निहार नलिनी सारंगी | कैसे एक अपमान और कॉकरोच के मजाक ने भारत के युवाओं की चुप्पी तोड़ी

'काउंटरकरंट्स' में निहार नलिनी सारंगी ने लिखा है कि भारत के युवाओं के एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन के मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है. बेरोजगारी, पेपर लीक, भर्ती में देरी और डिग्रियों के बावजूद रोजगार नहीं मिलने से परेशान युवाओं की नाराजगी लंबे समय तक चुप्पी में दबी रही. मई 2026 में बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से करने वाली मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने इस स्थिति को बदलने में अप्रत्याशित भूमिका निभाई.

अपमान से आंदोलन तक

15 मई को आई टिप्पणी के अगले दिन राजनीतिक रणनीतिकार अभिजीत दिपके ने एक व्यंग्यात्मक पार्टी शुरू की. अभियान को सोशल मीडिया पर तेजी से समर्थन मिला और कुछ ही दिनों में इसके इंस्टाग्राम फॉलोअर्स सत्तारूढ़ भाजपा से आगे निकल गए. जून में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ, जुलाई में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की घटना हुई और अक्टूबर तक आंदोलन का गुस्सा मतदाता सूची के पुनरीक्षण तथा मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंच गया.

यह घटनाक्रम केवल सोशल मीडिया की लोकप्रियता नहीं, बल्कि युवाओं के मनोवैज्ञानिक बदलाव का संकेत था. वर्षों की असफलताओं के बाद युवाओं ने चुप रहने को डर के बजाय धैर्य, व्यावहारिकता और परिपक्वता समझना शुरू कर दिया था. मनोविज्ञान में इसे ‘लर्न्ड हेल्पलेसनेस’ कहा जाता है, जिसमें लगातार निराशा के बाद व्यक्ति मानने लगता है कि उसके प्रयासों से कुछ नहीं बदलेगा.

‘कॉकरोच’ का व्यंग्य इस चक्र को तोड़ने का माध्यम बना. जब युवाओं ने खुद को इसी नाम से संबोधित किया और लाखों लोगों को ऐसा करते देखा, तो निजी अपमान सामूहिक पहचान में बदल गया. इससे अकेले पड़ जाने का डर कम हुआ और युवाओं को अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने का साहस मिला.

चुप्पी टूटी, विपक्ष ने भी अपनाई भाषा

इस स्थिति को ‘प्लूरलिस्टिक इग्नोरेंस’ यानी सामूहिक भ्रम से जोड़ा जा सकता है. इसमें बहुत से लोग निजी तौर पर असहमत होते हैं, लेकिन यह मानकर चुप रहते हैं कि बाकी लोग व्यवस्था से संतुष्ट हैं. किसी एक व्यक्ति की मुखरता इस धारणा को तोड़ सकती है और दूसरों को बोलने की अनुमति देती है.

आंदोलन के प्रभाव से समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसके नाम का इस्तेमाल भाजपा पर तंज कसने के लिए किया. तृणमूल कांग्रेस के सांसद महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद ने भी इसमें शामिल होने की इच्छा मजाकिया अंदाज में जताई. कांग्रेस नेता शशि थरूर ने व्यंग्य को लोकतंत्र में विरोध का वैध माध्यम बताते हुए सरकार और विपक्ष से युवाओं की शिकायतें सुनने की अपील की. वामपंथी छात्र संगठन आइसा भी इसी मुद्दे पर सक्रिय रहे. अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 10 अक्टूबर को दिल्ली में हिरासत में लिए गए लोगों में यूट्यूबर, नागरिक अधिकारों के वकील और वामपंथी नेता शामिल थे.

हालांकि, आंदोलन की आवाज को विपक्ष की आवाज मानना गलत होगा. बीआरएस नेता केटी रामाराव ने इसे पारंपरिक विपक्ष से जनता की निराशा का संकेत बताया. कुछ स्वयंसेवकों ने अभिजीत दिपके के आवास के बाहर प्रदर्शन कर बंद कोर टीम पर सवाल उठाए और आंदोलन के एक और अरविंद केजरीवाल की तरह राजनीतिक दल में बदलने की आशंका जताई. अपनी आवाज खोज चुकी पीढ़ी किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी ओर से बोलने का अधिकार देने को लेकर भी सतर्क है.

सरकार की प्रतिक्रिया और संस्थागत संकट

भाजपा नेता राजीव चंद्रशेखर ने अभियान को विदेशी समर्थन वाला प्रभाव अभियान बताया, जबकि पार्टी के एक प्रवक्ता ने अक्टूबर के प्रदर्शनकारियों को ‘अराजक तत्व’ कहा. आंदोलन का एक्स अकाउंट मई में भारत में रोक दिया गया. 10 अक्टूबर की रैली से पहले मध्य दिल्ली में प्रतिबंध लगाए गए, व्यावसायिक इलाके में मोबाइल इंटरनेट बंद हुआ, मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और करीब 2,000 से 2,500 लोगों को हिरासत में लिए जाने के अनुमान सामने आए. कुछ नेताओं को कथित तौर पर एक वर्ष तक शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया गया.

असंतोष के घरेलू कारणों के बजाय विदेशी हस्तक्षेप पर जोर देने से वास्तविक शिकायतों से ध्यान हट सकता है. आउटलुक के विश्लेषण में आंदोलन को लेबल करने और बल प्रयोग से उसके प्रभाव बढ़ने की बात कही गई है. दूसरी ओर, सरकार के समर्थकों का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है और आंदोलन की लोकप्रियता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. सरकार और चुनाव आयोग ने किसी भी गलत काम से इनकार किया है. भारत के जिनेवा स्थित मिशन ने कहा कि शांतिपूर्ण सभा संवैधानिक अधिकार है, हालांकि उस पर सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी पाबंदियां लागू हो सकती हैं.

लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति भी बहस का विषय है. विपक्ष और कई स्वतंत्र विश्लेषकों का आरोप है कि विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस सत्ता पर नियंत्रण रखने की अपनी भूमिका में कमजोर हुए हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार की प्रतिक्रिया को ‘मूक लोकतंत्र’ बताया, जबकि सरकार इस आकलन को खारिज करती है.

आंदोलन का भविष्य अनिश्चित

भारतीय राजनीति लंबे समय से जाति, धर्म, क्षेत्र और नेताओं के प्रति वफादारी पर केंद्रित रही है. लेकिन भर्ती परीक्षाओं, बेरोजगारी और अवसरों की कमी से जुड़ी शिकायतें इन विभाजनों के पार युवाओं को जोड़ सकती हैं.

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांता बारबरा के अमित आहूजा के विश्लेषण के मुताबिक, भाजपा आंदोलन की मांगों को अपने भीतर समाहित कर सकती है. चुनाव केवल ऑनलाइन लोकप्रियता से नहीं, बल्कि मतदान से जीते जाते हैं. दूसरी ओर, यह आंदोलन विपक्ष को नई ऊर्जा दे सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि युवा अपना समर्थन किसी दल को सौंप दें.

कॉकरोच जन पार्टी अभी पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं है. उसके पास संगठित कार्यकर्ता, उम्मीदवार या स्पष्ट कार्यक्रम नहीं है. आंदोलन पार्टी, दबाव समूह या अस्थायी विरोध बन सकता है. उसका भविष्य अनिश्चित है, लेकिन युवाओं की चुप्पी टूट चुकी है. सबसे बड़ा सवाल यही है: लोगों ने नाराज होना कब छोड़ दिया, और उस चुप्पी को शांति क्यों समझ लिया?

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