प्रधानमंत्री ने पलकें झपकाईं! सरकार झुक गई! दुर्भाग्य से, यह झुकना उस बात पर हुआ जिसकी अतीत की राजनीति में माँग भी नहीं करनी पड़ती थी. पुराने दौर में, एक भयानक रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री खुद इस्तीफा दे देते थे.
ऐसा इसलिए नहीं था कि यह उनकी व्यक्तिगत लापरवाही थी, बल्कि इसलिए था क्योंकि उन्होंने सर्वोच्च प्राधिकारी के रूप में जिम्मेदारी स्वीकार की. दुर्भाग्य से, सम्मान, स्वाभिमान और शालीनता की वह भावना आज की राजनीति में खो गई है. लाल बत्ती वाली गाड़ियाँ, लुटियंस दिल्ली में एक बंगला और आत्म-मुग्धता का झूठा अहसास ही अब पहली प्राथमिकता बन चुका है.
सी. अरयमा सुंदरम ने ‘द हिंदू’ में लिखा है कि नीट की त्रासदी के तुरंत बाद एक शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो जाना चाहिए था—लेकिन उसके लिए एक विशाल विरोध प्रदर्शन की ज़रूरत पड़ गई. नुकसान की भरपाई करना और शिक्षा व्यवस्था में फैली सड़न (अफ़सोस कि यह कई विभागों में फैली सड़न में से केवल एक है) को दूर करने के लिए गंभीर और ईमानदार कदम उठाना, सरकार को उसका कर्तव्य, काम और जिम्मेदारी निभाने पर मजबूर करने के लिए इतने बड़े पैमाने के विरोध प्रदर्शन की आवश्यकता पड़ी.
लेकिन इससे एक बहुत बड़ी सीख और लाभ जो निकलकर सामने आया है (क्योंकि आखिर हर नकारात्मक परिस्थिति में कुछ सकारात्मक परिणाम देने की क्षमता होती है), वह यह है कि एक तानाशाह सरकार—जो यह मानने और वैसा ही व्यवहार करने लगी थी कि वह जनता से ऊपर एक संस्था या पार्टी है, और जो "बात न मानने वाले" किसी भी व्यक्ति को धमकियाँ और प्रतिशोध दिखाने से नहीं चूकती थी—उसे यह अहसास हुआ कि जब आप जनता को दबाते हैं, तो अंत में जनता ही मालिक साबित होती है, और खुद को सर्वोपरि समझने वाले सरकारी अफ़सर केवल उनके सेवक हैं.
एक तरह से, वर्तमान भारतीय परिदृश्य में नीट की घटना एक सकारात्मक मोड़ रही है. आखिरकार लोग तानाशाही, डर और प्रतिशोध की धमकियों के खिलाफ खड़े हुए हैं—उन लोगों के खिलाफ जिन्हें उन्हीं लोगों ने सत्ता दी, जिन्हें वे लगातार धोखा देते आ रहे हैं. विरोध या आपत्ति जताने वालों पर सरकारी कार्रवाई की धमकियाँ; झूठे ड्रग्स या बलात्कार के आरोपों में फँसाए जाने और बिना ज़मानत के जेल में सड़ने की धमकियाँ—इस विश्वास के साथ कि एक दब्बू न्यायिक प्रणाली आँखें मूँद लेगी और अन्याय से मुँह मोड़ लेगी—का आखिरकार लोगों ने, और सौभाग्य से इस देश के युवाओं ने डटकर सामना किया है और कहा है, "बस, अब और नहीं."
मुझे युवाओं पर गर्व है. वे एक होकर खड़े हुए हैं. बिना किसी धार्मिक या अन्य कृत्रिम भेदभाव के. उन्होंने वह साहस दिखाया है जिसकी कमी उन बुजुर्गों में थी जिनके पास इसे दिखाने का सामर्थ्य था. उन्होंने हमें दिखाया है कि कायरता, नपुंसकता, और अपनी सुख-सुविधाओं में बिना किसी हलचल या व्यवधान के अपने मुकाम को सुरक्षित रखने के लिए दब्बू और आज्ञाकारी मवेशियों की तरह ऐसी तानाशाही के आगे झुकने की मानसिकता अब पूरी तरह से अस्वीकार्य है.
आगे बढ़ो, युवाओं! तुम कॉकरोच (तिलचट्टे) नहीं हो. हम बुजुर्ग, उम्मीद है कि तुम्हारी ताकत से वह साहस जुटा पाएंगे कि हम कॉकरोच बनना बंद कर सकें, अपने डरों को छोड़ सकें और केवल अपने वजूद को बचाने की चिंता में न रहें.
तानाशाही के लिए सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि वह खुद को हद से ज्यादा और ऐसे क्षेत्रों तक ले जाए जो अब इसे सहन नहीं कर सकते और न ही करेंगे. यह प्रदर्शन सिर्फ नीट की विफलता के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस तानाशाही शासन के खिलाफ भी था जो हर तरफ हावी है. एक ऐसे व्यक्ति के दिल से—जो पूरी तरह से गैर-राजनीतिक माना जाता है और जिसने सत्तापक्ष या विपक्ष को दोष देने की परवाह किए बिना हर मुद्दे को उसकी सही या गलत की योग्यता पर परखा है—मैं बस यही कह सकता हूँ: युवाओं के नेतृत्व में तानाशाही के खिलाफ शुरू हुआ यह बदलाव सफल हो, ताकि हम सभी वास्तव में गर्व से कह सकें: जय हिंद.
(सी. अरयमा सुंदरम सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं. अंग्रेजी में उनकी यह टिप्पणी यहां पढ़ सकते हैं.)

