‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक जयश्री पिंगले के साथ चर्चा की. बातचीत का केंद्र नीट आंदोलन, जंतर-मंतर पर विपक्ष का प्रदर्शन और इन घटनाक्रमों के बीच भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक रणनीति और प्रतिक्रिया रही.
जयश्री पिंगले के अनुसार, भाजपा देश के बदलते राजनीतिक माहौल को गंभीरता से समझ रही है. पार्टी जानती है कि जब जनमत बदलता है, तो उसका असर धीरे-धीरे व्यापक होता है. विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने खुद कई बड़े जनांदोलन किए हैं. इसलिए वह आंदोलनों की ताकत और उनके राजनीतिक प्रभाव से अच्छी तरह परिचित है. उनके मुताबिक, जंतर-मंतर पर जुटे लोगों में केवल राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि बुद्धिजीवी, पेशेवर और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े नागरिक भी शामिल थे. इससे यह मुद्दा केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा.
पिंगले ने कहा कि नीट आंदोलन के दौरान सरकार पहली बार दबाव में दिखाई दी और अंततः शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा. इससे भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में निराशा पैदा हुई. पार्टी ने अपने कैडर का मनोबल बढ़ाने और विपक्ष के ‘लोकतंत्र बचाओ’ अभियान का जवाब देने के लिए एक समानांतर अभियान शुरू किया. हालांकि, उनके मुताबिक, सत्ता में रहते हुए भाजपा का लोकतंत्र बचाने के नाम पर प्रदर्शन करना विरोधाभासी है. लोकतंत्र की रक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की ही होती है.
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक चुप्पी और अमित शाह, किरण रिजिजू तथा अन्य नेताओं की सक्रियता पर भी चर्चा की. पिंगले का मानना है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से सीधे जवाब देने के बजाय दूसरे नेताओं और मंत्रियों को आगे किया जा रहा है. उन्होंने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुख्यधारा का मीडिया अपनी विश्वसनीयता और प्रभाव खो रहा है, जबकि डिजिटल माध्यमों पर युवाओं की सक्रियता ने राजनीतिक विमर्श को नया रूप दिया है.
चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठे सवालों पर पिंगले ने कहा कि फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को वापस लेने सहित आयोग के कुछ फैसले सरकार और संस्थाओं पर बढ़ते दबाव का संकेत देते हैं. उनके अनुसार, जनता की नाराजगी केवल एसआईआर तक सीमित नहीं है. नीट, महंगाई, जीएसटी और संस्थानों में नियुक्तियों जैसे कई मुद्दे इस असंतोष को बढ़ा रहे हैं.
भाजपा के भीतर नेतृत्व को लेकर संभावित बदलाव पर उन्होंने कहा कि ऐसे बड़े फैसलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. उनके मुताबिक, संघ के भीतर इस विषय पर मंथन चल रहा है. वहीं, राहुल गांधी की प्रधानमंत्री को खुली बहस की चुनौती पर उनका मानना था कि नरेंद्र मोदी सीधे सवाल-जवाब से बचते रहे हैं और आमने-सामने की बहस की संभावना कम है.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

