांचों शौचालयों को कार्यशील, बिजली और पुस्तकालय की सुविधा उपलब्ध बताई गई.
लेकिन छात्रों ने खराब बुनियादी सुविधाओं के खिलाफ प्रदर्शन किया. उनकी शिकायतों में टूटी बेंच और कुर्सियां, टपकती छत, पेयजल की कमी, खराब स्वच्छता, पंखों का अभाव और अनियमित बिजली शामिल थे. छात्रों ने पुस्तकालय नहीं होने की भी शिकायत की.
उत्तर प्रदेश के ही गंगवा का डेरा प्राथमिक विद्यालय ने सभी मौसम में पहुंच योग्य सड़क होने की जानकारी दी थी. इसके बावजूद छात्र पांच किलोमीटर पैदल चलकर जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे और स्कूल तक सड़क बनाने की मांग की.
गया, बिहार
गया के सिमुआरा मध्य विद्यालय ने 11 कक्षाओं में से चार को बड़ी मरम्मत की जरूरत वाली बताया था. दोनों शौचालयों और पेयजल व्यवस्था को कार्यशील दर्ज किया गया.
लेकिन छात्रों ने चार किलोमीटर पैदल चलकर अनुमंडल कार्यालय तक मार्च किया. उन्होंने खराब शौचालय, बिजली की समस्या, पंखों की कमी, खराब पानी और मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायत की. कई स्कूलों के छात्रों ने गर्मी में पंखे नहीं होने की समस्या भी बताई, जबकि सरकारी पोर्टल पर पंखों की उपलब्धता की जानकारी ही दर्ज नहीं होती.
छतरपुर, मध्य प्रदेश
छतरपुर के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, ततम ने सरकारी पोर्टल पर स्कूल तक सभी मौसम में पहुंचने योग्य सड़क होने की जानकारी दी थी. इसके विपरीत छात्रों ने 18 घंटे तक आंदोलन किया और जिला मुख्यालय की ओर 40 किलोमीटर पैदल मार्च किया. उनका कहना था कि स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क बेहद खराब है और बरसात में लगभग अनुपयोगी हो जाती है.
आंकड़ों पर गंभीर सवाल
सरकारी स्कूलों के आंकड़ों में गलत जानकारी दिए जाने के आरोप पहले भी सामने आए हैं. 2023 में महाराष्ट्र में शिक्षा अधिकारियों पर स्कूलों को शिक्षा संबंधी सरकारी सूचना तंत्र पर गलत जानकारी देने के निर्देश देने के आरोप लगे थे.
अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने झारखंड में स्कूलों का सर्वेक्षण किया है. उन्होंने कहा कि स्कूलों से आंकड़े जुटाना जरूरी है, लेकिन कुछ आंकड़े विश्वास करने योग्य नहीं लगते. उनके अनुसार झारखंड में भी 99 प्रतिशत स्कूलों में शौचालय होने का दावा किया जाता है, जबकि जमीनी दौरे में तस्वीर अलग दिखाई देती है. बिहार के शिक्षा कार्यकर्ता अनिल राय ने भी कहा कि कई स्कूलों के शौचालय कागजों पर मौजूद हैं, लेकिन सफाईकर्मी न होने के कारण उनका इस्तेमाल नहीं होता.
राजस्थान में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है. जुलाई 2025 में झालावाड़ के एक स्कूल की छत गिरने से सात छात्रों की मौत और 27 घायल हुए थे. घटना से पहले छात्रों ने छत से मलबा गिरने की शिकायत की थी. इसके बावजूद सरकारी आंकड़ों में स्कूल की चारों कक्षाओं को अच्छी स्थिति में बताया गया.
एकता चंदा के अनुसार घटना के बाद राजस्थान सरकार ने असुरक्षित भवनों की सूची तैयार की और 2,699 स्कूल भवनों को गिराने तथा लगभग 2,000 स्कूलों की मरम्मत का निर्णय लिया. लेकिन सभी स्कूलों की मरम्मत नहीं हुई. उनका कहना है कि सरकार द्वारा घोषित "मॉडल स्कूलों" के आसपास स्थिति बेहतर दिख सकती है, लेकिन कुछ ही दूरी पर बेहद जर्जर स्कूल मिल जाते हैं.
पानी और स्वच्छता की कमी का सबसे ज्यादा असर छात्राओं पर पड़ता है. कई अभिभावक अपनी बेटियों को स्कूल भेजना चाहते हैं, लेकिन शौचालय और पानी की खराब व्यवस्था उनके लिए बड़ी बाधा बनती है.
यही वजह है कि जेन अल्फा छात्रों के मौजूदा प्रदर्शन केवल स्कूलों की सुविधाओं की मांग नहीं हैं. वे सरकारी आंकड़ों और जमीनी वास्तविकता के बीच बढ़ती दूरी पर भी सवाल उठा रहे हैं. एकता चंदा का मानना है कि स्कूलों में वास्तविक सुधार तभी संभव है जब यह मुद्दा जन आंदोलन बने. मौजूदा छात्र आंदोलन शायद इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है.

