मिलावटी गोरी करने वाली क्रीमों से महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में पारा विषाक्तता के मामलों में बढ़ोतरी

‘स्क्रोल’ के मुताबिक, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में त्वचा को गोरा करने वाली क्रीमों के इस्तेमाल के बाद पारा विषाक्तता के मामलों में बढ़ोतरी सामने आई है. पिछले एक साल में राज्य के अलग-अलग हिस्सों के तंत्रिका रोग विशेषज्ञों ने ऐसे सौ से अधिक मरीज देखे हैं. इनमें ज्यादातर युवा हैं और उनके शरीर में पारा सामान्य स्तर से काफी अधिक पाया गया. कई मरीजों में पैरों में जलन, मांसपेशियों में दर्द, झटके, नींद न आना और त्वचा में खुजली जैसे लक्षण दिखाई दिए. कुछ मामलों में इसका असर गुर्दों पर भी पड़ा.

अकोला जिले के मूर्तिजापुर के गोरेगांव निवासी 25 वर्षीय ऋषिकेश धोरे जनवरी में डॉक्टर के पास पहुंचे थे. उन्हें अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, मांसपेशियों में दर्द और पैरों में कंपन जैसा महसूस हो रहा था. स्थानीय डॉक्टर ने उन्हें अकोला शहर के तंत्रिका रोग विशेषज्ञ डॉ. नितिन वीरवानी के पास भेजा. डॉ. वीरवानी ने ऐसे ही लक्षण वाले कुछ अन्य मरीज पहले भी देखे थे. पूछताछ में पता चला कि धोरे ने हाल ही में गांव की एक दुकान से त्वचा को गोरा करने वाली क्रीम खरीदकर लगाना शुरू किया था. उनके मुताबिक क्रीम इस्तेमाल करने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें रात में नींद आना बंद हो गई और पैरों में जलन शुरू हो गई.

अकोला की 30 वर्षीय एक महिला ने भी अप्रैल में दोस्त की सलाह पर ऐसी ही क्रीम लगानी शुरू की थी. शुरुआत में उसके चेहरे की रंगत में बदलाव आया और दाग-धब्बे हल्के हुए, जिसके बाद उसने अपने कुछ दोस्तों को भी यह क्रीम इस्तेमाल करने की सलाह दी. लेकिन कुछ सप्ताह बाद उसका चेहरा सूखने और खुजली होने लगी तथा पैरों में लगातार झनझनाहट महसूस होने लगी. जांच में उसके रक्त में पारे का स्तर सामान्य सीमा से दस गुना अधिक पाया गया. उसके रक्त में सीएएसपीआर-2 प्रतिरक्षी भी मिले, जो भारी धातुओं के संपर्क से जुड़ी शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का संकेत हो सकता है.

महाराष्ट्र में सौ से ज्यादा मामले

डॉ. वीरवानी ने पिछले एक साल में अकोला में ऐसे करीब 40 मरीजों का इलाज किया है. वह अकेले डॉक्टर नहीं हैं जिन्होंने ऐसे मामले देखे हैं. महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले तंत्रिका रोग विशेषज्ञ पिछले एक साल से युवा मरीजों में पारा विषाक्तता के ऐसे मामलों पर आपस में जानकारी साझा कर रहे हैं.

पुणे के मणिपाल अस्पताल के तंत्रिका रोग विशेषज्ञ डॉ. भूषण जोशी के मुताबिक, ज्यादातर मामलों में त्वचा को गोरा करने वाली क्रीम पारा विषाक्तता का कारण बनी. कुछ मरीजों में गुर्दों को नुकसान भी देखा गया. राज्य के तंत्रिका रोग विशेषज्ञों के एक समूह के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में ऐसे सौ से अधिक मामले सामने आ चुके हैं. डॉक्टरों ने कुछ क्रीमों के नमूनों की निजी तौर पर जांच भी कराई और उनमें पारे की मात्रा अधिक पाई.

इन क्रीमों की एक बड़ी समस्या यह थी कि कई उत्पादों पर सामग्री, निर्माता या उत्पादन की खेप से जुड़ी कोई जानकारी नहीं थी. महाराष्ट्र सरकार ने अब ऐसी क्रीम बेचने वाली दुकानों और वितरकों पर कार्रवाई शुरू की है, लेकिन ये उत्पाद बाजार तक पहुंचे कैसे, इसका पूरा पता अभी नहीं चल पाया है.

पाकिस्तान में बने उत्पाद या भारत में नकली निर्माण

ऋषिकेश धोरे और अकोला की महिला द्वारा इस्तेमाल की गई क्रीम कथित तौर पर पाकिस्तान की गोरी कॉस्मेटिक्स नाम की कंपनी की थी. लेकिन महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अधिकारियों के मुताबिक, पैकेट पर जरूरी लेबल और खेप की जानकारी नहीं थी. इसलिए अधिकारियों को यह भी संदेह है कि उत्पाद नकली हो सकता है.

महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने गोरी कॉस्मेटिक्स की क्रीम, त्वचा को गोरा करने वाले शरीर के लोशन और साबुन के अलावा गोल्डन स्टार कॉस्मेटिक्स की क्रीम और शाहीन कॉस्मेटिक्स की फेस फ्रेश गोल्ड प्लस क्रीम को लेकर चेतावनी जारी की है. गोरी कॉस्मेटिक्स के उत्पादों की जांच में पारे की मात्रा काफी अधिक मिली. संभाजीनगर में हुई एक छापेमारी में जब्त उत्पादों में पारे का स्तर अनुमत सीमा से 18 से 40 गुना अधिक पाया गया.

महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने इन मामलों में आतंकवाद निरोधक दस्ते से भी जांच कराने का अनुरोध किया है. अधिकारियों का कहना है कि वे यह पता लगाना चाहते हैं कि घटिया गुणवत्ता वाले ये उत्पाद अवैध रूप से पाकिस्तान से भारत में लाए जा रहे हैं या भारत में ही नकली उत्पाद बनाकर वितरित किए जा रहे हैं.

हालांकि, जांच केवल पाकिस्तानी उत्पादों तक सीमित नहीं है. तंत्रिका रोग विशेषज्ञों ने स्थानीय स्तर पर बने कुछ उत्पादों में भी पारे की अधिक मात्रा पाई है. महाराष्ट्र के अधिकारियों ने शिकायतों के आधार पर कर्नाटक के अधिकारियों से एक सौंदर्य प्रसाधन निर्माता की भी जांच करने को कहा है.

पारा त्वचा को गोरा करने वाली क्रीम में क्यों मिलाया जाता है

पारा टाइरोसिनेस नामक एंजाइम के उत्पादन को रोकता है. यही एंजाइम त्वचा को उसका गहरा रंग देने वाले मेलेनिन के निर्माण में भूमिका निभाता है. इसी वजह से पारे को अवैध रूप से त्वचा को गोरा करने वाली क्रीमों में मिलाया जाता है. यह अपेक्षाकृत सस्ता है और दूसरे त्वचा को निखारने वाले पदार्थों की तुलना में तेजी से परिणाम देता है.

भारत के औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन कानून के तहत आंखों की छाया को छोड़कर सभी सौंदर्य प्रसाधनों में पारे की अनुमत मात्रा एक पीपीएम तक है. लेकिन जांचे गए कुछ उत्पादों में यह सीमा कई गुना पार कर गई.

पारा शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकता है. नासिक के तंत्रिका रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल बाविस्कर ने बताया कि उनके इलाज में आए 17 मरीजों में पारे के संपर्क के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली के भ्रमित होने और सीएएसपीआर-2 प्रतिरक्षी बढ़ने के संकेत मिले. इससे स्वस्थ तंत्रिका कोशिकाओं पर हमला हो सकता है और मांसपेशियों में झटके, याददाश्त की समस्या और दौरे जैसे लक्षण पैदा हो सकते हैं.

नासिक में डॉ. बाविस्कर ने छह महीने पहले ऐसे मरीज देखना शुरू किया था. 20 से 40 वर्ष की उम्र के कई मरीजों ने पैरों और जांघों में दर्द, जलन और त्वचा के नीचे कुछ रेंगने जैसा महसूस होने की शिकायत की. कुछ मरीजों को एक महीने तक अनिद्रा रही. शुरुआत में डॉक्टर इन लक्षणों को पारे से नहीं जोड़ पाए. बाद में एक मरीज ने बताया कि उसने नई त्वचा निखारने वाली क्रीम इस्तेमाल करने के बाद ये लक्षण महसूस किए, जिसके बाद जांच की दिशा बदली.

संभाजीनगर के तंत्रिका रोग विशेषज्ञ डॉ. आनंद सोनी ने भी कई मरीजों में सीएएसपीआर-2 प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया देखी. उनके तीन मरीजों में गुर्दों की समस्या विकसित हुई. डॉक्टरों के मुताबिक, जिन मरीजों में पारे का संपर्क कम अवधि का था, उनमें क्रीम बंद करने और उपचार के बाद लक्षण धीरे-धीरे कम हुए. कुछ मरीजों को स्टेरॉयड देकर इलाज किया गया.

बाजार तक पहुंचने की कड़ी अब भी स्पष्ट नहीं

महाराष्ट्र में मार्च से खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने ऐसी क्रीम बेचने वाली दुकानों पर छापेमारी की है और 70 लाख रुपये से अधिक मूल्य का माल जब्त किया है. 29 मार्च को संभाजीनगर में पुलिस और खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने तीन दुकानों पर छापा मारा और गोरी कॉस्मेटिक्स के उत्पाद जब्त किए.

लेकिन दुकानदारों से आगे आपूर्ति की कड़ी नहीं मिल पाई. अधिकारियों के मुताबिक, दुकानदारों ने बताया कि उन्होंने क्रीम मुंबई के क्रॉफर्ड बाजार से खरीदी थी, लेकिन उनके पास न बिल था और न खरीद आदेश. जांच की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उत्पाद किसने दुकानों तक पहुंचाए और उनका वितरक कौन था.

सौंदर्य प्रसाधनों की बिक्री के लिए दवाओं की तरह अलग लाइसेंस की जरूरत नहीं होती, हालांकि उनके निर्माण के लिए लाइसेंस जरूरी है. खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार यही व्यवस्था नकली या अवैध उत्पादों के बाजार में पहुंचने की निगरानी को मुश्किल बनाती है. नियमित निरीक्षण के जरिए लाइसेंस प्राप्त निर्माताओं की निगरानी की जा सकती है, लेकिन अगर उत्पाद किसी अवैध निर्माता द्वारा बनाए जा रहे हों तो उनका पता लगाना कठिन है.

अब तक इस मामले में परभणी, संभाजीनगर, नांदेड़, मुंबई और नासिक में छह प्राथमिकी दर्ज की गई हैं. इनमें सौंदर्य प्रसाधन और किराना दुकानों के मालिकों पर ऐसे उत्पाद बेचने तथा अज्ञात लोगों पर इनके निर्माण और वितरण के आरोप लगाए गए हैं. औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन कानून की धारा 27 के तहत मिलावटी या असुरक्षित सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण या बिक्री पर तीन साल तक की सजा का प्रावधान है.

इस पूरे मामले में महाराष्ट्र सरकार ने दुकानों और वितरकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि पारे से भरी ये क्रीम ग्रामीण बाजारों तक पहुंचीं कैसे. जब्त उत्पादों में अत्यधिक पारा मिलने और युवा मरीजों में इसके स्वास्थ्य प्रभाव सामने आने के बावजूद आपूर्ति श्रृंखला की पूरी कड़ी अब तक स्पष्ट नहीं है. साथ ही, स्थानीय स्तर पर बने उत्पादों में भी पारा पाए जाने से जांच का दायरा केवल विदेश से आने वाले उत्पादों तक सीमित नहीं रह गया है.

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