‘आर्टिकल-14’ में सुरभि करवा की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस शांति भंग होने की आशंका रोकने से जुड़े कानूनों का इस्तेमाल लोगों को हिरासत में लेने और न्यायिक अभिरक्षा में भेजने के लिए कर सकती है. 14 अक्टूबर 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया था. दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर को हवाई अड्डे पर उन्हें हिरासत में लिया था और शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाए थे. उनकी हिरासत का आदेश किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट ने नहीं, बल्कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे दिल्ली पुलिस के एक सहायक आयुक्त ने दिया था. बाद में एक अन्य पुलिस अधिकारी ने उनकी हिरासत की अवधि बढ़ा दी.
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 126 और 130 विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट को शांति बनाए रखने और अच्छे आचरण के लिए बांड भरवाने की शक्ति देती हैं. वहीं, धारा 170 पुलिस को संज्ञेय अपराध होने से रोकने के लिए बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार देती है. दिल्ली में पुलिस अधिकारियों को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां भी प्राप्त हैं और वे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करते हैं. इस व्यवस्था में पुलिस कार्रवाई शुरू करने के साथ-साथ कार्यकारी मजिस्ट्रेट की भूमिका निभाकर किसी व्यक्ति को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश भी दे सकती है.
सरकार ने नए आपराधिक कानूनों को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की दिशा में कदम बताया था. हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, बीएनएसएस के ये प्रावधान काफी हद तक पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 के प्रावधानों को दोहराते हैं. अदालतें लंबे समय से इन शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल पर सवाल उठाती रही हैं.
1970 में ‘मधु लिमये बनाम एसडीएम, मुंगेर’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है. मजिस्ट्रेट केवल पुलिस की रिपोर्ट को दोहराकर आदेश नहीं दे सकता, बल्कि उसे उपलब्ध जानकारी पर स्वतंत्र रूप से विचार करके अपने निष्कर्ष के आधार भी दर्ज करने चाहिए. अदालतों ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को प्रारंभिक जांच करने, पुलिस अधिकारियों और गवाहों के बयान दर्ज करने तथा लिखित और तर्कपूर्ण आदेश जारी करने की आवश्यकता भी बताई है.
2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘अल्दानिश रेन बनाम दिल्ली राज्य’ मामले में पाया कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट को स्वीकार करके याचिकाकर्ता को दो सप्ताह की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था. अदालत ने निर्देश दिया कि हिरासत में लिए गए लोगों को गिरफ्तारी के कारण और उनके संवैधानिक अधिकार उनकी समझ की भाषा में बताए जाएं. उन्हें वकील और कानूनी सहायता पाने का अवसर भी मिलना चाहिए. अदालत ने सीआरपीसी की संबंधित धाराओं के तहत न्यायिक हिरासत की अधिकतम अवधि सात दिन तय करते हुए हर सप्ताह हिरासत की समीक्षा करने को कहा.
रिपोर्ट में ऐसे कई मामलों का उल्लेख है, जिनमें इन शक्तियों का इस्तेमाल पड़ोसियों के विवाद, पत्रकारों की जांच-पड़ताल और स्थानीय नेताओं के दबाव में कार्रवाई करने के लिए किया गया. एक मामले में चाय की दुकान पर ‘संदिग्ध तरीके से चाय पीने’ को कार्रवाई का आधार बताया गया था. अदालतों ने चेताया है कि अपराध रोकने के लिए बनाई गई शक्तियों को नियमित पुलिसिंग का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए.
दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार, जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच 14 पुलिस अधिकारियों को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियों के तहत 14,529 पुलिस रिपोर्ट मिलीं और 23,012 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें से 6,944 लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया. रिपोर्ट का तर्क है कि जब पुलिस ही कार्रवाई शुरू करे और उसी व्यवस्था के अधिकारी हिरासत का निर्णय भी लें, तो स्वतंत्र न्यायिक निगरानी कमजोर पड़ सकती है.
संविधान के अनुच्छेद 50 में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने का निर्देश दिया गया है. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट सहित विभिन्न अदालतों ने पुलिस अधिकारियों को कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां देने या उनके नियमित इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य चिंता शांति भंग रोकने की शक्ति होने से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जिसमें पुलिस कार्रवाई शुरू करने, अर्ध-न्यायिक अधिकार इस्तेमाल करने और हिरासत का आदेश देने की भूमिकाएं एक साथ निभा सकती है. ऐसे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए स्वतंत्र जांच और प्रभावी न्यायिक निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है.

