कच्चे तेल की कीमतें मई के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंचने से भारत की बढ़ीं मुश्किलें
कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और भारत इसका सबसे बड़ा शिकार बन सकता है. वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए भूचाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा एक-दूसरे के जहाजों पर हमलों की तेजी के कारण अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड $108 प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गया है. बीते कारोबारी सत्र में ब्रेंट 6 प्रतिशत से अधिक की दैनिक उछाल के साथ $107.63 प्रति बैरल पर बंद हुआ, जो मई के बाद का उच्चतम स्तर है. विश्लेषकों का मानना है कि तेल का तीन अंकों (100 डॉलर से ऊपर) में पहुंचना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है.
परन बालकृष्णन की रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों में हालिया तेजी की मुख्य वजह मध्य पूर्व में जहाजरानी (शिपिंग) मार्गों पर हुए भीषण हमले हैं. ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य के पास कई जहाजों को निशाना बनाए जाने के बाद आपूर्ति बाधित होने का डर बढ़ गया है. गौरतलब है कि युद्ध से पहले वैश्विक तेल व्यापार का 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था.
इसी बीच, ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने यमन के रणनीतिक मोचा बंदरगाह पर नियंत्रण हासिल कर लिया है, जिससे बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी सीधे संघर्ष की जद में आ गया है. हूतियों द्वारा सऊदी समर्थित बलों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने से 2022 का नाजुक युद्धविराम खतरे में पड़ गया है. वाशिंगटन स्थित विश्लेषकों का अनुमान है कि यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है, जिससे तेल बाजारों में अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रहेगी.
भारत पर सीधा प्रभाव: अच्छी और बुरी खबर
भारत के लिए कुछ अच्छी तो कुछ बहुत बुरी खबर है. अच्छी खबर यह है कि फिलहाल भारत को कच्चे तेल की तत्काल कमी का सामना नहीं करना पड़ रहा है. बुरी खबर यह है कि भारत को ऐसे बाजार में तेल खरीदना पड़ रहा है जहां कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और उपलब्ध कच्चे तेल के लिए प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है.
रूस वर्तमान में भारत के लिए सबसे बड़ा मददगार बना हुआ है. अगस्त में रूस ने प्रतिदिन 21 लाख बैरल तेल की आपूर्ति की, जो भारत के कुल आयात का 45 प्रतिशत था. हालांकि चालू माह में यह हिस्सेदारी घटकर 40 प्रतिशत रहने का अनुमान है, फिर भी यह खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भर अन्य एशियाई देशों की तुलना में भारत को मजबूत स्थिति में रखता है. इसके अलावा, हूती विद्रोहियों द्वारा रूसी टैंकरों को निशाना न बनाए जाने से भारत आने वाली खेप फिलहाल सुरक्षित है.
हालांकि, चीन द्वारा आक्रामक रूप से रूस और वैश्विक बाजार से कच्चे तेल की खरीदारी बढ़ाए जाने के कारण प्रतिस्पर्धा काफी कड़वी हो गई है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए स्थितियां कठिन हो रही हैं.
आर्थिक मोर्चे पर बढ़ता दबाव
दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता होने के नाते भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का प्रभाव भारत के चालू खाता घाटे (सीएडी), मुद्रास्फीति और रुपये की विनिमय दर पर पड़ रहा है.
आयात बिल में भारी उछाल: चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जुलाई) के दौरान भारत का कच्चा तेल आयात बिल 56 प्रतिशत से अधिक बढ़कर $63.4 अरब पहुंच गया, जो बीते वर्ष की समान अवधि में $40.5 अरब था.
इंडियन बास्केट में तेजी: भारतीय रिफाइनरियों द्वारा खरीदे जाने वाले कच्चे तेल (इंडियन बास्केट) की औसत कीमत जुलाई के $82.04 और अगस्त के $90.19 प्रति बैरल से उछलकर अब लगभग $116 प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई है.
नुकसान की भरपाई और नीतिगत दुविधा
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है. पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखे जाने के कारण रिफाइनिंग कंपनियों का अंडर-रिकवरी (नुकसान) काफी बढ़ गया है. यदि सरकार खुदरा ईंधन दरों को बढ़ाती है, तो देश में मुद्रास्फीति (महंगाई) तेजी से बढ़ेगी. यदि कीमतें स्थिर रखी जाती हैं, तो सरकारी तेल कंपनियों को भारी वित्तीय घाटा उठाना पड़ेगा.
इसके अतिरिक्त, प्राकृतिक गैस और अन्य ऊर्जा स्रोतों की लागत बढ़ने से उर्वरक उत्पादन भी महंगा हो रहा है. चालू वित्त वर्ष के बजट में आवंटित ₹1.71 ट्रिलियन का उर्वरक सब्सिडी बिल बढ़कर लगभग दोगुना होने की आशंका जताई जा रही है.
आगे की राह और वैश्विक अनुमान
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के अनुसार, तेल बाजार अब लंबे समय तक रहने वाले एक 'नए सामान्य' (न्यू नॉर्मल) में ढल रहा है, जहां आपूर्ति में रुकावट का जोखिम लगातार बना रहेगा. कैपिटल इकोनॉमिक्स का अनुमान है कि चालू वर्ष में तेल $100 के आसपास बना रहेगा, जबकि संघर्ष के भीषण रूप लेने पर इसके $150 प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका है. वहीं, गोल्डमैन सेक्स ने चेतावनी दी है कि जहाजरानी पर हमले जारी रहने की स्थिति में ब्रेंट क्रूड जल्द ही $120 प्रति बैरल को पार कर सकता है.

