आकार पटेल | क्या भारत में आज़ादी लगातार सिकुड़ रही है?
आज़ादी का रिश्ता स्वतंत्रता से है और उसके बिना यह शब्द बेमानी है. कुछ साल पहले मैंने इस बात का जायज़ा लिया था कि दुनिया भारत में आज़ादी की हालत को किस तरह देखती है. यह काम मैंने अपनी एक किताब के लिए किया था, लेकिन समय-समय पर मैं इन सूचकांकों की इस फ़ेहरिस्त पर लौटता रहता हूँ, यह देखने के लिए कि क्या बदला है.
स्वतंत्रता दिवस पर मुझे लगा कि यह करना मुनासिब होगा. यहाँ जिन कुछ संगठनों का ज़िक्र है, वे पाठकों के लिए अपरिचित हो सकते हैं, लेकिन ये प्रतिष्ठित हैं और इनके निष्कर्षों को गंभीरता से लिया जाता है. सरकार इनके बारे में क्या कहती है, यह हम आख़िर में देखेंगे. तो शुरू करें.
प्यू रिसर्च सेंटर एक अमेरिकी संस्था है जो दीर्घकालिक रुझानों पर नज़र रखती है. यह दुनिया भर में सरकारी पाबंदियों और सामाजिक शत्रुता की समीक्षा करती है. इसका ताज़ा निष्कर्ष है कि भारत में सरकारी पाबंदियों का स्तर ऊँचा है और सामाजिक शत्रुता का स्तर 'बहुत ऊँचा' है. 2019 तक भारत नीचे दी गई हर श्रेणी में टॉप 10 में था:
धार्मिक मानदंडों से जुड़ी सामाजिक शत्रुता के ऊँचे स्तर वाले देश
अंतर-धार्मिक तनाव और हिंसा के ऊँचे स्तर वाले देश
संगठित समूहों द्वारा धार्मिक हिंसा के ऊँचे स्तर वाले देश
व्यक्तियों और सामाजिक समूहों द्वारा उत्पीड़न के ऊँचे स्तर वाले देश
सिविकस नागरिक समाज संगठनों का वैश्विक गठबंधन है. यह संगठन बनाने, शांतिपूर्ण सभा करने और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर नज़र रखता है.
इसकी रेटिंग में भारत का नागरिक स्पेस 'बाधित' से गिरकर 'दमित' हो गया. इसका कहना है कि "भारत के नागरिक स्पेस का क्षरण चिंताजनक है — ख़ासकर पाबंदी लगाने वाले क़ानूनों की भरमार के ज़रिए अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और मानवाधिकार समूहों के रास्ते में रुकावट डालने की कोशिशें." इसी वजह से "भारत को उन देशों की निगरानी सूची में शामिल कर लिया गया है जहाँ नागरिक स्वतंत्रताओं में तेज़ गिरावट देखी गई है."
द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ब्रिटेन से निकलने वाली पत्रिका इकोनॉमिस्ट का हिस्सा है. यह एक डेमोक्रेसी इंडेक्स प्रकाशित करती है, जिसमें भारत को "त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र" के तौर पर वर्गीकृत किया गया है. इसका कहना है कि यह "नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकतांत्रिक पतन का नतीजा" है और "मोदी के दौर में धर्म का बढ़ता प्रभाव, जिनकी नीतियों ने मुस्लिम-विरोधी भावना और धार्मिक कलह को हवा दी है, देश के राजनीतिक ताने-बाने को नुक़सान पहुँचा चुका है."
1941 में स्थापित फ़्रीडम हाउस कहता है कि वह "दुनिया भर में लोकतंत्र के समर्थन और बचाव को समर्पित सबसे पुराना अमेरिकी संगठन" है.
अपनी फ़्रीडम इन द वर्ल्ड रिपोर्ट में इसने भारत को 2014 के "स्वतंत्र" से गिराकर "आंशिक रूप से स्वतंत्र" कर दिया. कश्मीर, जिसकी रेटिंग अलग से होती है, "स्वतंत्र नहीं" है.
इसका कहना है कि "बीजेपी के शासन में भेदभावपूर्ण नीतियाँ चली हैं और मुसलमानों को प्रभावित करने वाले उत्पीड़न में बढ़ोतरी हुई है."
वॉशिंगटन स्थित वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट कहता है कि वह "दुनिया भर में क़ानून के राज को आगे बढ़ाने के लिए काम करने वाला स्वतंत्र, बहुविषयक संगठन" है. इसका रूल ऑफ़ लॉ इंडेक्स जवाबदेही, न्यायपूर्ण क़ानून, खुली सरकार, और सुलभ व निष्पक्ष न्याय पर नज़र रखता है. भारत दुनिया में 66वें स्थान से गिरकर 2022 में 77वें और अब 86वें पर आ गया है.
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स पेरिस में है और सालाना वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स निकालता है. भारत दुनिया में 157वें स्थान पर है और इसके लिए गिनाई गई वजहों में शामिल हैं "पत्रकारों के ख़िलाफ़ हिंसा में बढ़ोतरी, मीडिया के मालिकाने का बेहद केंद्रीकरण, और ऐसे संस्थान जिनका राजनीतिक जुड़ाव लगातार और ज़्यादा खुला होता जा रहा है."
1977 में वॉशिंगटन में स्थापित केटो इंस्टिट्यूट कहता है कि उसका सपना "एक ऐसा स्वतंत्र और खुला समाज है जिसमें आज़ादी हर व्यक्ति को शांति के साथ समृद्धि और अर्थ भरा जीवन जीने का मौक़ा देती है."
इसके ह्यूमन फ़्रीडम इंडेक्स में भारत दुनिया में 87वें से 110वें स्थान पर आ गिरा है, जिसमें व्यक्तिगत आज़ादी और आर्थिक आज़ादी के अंक कम हैं.
बर्लिन स्थित ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल कहता है कि वह "भ्रष्टाचार को संभव बनाने वाली व्यवस्थाओं और नेटवर्कों को उजागर करके ताक़तवर और भ्रष्ट लोगों को जवाबदेह ठहराता है." इसके करप्शन परसेप्शंस इंडेक्स में भारत की रैंक 85वें से गिरकर 91वें पर आ गई है. इसके सर्वे के मुताबिक़ 39% भारतीयों को पिछले 12 महीनों में रिश्वत देनी पड़ी.
वॉशिंगटन का इंटरनैशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट ग्लोबल हंगर इंडेक्स प्रकाशित करता है. भारत 102वें स्थान पर है और उसकी भुखमरी की रैंकिंग "गंभीर" है.
गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय वैरायटीज़ ऑफ़ डेमोक्रेसी (वी-डेम) इंडेक्स तैयार करता है, जो संस्थागत लोकतंत्र और निरंकुशता की तरफ़ बढ़ने की पड़ताल करता है. इसका कहना है कि 2014 के बाद भारत में "पिछले 10 साल में दुनिया के सभी देशों के बीच सबसे नाटकीय बदलावों में से एक" देखा गया है. भारत ने लोकतंत्र का दर्जा खो दिया और उसे 'चुनावी निरंकुशता' के तौर पर वर्गीकृत कर दिया गया, जिससे वह हंगरी और तुर्की जैसे मुल्कों की जमात में शामिल हो गया. अभिव्यक्ति, मीडिया और नागरिक समाज की आज़ादी के मामले में भारत "उतना ही निरंकुश है जितना पाकिस्तान, और बांग्लादेश तथा नेपाल, दोनों से बदतर." भारत ने अपने नागरिकता क़ानूनों के ज़रिए "धर्म के आधार पर भेदभाव" की शुरुआत की है.
2020 में इन निष्कर्षों से चिंतित सरकार ने आदेश दिया कि 32 वैश्विक सूचकांकों के लिए एक 'एकल, सूचनात्मक डैशबोर्ड' तैयार किया जाए. निगरानी की यह कवायद "सिर्फ़ रैंकिंग सुधारने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्थाओं को सुधारने और सुधारों को गति देने के लिए थी, ताकि निवेश आकर्षित हो और दुनिया में भारत की छवि गढ़ी जा सके."
बाद में सरकार ने कहा कि वह "एक बड़ा प्रचार अभियान" शुरू करेगी, जो विज्ञापनों और "मंत्रालयों की माइक्रो-साइटों" के ज़रिए "भारत की छवि गढ़ेगा" और वह "वैश्विक सूचकांकों की समस्याओं, मानकों और आँकड़ों के स्रोतों को भी सार्वजनिक करेगी."
इससे गिरावट रुकी नहीं, क्योंकि यह गिरावट प्रदर्शन से जुड़ी थी, धारणा से नहीं, और इसे मीडिया या प्रचार के ज़रिए दुरुस्त नहीं किया जा सकता था.
गिरावट जारी रहने पर सरकार ने पहले पद्धति को दोषी ठहराया और फिर मंशा को. आज हम यहीं खड़े हैं, जब हम एक-दूसरे को और ख़ुद को स्वतंत्रता दिवस की मुबारकबाद दे रहे हैं.

