मोदी भारतीयों से उस आर्थिक संकट के लिए बलिदान मांग रहे हैं जिसकी जिम्मेदारी उनकी सरकार की है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में देशवासियों से पेट्रोल कम खर्च करने, विदेश यात्राएं टालने, वर्क फ्रॉम होम अपनाने और सोने की खरीद कम करने की अपील की. सरकार ने इसे ईरान युद्ध और वैश्विक तेल संकट के दौर में “राष्ट्रहित में त्याग” बताया. लेकिन लेखक, अर्थशास्त्री और सामाजिक चिंतक आनंद तेलतुंबडे का कहना है कि भारत की मौजूदा आर्थिक मुश्किलें केवल ईरान युद्ध का परिणाम नहीं हैं, बल्कि पिछले एक दशक की आर्थिक नीतियों और राजनीतिक प्राथमिकताओं का नतीजा हैं.
उनके मुताबिक भारत अपनी जरूरत का लगभग 85-88% कच्चा तेल आयात करता है. इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे महंगाई, रुपया, परिवहन और आम लोगों की जेब पर पड़ता है. लेकिन अगर अर्थव्यवस्था मजबूत होती तो बाहरी संकटों को संभालना आसान होता. उनका तर्क है कि भारत इस वैश्विक संकट में पहले से कमजोर हालत में पहुंचा है क्योंकि बीते वर्षों में अर्थव्यवस्था को संरचनात्मक रूप से मजबूत करने के बजाय प्रचार और राजनीतिक छवि निर्माण पर ज्यादा ध्यान दिया गया.
तलतुम्बड़े के अनुसार नोटबंदी, जल्दबाजी में लागू किया गया जीएसटी, कमजोर पड़ती मैन्युफैक्चरिंग, बेरोजगारी, घटता निजी निवेश और बढ़ती असमानता ने अर्थव्यवस्था की नींव को कमजोर कर दिया. वे कहते हैं कि “मेक इन इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत” और “अमृत काल” जैसे अभियान बड़े नारे तो बने, लेकिन वे रोजगार पैदा करने वाली औद्योगिक व्यवस्था खड़ी नहीं कर सके.
लेख में 2016 की नोटबंदी को स्वतंत्र भारत की सबसे विनाशकारी आर्थिक नीतियों में से एक बताया गया है. रातोंरात 86% मुद्रा को अमान्य कर दिया गया, जबकि देश की विशाल आबादी नकद आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर थी. सरकार ने दावा किया था कि इससे काला धन और नकली नोट खत्म होंगे, लेकिन बाद में लगभग पूरा पैसा बैंकों में लौट आया. इसके बावजूद सरकार ने इसे “कैशलेस इकोनॉमी” की दिशा में कदम बताया. तलतुम्बड़े कहते हैं कि असल में नकदी का इस्तेमाल खत्म नहीं हुआ, बल्कि समय के साथ और बढ़ गया. सबसे ज्यादा नुकसान छोटे कारोबारियों, मजदूरों और अनौपचारिक क्षेत्र को हुआ.
इसके बाद 2017 में लागू जीएसटी को भी वे छोटे और मध्यम व्यापारों के लिए झटका बताते हैं. जटिल टैक्स ढांचे और तकनीकी बोझ ने छोटे कारोबारों को कमजोर किया, जबकि बड़ी कंपनियां आसानी से ढल गईं. उनका कहना है कि इससे “औपचारिककरण” तो हुआ, लेकिन वह उत्पादकता बढ़ाकर नहीं बल्कि छोटे प्रतिस्पर्धियों को खत्म करके हुआ.
लेख में बेरोजगारी को सबसे गंभीर संकटों में गिना गया है. युवाओं में बेरोजगारी लगातार ऊंची बनी हुई है, जबकि पढ़े-लिखे युवाओं के लिए स्थायी रोजगार के अवसर सीमित हैं. महिला श्रम भागीदारी भी बेहद कम बताई गई है. तलतुम्बड़े का कहना है कि सिर्फ जीडीपी ग्रोथ को विकास का पैमाना बनाना भ्रामक है. भारत की प्रति व्यक्ति आय अब भी कई छोटे देशों से कम है और करोड़ों लोग आज भी मुफ्त राशन पर निर्भर हैं.
लेख खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समस्याओं की भी चर्चा करता है. देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन किसानों की आय अस्थिर है और लागत लगातार बढ़ रही है. तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए किसान आंदोलन को लेखक ग्रामीण भारत के बढ़ते अविश्वास का संकेत मानते हैं.
तलतुम्बड़े का आरोप है कि बढ़ती आर्थिक असमानता और कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों के हाथों में संपत्ति का केंद्रीकरण भी मौजूदा संकट का हिस्सा है. वे कहते हैं कि आर्थिक शक्ति और राजनीतिक शक्ति का गठजोड़ मजबूत हुआ है, जबकि आम नागरिकों की स्थिति कमजोर हुई है.
लेख में यह भी कहा गया है कि संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर होने का असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है. विश्वविद्यालयों, मीडिया, न्यायपालिका और सांख्यिकीय संस्थाओं पर बढ़ते दबाव से नीति निर्माण और निवेशकों के भरोसे पर असर पड़ा है. उनके अनुसार कोई भी देश लंबे समय तक मजबूत आर्थिक विकास हासिल नहीं कर सकता अगर उसकी संस्थागत विश्वसनीयता कमजोर होती जाए.
तलतुम्बड़े का निष्कर्ष है कि ईरान युद्ध ने भारत का संकट पैदा नहीं किया, बल्कि उसने केवल उन कमजोरियों को उजागर किया है जो पहले से मौजूद थीं. उनका कहना है कि सबसे बड़ा खतरा सिर्फ तेल संकट नहीं, बल्कि आर्थिक गिरावट, संस्थागत क्षरण और राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक साथ बढ़ना है.

