धरना और भूख हड़ताल का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं: केरल उच्च न्यायालय

यह टिप्पणी करते हुए कि "धरना, भूख हड़ताल जैसी राजनीतिक गतिविधियों और सत्याग्रह जैसी अन्य प्रथाओं का संवैधानिक लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है, शैक्षणिक संस्थानों में तो और भी नहीं, “केरल हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसने एर्नाकुलम जिले के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के कुछ निलंबित छात्रों को उनकी सेमेस्टर परीक्षा देने की अनुमति दी थी.

इससे पहले, एकल पीठ ने 16 निलंबित छात्रों को शुल्क का भुगतान करने और परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति दी थी, और कहा था कि ऐसी अनुमति कोई अधिकार या समानता प्रदान नहीं करेगी और यह रिट याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन होगी.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई से जुड़े इन छात्रों को अगस्त में एक विरोध प्रदर्शन और एक नुक्कड़ नाटक के मंचन के बाद निलंबित कर दिया गया था, जिसमें कथित तौर पर कुलपति सीज़ा थॉमस का अपमान किया गया था. अपने आंदोलन के दौरान, उन्होंने विश्वविद्यालय में बेहतर बुनियादी ढांचे और शैक्षणिक सुविधाओं की माँग की थी.

खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, अदालतें ऐसी राहत नहीं दे सकतीं जिसके लिए किसी प्राधिकरण को नियमों या वैधानिक आवश्यकताओं के विपरीत कार्य करना पड़े. अदालत ने माना कि नियामक आवश्यकताओं को पूरा किए बिना छात्रों को परीक्षा देने की अनुमति देना कानूनी मानकों और विश्वविद्यालय द्वारा उठाए गए अनुशासनात्मक कदमों दोनों को कमजोर करेगा.

हाईकोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा: “हम यह टिप्पणी करना चाहेंगे कि धरना, भूख हड़ताल जैसी राजनीतिक गतिविधियों और सत्याग्रह जैसी अन्य प्रथाओं का संवैधानिक लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है, शैक्षणिक संस्थानों में तो बिल्कुल भी नहीं. किसी शैक्षणिक संस्थान में उक्त गतिविधियों में संलिप्त होने वाला कोई भी व्यक्ति खुद को निष्कासित और/या निलंबित (रस्टिकेट) किए जाने का पात्र बना लेगा.”

पीठ ने कहा, “शैक्षणिक संस्थान शिक्षा प्रदान करने के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं. अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण, राजनीतिक दल किसी शैक्षणिक संस्थान या सभ्य छात्रों के शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार को बंधक नहीं बना सकते.”

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